श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 (श्लोकरहित)
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14
परिचय
श्रीमद्भागवद्गीता की रचना अर्जुन के संशय को दूर करने के क्रम में हुई है। युद्ध क्षेत्र में युद्ध के लिए खड़े अर्जुन के मन में युद्ध को लेकर कई प्रश्न उठने लगे थे और उसे युद्ध की निरर्थकता का भान हो रहा था, किन्तु युद्ध की निरर्थकता के लिए उसके जो तर्क थे वे युद्ध से कम और खुद उसके अपने संशय की वजह से अधिक थे। अर्जुन धर्म के विरुद्ध किसी भी आचरण को गलत मानता था और उसे संशय था कि यह युद्ध अर्जुन के लिए अधर्म का मार्ग खोलता है। उसके इसी संशय को दूर करने के लिए अर्जुन और कृष्ण के बीच जो सम्वाद हुआ वही श्रीमद्भागवद्गीता का रूप लेकर सामने आया। वस्तुतः कर्मक्षेत्र में हम सभी कई तरह की भ्रांतियों के शिकार होते हैं। ये भाँतियाँ इस लिए हावी हो पाती हैं क्योंकि हम स्वयं के अस्तित्व को और स्वयं के साथ संसार के सम्बन्धों की बारीकियों को नहीं समझ पाते हैं। हम कौन हैं और इस संसार में हमारी भूमिका क्या है और क्यों है अगर हम यह समझ लें तो कोई भ्रम न रहे। किन्तु हम समझें कैसे कि हम कौन हैं, क्यों हैं? इसके लिए श्रीमद्भागवद्गीता में जो मार्ग सुझाया गया वह है ध्यान का मार्ग। लेकिन इस मार्ग तक कोई पँहुचे तो कैसे पहुँचे? तो इसके लिए कर्म, ज्ञान, भक्ति का रास्ता सुझाया गया जिससे यह ज्ञात होता है कि व्यक्ति के रूप में हम प्रकृति से भिन्न हैं लेकिन प्रकृति से हमारे संयोग के कारण हम संसार के व्यवहार में उतरते हैं। अगर हम अपने और प्रकृति के सम्बंध को समझ सकें तो फिर हमारा संशय दूर हो जाये।
13वें अध्याय तक श्रीकृष्ण इस अंतर को स्पष्ट कर चुके हैं किंतु अर्जुन का संशय बना हुआ है। सो एक बार फिर से इस सम्बंध में एक नई दृष्टि के साथ व्यक्ति के स्व को स्पष्ट किया गया है चौदहवें अध्याय में।
मनुष्य के जीवन में परम् सिद्धि है उसका अपनी परम् चेतना को प्राप्त करना। परम् चेतना यानी अपनी आत्मा, अपने स्व को प्राप्त करना जो परमात्मा का ही स्वरूप है। मनुष्य की परम् चेतना यानी उसकी वह चेतना जो उसे अवगत कराती है कि वह परुष रूप में(पुरुष का अर्थ लिंग रूप में नहीं है बल्कि लिंग स्तर पर मर्द और औरत दोनों के लिए इस व्याख्या में पुरुष का ही उपयोग किया गया है) प्रकृति से कैसे भिन्न और स्वतंत्र है। इस पुरुष को ही क्षेत्रज्ञ भी कहा गया है जो क्षेत्र को जानता है। जब पुरुष प्रकृति में स्थित होकर भोक्ता बन जाता है तो पुरुष यानी चेतना पर प्रकृति का लेप चढ़ जाता है। किंतु जब पुरुष स्वयं को प्रकृति में रहते हुए उसके प्रभाव से मुक्त करता है तो द्रष्टा भाव से प्रकृति में अवस्थित होता है। यही शुद्ध पुरुष परमात्मा है, पुरुषोत्तम है जिसकी प्राप्ति ही, यानी प्रकृति में द्रष्टा भाव से अवस्थित होना ही सिद्धि की प्राप्ति है और अभी तक कर्म, ज्ञान, भक्ति के जो भी मार्ग बताए गए हैं वे सभी इसी सिद्धि की प्राप्ति के लिए हैं। सिद्धि की प्राप्ति का अर्थ है संसार में रहकर भी उसमें लिप्त नहीं होना। यही अवस्था अध्यात्म की अवस्था है जिसमें व्यक्ति स्व को जान पाता है। और चतुर्दश अध्याय पुनः इसी ज्ञान को बतलाता है।
