श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥ II 111II

जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।

एक प्राणी में तीनों गुणों का समावेश होता है और व्यक्ति की प्रवृत्ति इस बात पर निर्भर करती है कि किस काल में कौन से गुण की अधिकता परिलक्षित हो रही है। जब व्यक्ति में ज्ञान, विवेक, चेतना की अधिकता होती है तो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति का व्यवहार करता है और इस काल में उसमें सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया जैसे भाव होते हैं। एक व्यक्ति जब प्रकृति के नियमों के अधीन उनसे स्वाभाविक रूप से संचालित हो , चीजों को , घटनाओं को अपने विवेक से देखे तो वह सत्वगुणी होता है। सब कर्म करते हुए भी व्यक्ति बेचैन नहीं होता है बल्कि उसके मन में शांति होती है। यह शांति किसी बाहरी कारण से नहीं आती है। बल्कि उसका ज्ञान और विवेक उसे स्थिर करता है सो वह शांत रहता है। शांत, गुणि व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता है बल्कि सभी कर्मों को करता हुआ उनके परिणाम से अप्रभावित रहता है सो बेचैन नहीं होता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति किसी मोह, लोभ, लालच, ईर्ष्या, आदि से मुक्त होता है। उसे अपने कर्म अपना धर्म प्रतीत होता है जिसे उसे बिना किसी कारण के करना होता है। ज्ञान अपने आप व्यक्ति को सात्विक नहीं बनाता है, बल्कि उसका विवेक ज्ञान का उपयोग उसे कर्म करते हुए कर्मबन्धन से मुक्त करता है तभी वह सत्वगुणी हो पाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति में रजोगुण तो होता है किंतु उसकी मात्रा सत्वगुण से कम होती है। और इस व्यक्ति में तामसी गुण सबसे कम प्रभावी होते हैं। 
           सत्वगुण के प्रभाव में व्यक्ति की शांति, और सुख की भावना उसे प्रकृति से बाँधकर संसार से जोड़ती है। इसे व्यक्ति तभी पार पता है जब वह स्वयं शांत और सुख हो जाता है और शांति और सुख की खोज समाप्त हो जाती है। 
        व्यक्ति स्वयं का मूल्यांकन कर सकता है । यदि वह सत्वगुणी होना चाहता है तो उसे अपने इन गुणों को बढाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा तब होता है जब व्यक्ति की इन्द्रियाँ उसके अंदर अपने गुणों के अनुसार व्यवहार करती हैं और उनका उपयोग अन्य कारणों से व्यक्ति नहीं करता है 

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