श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 6

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌।
सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ॥ ।।6।।

हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है।
        संसार पुरुष और प्रकृति के युग्म से बना हुआ है। और यह संसार परम् ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है।  ब्रह्म निराकार, निर्लेप है किंतु प्रकृति और पुरुष उसी ब्रह्म की अभिव्यक्ति मात्र हैं।  जब तक पुरुष और प्रकृति का युग्म न बने संसार की उतपत्ति नहीं होती है। पुरुष यानी चेतना की स्वाभाविक गति होती है प्रकृति के साथ जुड़ा रहकर भी मात्र द्रष्टा बने रहना यानी बिना प्रकृति से लिपट हुए उसकी गतिविधियों को जैसा है वैसा ही देखतन। किन्तु प्रकृति तो माया का दूसरा नाम है सो प्रकृति इस चेतना को बांध कर उसे द्रष्टा से भोक्ता बना देती है। ऐसा इसलिए होता है कि चेतना यानी पुरुष तो गुणों से परे होता है किंतु प्रकृति सत्व, रजो और तमो गुण धारण करती है। प्रकृति का कण कण इन तीन गुणों से युक्त होता है। ये तीन गुण प्रकृति की भौतिक अवस्था के परिचय नहीं होते हैं बल्कि ये तीन गुण तीन प्रवृत्तियाँ हैं जिनसे प्रकृति युक्त होती है और ये गुण ही हैं जो प्रकृति से पुरुष को बांध देते हैं।
     इनमें सत्वगुण ज्ञान और प्रकाश से सम्बंधित है और सत्वगुण अपने शुद्ध ज्ञान और निर्मल प्रकाश की वजह से बिना किसी बाहरी अवलम्बन के सुख देने वाला होता है। यह सुख ही पुरुष को प्रकृति से सम्बद्ध करता है और चेतना इस सत्वगुण से उतपन्न सुख का भोक्ता बनके प्रकृति से बंध जाता है।

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