इस ज्ञान को प्राप्त करने के उपरांत व्यक्ति को हर संशय , यँहा तक कि जन्म और मृत्यु से भी मुक्ति मिल जाती है। इस ज्ञान को समझने और आत्मसात करने से व्यक्ति की व्याकुलता समाप्त हो जाती है। किंतु इस ज्ञान को वही प्राप्त कर पाता है जो इस ज्ञान के प्रति अटूट श्रद्धा रखे और उसे विश्वास हो कि वह सदगुरु के मार्गदर्शन में सही मार्ग पर चल रहा है।
यह संसार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग है। इसे ही प्रकृति और पुरुष भी कहा गया है। यही क्रमशः मैटर और कॉन्सियसनेस अर्थात पदार्थ और चेतना भी है। यानी संसार के सभी प्राणी पदार्थ और चेतना के संयोग से उतपन्न होते हैं। यह चेतना ही ईश्वरत्व है। अर्थात सभी प्राणियों में एक ही चेतना का संचार है। मैटर बिना चेतना का अर्थहीन है किंतु चेतना का संचार होते ही मैटर स्वयं के प्रति चैतन्य हो उठता है।
इसी सत्य को और उद्घाटित करते हुए पुनः कहा गया है कि प्रकृति में चेतना यानी पुरुष का संचार होने पर जीव की उतपत्ति होती है। प्राणी मैटर रूप में पूर्व से है किंतु प्राणी होने की उसमें चेतना ही नहीं है जिससे वह प्राणी स्वयं के प्रति चैतन्य भाव रख सके। जब प्रभु अर्थात चेतना उससे जुड़ती है तो वह चैतन्य होता है।
यह चेतना ही ईश्वर है और एक ही है। यही कारण है कि सभी प्राणियों का पिता एक ही ईश्वर है और माता एक ही प्रकृति है।
चेतना और पदार्थ से प्राणी का जन्म तो होता है किंतु प्रश्न उठता है कि पदार्थ या प्रकृति चेतना यानी आत्मा से किस प्रकार संयुक्त होकर रह पाता है। इस प्रश्न का उत्तर है कि सम्पूर्ण प्रकृति त्रिगुणमयी है यानी प्रकृति और उसके सभी अवयव तीन गुणों वाले होते हैं और यही तीन गुण जो मुख्य रूप से तीन प्रवृत्तियाँ हैं प्रकृति को उसकी चेतना अर्थात आत्मा से संयुक्त रखते हैं। जैसे जैसे ये तीनों गुण समता की स्थिति में आते जाते हैं वे तीनों एक दूसरे के प्रभाव को समाप्त करते जाते हैं। पूर्ण समत्व की स्थिति में इन गुणों का प्रभाव निरस्त हो जाता है और यही प्रलय यानी महानिर्वाण का काल होता है। ये तीन गुण हैं, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। यह सम्पूर्ण संसार इन्हीं तीन गुणों के आपसी ताल मेल, आपसी प्रभाव से चलता है। जब जो गुण भारी पड़ता है प्राणी और संसार उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। मनुष्य जीवन का लक्ष्य होना चाहिए कि इन तीनों गुणों से परे जाकर अपनी विशुद्ध चेतना का अनुभव करना।
संसार पुरुष और प्रकृति के युग्म से बना हुआ है। और यह संसार परम् ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है। ब्रह्म निराकार, निर्लेप है किंतु प्रकृति और पुरुष उसी ब्रह्म की अभिव्यक्ति मात्र हैं। जब तक पुरुष और प्रकृति का युग्म न बने संसार की उतपत्ति नहीं होती है। पुरुष यानी चेतना की स्वाभाविक गति होती है प्रकृति के साथ जुड़ा रहकर भी मात्र द्रष्टा बने रहना यानी बिना प्रकृति से लिपट हुए उसकी गतिविधियों को जैसा है वैसा ही देखतन। किन्तु प्रकृति तो माया का दूसरा नाम है सो प्रकृति इस चेतना को बांध कर उसे द्रष्टा से भोक्ता बना देती है। ऐसा इसलिए होता है कि चेतना यानी पुरुष तो गुणों से परे होता है किंतु प्रकृति सत्व, रजो और तमो गुण धारण करती है। प्रकृति का कण कण इन तीन गुणों से युक्त होता है। ये तीन गुण प्रकृति की भौतिक अवस्था के परिचय नहीं होते हैं बल्कि ये तीन गुण तीन प्रवृत्तियाँ हैं जिनसे प्रकृति युक्त होती है और ये गुण ही हैं जो प्रकृति से पुरुष को बांध देते हैं।
