श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 5
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 5
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥ ।।5।।
हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।
चेतना और पदार्थ से प्राणी का जन्म तो होता है किंतु प्रश्न उठता है कि पदार्थ या प्रकृति चेतना यानी आत्मा से किस प्रकार संयुक्त होकर रह पाता है। इस प्रश्न का उत्तर है कि सम्पूर्ण प्रकृति त्रिगुणमयी है यानी प्रकृति और उसके सभी अवयव तीन गुणों वाले होते हैं और यही तीन गुण जो मुख्य रूप से तीन प्रवृत्तियाँ हैं प्रकृति को उसकी चेतना अर्थात आत्मा से संयुक्त रखते हैं। जैसे जैसे ये तीनों गुण समता की स्थिति में आते जाते हैं वे तीनों एक दूसरे के प्रभाव को समाप्त करते जाते हैं। पूर्ण समत्व की स्थिति में इन गुणों का प्रभाव निरस्त हो जाता है और यही प्रलय यानी महानिर्वाण का काल होता है। ये तीन गुण हैं, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। यह सम्पूर्ण संसार इन्हीं तीन गुणों के आपसी ताल मेल, आपसी प्रभाव से चलता है। जब जो गुण भारी पड़ता है प्राणी और संसार उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। मनुष्य जीवन का लक्ष्य होना चाहिए कि इन तीनों गुणों से परे जाकर अपनी विशुद्ध चेतना का अनुभव करना। और यही तीन प्रवृत्तियाँ चेतना को प्रकृति से बाँधते भी हैं। चेतना यानी पुरुष स्वाभाविक रूप से गुणों का द्रष्टा मात्र होता है किंतु प्रकृति के साथ चेतना के होने के कारण चेतना पर प्रकृति की प्रवृत्तियों का असर पड़ता है और चेतना के स्तर पर गुण यानी प्रवृत्तियाँ सम्बद्ध हो जाती हैं। तब हमारा मैं मेरा बन जाता है। तब प्रकृति के गुणों से उतपन्न भाव का मैं भोक्ता बन जाता है। ऐसी स्थिति भ्रम उतपन्न करती है कि मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही भोक्ता हूँ जबकि वास्तविकता में मैं यानी चेतना की अपनी कोई प्रवृत्ति ही नहीं होती है। इसी भ्रम की वजह से व्यक्ति तमाम तरह की अच्छी और बुरी चीजों से गुजरता है। अतः आत्मा यानी चेतना को विशुद्ध रूप से पाने के लिए इन तीन गुणों से पार पाना होता है और द्रष्टा बनना होता है।
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