श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय14 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय14 श्लोक 12

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥ ।।12।।

हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशान्ति और विषय भोगों की लालसा- ये सब उत्पन्न होते हैं।

और जब मन कामनाओं का उदय होता है तो काम के साथ जुड़ी अन्य भावनाएँ यथा, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, स्वार्थ आदि का भी उदय होता है और इन सब की पूर्ति हेतु मनुष्य क्रियाशील होता है। यह अवस्था रजोगुण के हावी होने का परिचायक है। इस समय व्यक्ति कामनाओं की पूर्ति हेतु कर्मफल की इक्षा से कर्म में प्रवृत्त होता है तो मनोकुल फलों  का उपभोग करने की इक्षा रखता है। रजोगुण के सबसे अधिक प्रभावी होने के कारण व्यक्ति सकाम भाव से यानी कर्मफल की इक्षा को रखते हुए कर्म करता है और सकाम कर्म जनित भावों जैसे लाभ, लोभ, ईर्ष्या, स्वार्थ, भय, बैर, स्वार्थ , लोगों की सहायता, सहयोग आदि मिश्रित भावों से प्रभावित रहता है। इस अवस्था में व्यक्ति सकाम कर्मों से चलायमान रहता है।

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