इनमें सत्वगुण ज्ञान और प्रकाश से सम्बंधित है और सत्वगुण अपने शुद्ध ज्ञान और निर्मल प्रकाश की वजह से बिना किसी बाहरी अवलम्बन के सुख देने वाला होता है। यह सुख ही पुरुष को प्रकृति से सम्बद्ध करता है और चेतना इस सत्वगुण से उतपन्न सुख का भोक्ता बनके प्रकृति से बंध जाता है।
जैसे सत्वगुण चेतना को प्रकृति से बाँधता है, वैसे ही रजोगुण भी प्रकृति से चेतना यानी पुरुष को बाँधता है। रजोगुण राग उतपन्न करता है। व्यक्ति के अंदर जब सम्बद्धता का भाव आता है तो कामनाओं का जन्म होता है। यह कामना आसक्ति, लोभ, ईर्ष्या आदि भावों को जन्म देता है। ये सारे भाव जो रजोगुण के कारण उतपन्न होते हैं वे कर्म में प्रवृत्त करते हैं और इनकी वजह से पुरुष यानी चेतना प्रकृति से बन्ध जाता है।
सत्वगुण और रजोगुण के विपरीत तमोगुण अज्ञानता, आलस्य, प्रमाद आदि को अभिव्यक्त करने वाला होता है और इन प्रवृतियों वाले कर्मों का जन्मदाता होता है। इनके प्रभाव भी व्यापक होते हैं और इनके प्रभाव में जब प्रकृति की चेतना आती है तो प्रकृति इन ऋणात्मक प्रवृत्तियों के द्वारा चेतना यानी पुरुष को बाँध देती है। इसके प्रभाव से व्यक्ति ज्ञान की बातों से दूर भागता है, वह प्रमाद में स्वयम को लिप्त रखना पसंद करता है और गति के विपरीत आलस्य में आनंद पाता है।
प्रत्येक मनुष्य में प्रकृति के तीनों गुण, सत्वगुण, रजोगुण सुर तमोगुण होते हैं जो व्यक्ति की प्रकृति को उसके चेतना यानी पुरुष से बांधते हैं। व्यक्ति की प्रवृति इन तीन गुणों की आनुपातिक बहुलता पर निर्भर करता है। जिस गुण की बहुलता होती है उसी के अनुसार व्यक्ति का आचरण होता है। किंतु कोई भी व्यक्ति एक ही गुण से नहीं बंधा होता है बल्कि उसमें होते तो तीनों गुण हैं लेकिन कोई एक बहुलता में होता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि अलग अलग समय पर एक ही व्यक्ति के ये तीन गुण अलग अलग बहुलता में होते हैं। यानी कोई व्यक्ति सदा एक ही गुण से नहीं बंधा होता है। किंतु व्यक्ति की प्रवृत्ति इस पर निर्भर करती है कि वह कितने समय किस गुण के प्रभाव में होता है।
जब व्यक्ति में सत्वगुण की बहुलता होती है और अन्य गुण अनुपात में कम होते हैं तो उस समय व्यक्ति बिना किसी बाहरी कारण के भी मन की शांत अवस्था और उस शांत मन में सुख का अनुभव करता है। सत्वगुण के प्रभाव से व्यक्ति का मन शांत होता है।(वह ट्रांक्विलिटी की अवस्था में होता है) । कोलाहल से दूर होकर मन प्रसन्नता का अनुभव करता है किंतु उसे यह प्रसन्नता किसी बाहरी चीज से नहीं मिलती है, बल्कि मन की शांत अवस्था से मिलती है। कहा भी जाता है कि यह अवस्था सुख-शांति की होती है यानी आंतरिक शांति सुख का कारण होती है। यह अवस्था भी व्यक्ति की प्रकृति को उसके चेतना से बाँधती ही है क्योंकि व्यक्ति सुख को स्वयं से अलग समझता है जिसे प्राप्त करना उसका लक्ष्य होता है और इस कारण वह सुख से बन्धन महसूस करता है।
जब व्यक्ति के अंदर रजोगुण की बहुलता होती है तो इक्षाओं और कामनाओं की उतपत्ति होती है। व्यक्ति अपने ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा इन कामनाओं की पूर्ति के लिए उद्द्यत होता है। परिणाम में व्यक्ति क्रियाशील होता है, जब रजोगुण की प्रचुरता होती है।
