श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 14, 15 एवं 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 14 , 15 एव 16

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥ ।।14।।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्‍गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥ ।।15।।
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌॥ ।।16।।

जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है। रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है।
श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है

इन गुणों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर इतना गहरा होता है कि व्यक्ति का समस्त अस्तित्व ही इन गुणों पर निर्भर करता है। सत्वगुण की वृद्धि से व्यक्ति अति उत्तम कोटि का जीवन प्राप्त करता है जबकि रजोगुण की अधिकता से व्यक्ति के अंदर अत्यधिक इक्षाएँ होती हैं और वह इन कामनाओं के मोह में फंसा रहता है। तमोगुण की वृद्धि अज्ञानता को बढ़ाता है जिससे उस व्यक्ति की अभिव्यक्ति अविवेकी, अज्ञानी जीव सदृश्य हो जाती है।
       इस प्रकार हम देखते हैं कि सत्वगुण की वृद्धि से जो सुख प्राप्त होता है और उत्तम कोटि की प्राप्ति होती है वह ज्ञान की बढोत्तरी, विवेक के प्रभाव और मोह से मुक्ति के कारण होता है। रजोगुण की वृद्धि से जो दुख मिलता है और जो मध्यम कोटि मिलती है उसका कारण होता है मोह, लोभ,  आदि से उतपन्न दुख के कारण होता है। तमोगुण निम्न कोटि का जनक होता है क्योंकि यह आलस, अज्ञानता , प्रमाद आदि के कारण होता है। 

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