इन दोनों के विपरीत तमोगुण की बहुलता की स्थिति में व्यक्ति आलस्य और प्रमाद से भर जाता है। इस अवस्था में ज्ञान का अभाव हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सोने उद्देश्यों से भी अनजाना होता है। उसके अंदर लापरवाही का भाव होता है। सो वह न तो मन में शांति ही महसूस कर पाता है और न ही इक्षाओं की पूर्ति के लिए इन्द्रियों से क्रियाशील हो पाता है है।
एक प्राणी में तीनों गुणों का समावेश होता है और व्यक्ति की प्रवृत्ति इस बात पर निर्भर करती है कि किस काल में कौन से गुण की अधिकता परिलक्षित हो रही है। जब व्यक्ति में ज्ञान, विवेक, चेतना की अधिकता होती है तो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति का व्यवहार करता है और इस काल में उसमें सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया जैसे भाव होते हैं। एक व्यक्ति जब प्रकृति के नियमों के अधीन उनसे स्वाभाविक रूप से संचालित हो , चीजों को , घटनाओं को अपने विवेक से देखे तो वह सत्वगुणी होता है। सब कर्म करते हुए भी व्यक्ति बेचैन नहीं होता है बल्कि उसके मन में शांति होती है। यह शांति किसी बाहरी कारण से नहीं आती है। बल्कि उसका ज्ञान और विवेक उसे स्थिर करता है सो वह शांत रहता है। शांत, गुणि व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता है बल्कि सभी कर्मों को करता हुआ उनके परिणाम से अप्रभावित रहता है सो बेचैन नहीं होता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति किसी मोह, लोभ, लालच, ईर्ष्या, आदि से मुक्त होता है। उसे अपने कर्म अपना धर्म प्रतीत होता है जिसे उसे बिना किसी कारण के करना होता है। ज्ञान अपने आप व्यक्ति को सात्विक नहीं बनाता है, बल्कि उसका विवेक ज्ञान का उपयोग उसे कर्म करते हुए कर्मबन्धन से मुक्त करता है तभी वह सत्वगुणी हो पाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति में रजोगुण तो होता है किंतु उसकी मात्रा सत्वगुण से कम होती है। और इस व्यक्ति में तामसी गुण सबसे कम प्रभावी होते हैं।
सत्वगुण के प्रभाव में व्यक्ति की शांति, और सुख की भावना उसे प्रकृति से बाँधकर संसार से जोड़ती है। इसे व्यक्ति तभी पार पता है जब वह स्वयं शांत और सुख हो जाता है और शांति और सुख की खोज समाप्त हो जाती है।
व्यक्ति स्वयं का मूल्यांकन कर सकता है । यदि वह सत्वगुणी होना चाहता है तो उसे अपने इन गुणों को बढाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा तब होता है जब व्यक्ति की इन्द्रियाँ उसके अंदर अपने गुणों के अनुसार व्यवहार करती हैं और उनका उपयोग अन्य कारणों से व्यक्ति नहीं करता है।
और जब मन कामनाओं का उदय होता है तो काम के साथ जुड़ी अन्य भावनाएँ यथा, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, स्वार्थ आदि का भी उदय होता है और इन सब की पूर्ति हेतु मनुष्य क्रियाशील होता है। यह अवस्था रजोगुण के हावी होने का परिचायक है। इस समय व्यक्ति कामनाओं की पूर्ति हेतु कर्मफल की इक्षा से कर्म में प्रवृत्त होता है तो मनोकुल फलों का उपभोग करने की इक्षा रखता है। रजोगुण के सबसे अधिक प्रभावी होने के कारण व्यक्ति सकाम भाव से यानी कर्मफल की इक्षा को रखते हुए कर्म करता है और सकाम कर्म जनित भावों जैसे लाभ, लोभ, ईर्ष्या, स्वार्थ, भय, बैर, स्वार्थ , लोगों की सहायता, सहयोग आदि मिश्रित भावों से प्रभावित रहता है। इस अवस्था में व्यक्ति सकाम कर्मों से चलायमान रहता है।
और तमोगुण बढ़ने का परिचायक है कि व्यक्ति अज्ञान से भर जाता है। अज्ञान की अवस्था में व्यक्ति की समझदारी समाप्त हो जाती ह या कम हो जाती है, कर्म करने की प्रवृत्ति जाती रहती है , जिसके कारण व्यक्ति अनावश्यक की चेष्टाएँ करताha, और इन्द्रिय जनित भोगों में लिप्त होने की चेष्टा करता है। यह अवस्था निंद्रा और प्रमाद, बुद्धि के पतन और विवेक के खत्म होने और इन्द्रिय भोग में लिप्त रहने की अवस्था है।
इन गुणों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर इतना गहरा होता है कि व्यक्ति का समस्त अस्तित्व ही इन गुणों पर निर्भर करता है। सत्वगुण की वृद्धि से व्यक्ति अति उत्तम कोटि का जीवन प्राप्त करता है जबकि रजोगुण की अधिकता से व्यक्ति के अंदर अत्यधिक इक्षाएँ होती हैं और वह इन कामनाओं के मोह में फंसा रहता है। तमोगुण की वृद्धि अज्ञानता को बढ़ाता है जिससे उस व्यक्ति की अभिव्यक्ति अविवेकी, अज्ञानी जीव सदृश्य हो जाती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सत्वगुण की वृद्धि से जो सुख प्राप्त होता है और उत्तम कोटि की प्राप्ति होती है वह ज्ञान की बढोत्तरी, विवेक के प्रभाव और मोह से मुक्ति के कारण होता है। रजोगुण की वृद्धि से जो दुख मिलता है और जो मध्यम कोटि मिलती है उसका कारण होता है मोह, लोभ, आदि से उतपन्न दुख के कारण होता है। तमोगुण निम्न कोटि का जनक होता है क्योंकि यह आलस, अज्ञानता , प्रमाद आदि के कारण होता है।
इस सत्य को हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि गुणों का हमारी प्रवृत्ति पर क्या असर होता है। गुणों के प्रभाव से ही व्यक्ति की प्रवृत्ति बनती है। सो व्यक्ति को अपने उत्थान के प्रयास में गुणों के प्रभाव की समझ अवश्य होनी चाहिये। जब व्यक्ति के अंदर सत्वगुण बढ़ता है तो अन्य दोनों गुणों का प्रभाव कमतर हो जाता है और व्यक्ति माया, मोह , लोभ , लालच, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या आदि से दूर होकर ज्ञान और वैराग्य की तरफ बढ़ता है। वैराग्य का अर्थ मोह और मोह जनित प्रवृत्तोयों से मुक्ति है।
यदि व्यक्ति के अंदर रजोगुण बढ़े और अन्य गुण घटें तो व्यक्ति में कामनाओं और इक्षाओं वाली प्रवृत्ति बढ़ती है जो व्यक्ति को कामी, लोभी, ईर्ष्यालु, द्वेष करने वाला बनाती है जिससे व्यक्ति असत्य और हिंसा भी करता है।
और जब तमोगुण की बढ़ोतरी होती है तब आलस्य, प्रमाद, क्रियाशीलता से भागने, की प्रवृत्ति होती है। इस स्थिति में व्यक्ति अन्वेषण और प्रयास से भागता है और ज्ञान के प्रति अभिरुचि का अभाव होने लगता है।
गुणों के इन प्रभावों को समझने से व्यक्ति को अपनी प्रवृत्ति निर्माण में सहयाता मिलती है।
जैसी मति वैसी गति। जिस प्रकार की प्रवृत्ति होती है व्यक्ति के जीवन की उपब्धि भी वैसी ही होती है। सत्वगुण व्यक्ति को उच्च पद देता है , जबकि रजोगुणी व्यक्ति सामान्य मनुष्य ही बना रह जाता है और तमोगुण की अधिकता के प्रभाव में व्यक्ति का जीवन अधोगामी हो जाता है। विचारवान, बुद्धिमान विवेकी, मोहमुक्त व्यक्ति सांसारिक जीवन जीते हुए भी संसार के अवगुणों से मुक्त होता है जिसे महामानव, साधु, सज्जन आदि कहते हैं । जो व्यक्ति मोह पाश में बंधा हुआ है वह मोह जनित कामनाओं की पूर्ति में ही हमेशा चंचल हुआ औसत दर्जे का व्यक्ति बना जीवन व्यतीत करता है। लेकिन अज्ञान, प्रमाद, आलस्य आदि में डूबे हुए व्यक्ति में तो व्यक्ति होने के लक्षण ही समाप्त हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता के तेरहवें और चौदहवें अध्याय में बताया गया है कि किस प्रकार प्रकृति और पुरुष(क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ) एक दूसरे से बन्धे होते हैं। पुरुष यानी चेतना मूल रूप से साक्षी मात्र है। प्रकृति गुणों से युक्त होतो है। ये तीन गुण होते हैं, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। प्रकृति में सारा कुछ इन्हीं तीन गुणों के कारण घटित होता रहता है। पुरुष बस बना हुआ इन घट रही चीजों का द्रष्टा मात्र होता है अपने मूल रूप में। लेकिन जब प्रकृति से पुरुष का मेल होता है तो यही पुरुष अपनी द्रष्टा की भूमिका को गँवा देता है और गुणों और उनके कारण उतपन्न होने वाले परिणामों को भोगने लगता है। उस पुरुष को, उस चेतना को गुण जनित हर्ष, विषाद, सुख दुख आदि अपने साथ घटित होते लगते हैं। पुरुष द्रष्टा से भोक्ता हो जाता है। प्रकृति के गुणों और उनके परिणामों की परत पुरुष यानी चेतना पर चढ़ जाती है। जिस क्षेत्रज्ञ को क्षेत्र का ज्ञाता होना चाहिए था वही क्षेत्रज्ञ उस क्षेत्र का भागीदार बन जाता है। यही कारण है कि पुरुष को उसके मूल रूप में आने के लिए इन गुणों और गुण फलों से मुक्त होना होता है और इसे ही सनातन धर्म की भाषा में मोक्ष कहते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि पुरुष प्रकृति के साथ बना रहकर भी प्रकृति के गुणों से मुक्त हो तो कैसे हो। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति प्रकृति के तीनों गुणों और उनके कारणों और उनके फलों को पहले समझे। इसी समझ के बूते वह अभ्यास द्वारा गुणों के सोपान को चढ़ते चढ़ते गुणातीत होता है यानी गुणों से मुक्त होता है। बिना गुणों, उनके कारणों और उनके परिणाम को जाने व्यक्ति तमोगुण से रजोगुण और रजोगुण से सत्वगुण की यात्रा पूरी नहीं कर सकता है। दरअसल अभ्यास की यह पूरी प्रक्रिया एक तरह से छानने (फिल्टरेशन) की प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक एक कर अपने गुणों से मुक्त होता है। सर्वप्रथम उसे सबसे अनुपयोगी गुणों से मुक्त होना होता है और शनैः शनैः वह एक एक कर सभी गुणों और उनके प्रभावों से मुक्त होता है।
जब हम कुछ करते हैं तो उस कार्य के साथ हमारा इंटेलक्ट भी जुड़ जाता है और हम उस कार्य के प्रति सचेत हो जाते हैं यानी हमारी चेतना भी उससे जुड़ जाती है। इसके कारण हमें लगता है कि ये कार्य हम कर रहें हैं, मैं कर रहा हूँ। जैसे ही मैं का भाव आता है हमारा अहंकार जागृत हो उठता है। ऐसे में हमारी भिन्न भिन्न भावनाएँ भी उस कार्य से जुड़ जाती हैं। हम तुलना करना शुरू कर देते हैं। इस प्रकार जो कार्य हो रहा है उससे हमारी चेतना जुड़ जाती है और इस बन्धन की वजह से हम प्रकृति से बन्ध जाते हैं। वह कार्य जो स्वाभाविक रूप से होता उससे हमारी चेतना के जुड़ जाने के कारण उसपर हम उस कार्य से ऐसे बन्ध जाते हैं मानो हमी उसे कर रहें हों।
इस बन्धन से मुक्त होने का मार्ग है कि हमारी चेतना इन घट रहे कार्यों से जुड़े नहीं बल्कि निरपेक्ष भाव से बिना किसी बन्धन के(बिना जजमेंटल हुए) कर्मों को होता हुआ देखे। यानी मात्र द्रष्टा भाव से बना रहे, साक्षी रहे। साक्षी को अपना इंटेलक्ट इन कर्मों से जुड़ने न दे। उदाहरण के तौर पर साँस का चलना ले सकते हैं। जब हम मात्र साँस के आने जाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो एक एक कर हमारे गुण हमारे अंदर आते जाते हैं। धीरे धीरे अभ्यास पूर्वक हम उनसे खुद को मुक्त करें ।जब हम मात्र इस बात से अवगत हो जाते हैं कि कर्म अपनी मति और गति से हो रहें हैं , उनमें मेरा कोई योगदान नहीं है , हम तो बस उन कर्मों के साक्षी मात्र हैं तो उस अवस्था में हम जो साक्षी मात्र हैं वही ईश्वर है जो बिना प्रकृति से बन्धे मात्र द्रष्टा है, साक्षी है।
दरअसल हम जो कुछ ""मैं"" ""मेरा"" अनुभव कर रहे होते हैं वह हमारी चेतना का गुणों से जुड़ने के कारण ही होता है । गुणों से मुक्त जो स्व की चेतना होती है उसी अवस्था में व्यक्ति ईश्वर के साथ हो जाता है । यही अवस्था अहम ब्रह्मास्मि की है।
गुणों के सम्बंध में जब समझ प्राप्त होती है तब गुणों से मुक्ति का मार्ग दिखता है। गुणों से मुक्ति ही चैतन्य की प्राप्ति होती है। मनुष्य का शरीर जिन तत्वों से बना होता है वे हैं बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय। इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है।
इन सभी की अभिव्यक्ति गुणों के कारण ही होती है। सुख दुख, रोग, कष्ट, हर्ष विषाद आदि जितने तरह के अनुभव हैं ये सब शरीर, मन, बुद्धि और विवेक की अवस्थाएँ भर हैं जो गुणों से व्यक्त होती हैं परंतु इनमें से कोई मेरा नहीं है यानी इनमें से कोई मेरी आत्मा का नहीं है । ये सब गुणों के माध्यम से शरीर, मन, बुद्धि और विवेक से जुड़े होते हैं चेतना से नहीं। शरीर तो मात्र पिंड भर है। अंधेरे में उपलब्ध वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता है किंतु जब उस अंधेरे में एक प्रकाशपुंज उस वस्तु पर गिरता है तो उस वस्तु का जिसका अँधेरे में कोई अस्तित्व नहीं था प्रकाश पड़ते उसका अस्तित्व सामने आ जाता है। इसी प्रकार शरीर का तब तक कोई अस्तित्व नहीं होता है जब तक उसे चेतना की प्राप्ति नहीं होती है। जैसे प्रकाश वह वस्तु नहीं होती है जिसे वह प्रकाशित कर जिसे वह अस्तित्व प्रदान कर रही होती है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकाश और वस्तु एक ही है। लेकिन यदि वह वस्तु न भी रहे तो भी प्रकाश तो रहेगा ही। उस वस्तु के अपने गुण हैं जो प्रकाश की उपस्थिति में सामने आते हैं। भिन्न भिन्न वस्तुओं के भिन्न भिन्न गुण हैं और ये सभी एक तरह के प्रकाश की वजह से सामने आते हैं। प्रकाश का अपना कोई गुण उन वस्तुओं की उपस्थिति का, उनकेव रूप रंग आकार कोई कारण नहीं बनता है। यही तो इस शरीर के साथ है। शरीर की प्रकृति में गुण हैं लेकिन सभी शरीरों में एक ही चेतना है यानी समस्त प्रकृति में पुरुष तो एक ही है। इसका कोई गुण नहीं। बस प्रकाश की भाँति यह हमारी प्रकृति के गुणों को सामने ला देता है और हम चेतना को ही अपनी प्रकृति औए उसका गुण समझने की भूल कर बैठते हैं। सो हमें गुणों से मुक्त होकर उस मूल पुरुष को पाना होता है जो सभी प्रकृति को उनके गुणों सहित हमारे समक्ष उद्घाटित करता है। और यह तभी होता है जब हम अपने अस्तित्व से गुणों को पूर्णतः हटा पाने में सक्षम होते हैं। तब हम एकमात्र पुरुष के रूप में स्वयं को पाते हैं।
यह सब समझ कर पाने के लिए निरन्तर अभ्यास और अभ्यास जनित उन्नति की आवश्यकता होती है अन्यथा अधिकांश बार तो हम ऊपर चढ़कर फिर नीचे फिसल आते हैं।
जब यह स्पष्ट है कि गुणों से आगे जाकर यानी गुणों से ऊपर उठकर अर्थात गुणों से मुक्त होकर ही व्यक्ति आत्मा को यानी अपनी चेतना से मिल पाता है, पुरुष प्रकृति से भिन्न स्वयम को पुनः स्थापित कर पाता है तो जो बहुत स्वाभाविक प्रश्न तो उठते हीं हैं मन में कि
1.जो व्यक्ति प्रकृति से भिन्न मात्र पुरुष की स्थिति वाला होता है यानी उसमें गुण नहीं रह जाते हैं मात्र उसकी चेतना यानी आत्मा ही होता है वैसे व्यक्ति को पहचानने के क्या लक्षण होते हैं?
2.ऐसे व्यक्ति का आचरण यानी व्यवहार कैसा होता है?
3.और वो कौन सी विधि है जिससे यह अवस्था प्राप्त की जा सकती है?
इन प्रश्नों का उत्तर पाकर ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होने के मार्ग पर बढ़ सकता है। ध्यान रहे कि इसी तरह का प्रश्न अध्याय 2 में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के सम्बन्ध में भी पूछा गया है और वँहा भी इसपर चर्चा हुई है।
गुणातीत व्यक्ति उस व्यक्ति को कहते हैं जो सभी गुणों की उपस्थिति या अनुपस्थिति से अप्रभावित होता है। ऐसा व्यक्ति
सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश यानी अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता को,
और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को
तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह यानी निद्रा और आलस्य आदि की बहुलता से अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतन शक्ति के लय होने को
भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है।
इस प्रकार का व्यक्ति जो एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अन्तःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहादि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं।
ऐसा नहीं है कि गुणों से पार हुए व्यक्ति के जीवन से गतिविधियाँ समाप्त हो जाती हैं। उसके जीवन में तीनों गुण अपना अपना कार्य उस व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा करते रहते हैं। लेकिन वह व्यक्ति इन गुणों और उनके कार्यों में लिप्त नहीं होता है बल्कि उनसे पूरी तरह से अलग रहता है। जो कुछ उसके मन , बुद्धि, विवेक और शरीर से हो रहा है उनके प्रति उसे न तो कोई मोह होता है न ही दुराव बल्कि वह तो इन कार्यों को इन्द्रियों की स्वाभाविक गति मानकर उन्हें होते हुए देखता भर है।
गुणातीत व्यक्ति यह समझता है कि प्रकृति में सारी क्रियाएँ चलती रहेंगी लेकिन वह यह बात भी समझता है कि जो कुछ हो रहा होता है उसमें उसका कोई योगदान नहीं है बल्कि सब कुछ तीन गुणों के परस्पर संयोग से घटित हो रहा है । गुणों के इस संयोग से वह स्वयं को अलग रखता है यानी भले वह गुणों की परस्पर क्रियाओं के बीच रहता है लेकिन गुणों से अछूता रहता है। वह मात्र द्रष्टा होता है। गुणों के प्रभाव से न तो वह उत्साहित होता है न ही हतोत्साहित। वह जानता है कि वह है तब भी यह सब संसार में चलता रहेगा, वह नहीं है तब भी यह सब होते रहेगा। यानी वह जानता है कि वह इन घट रही घटनाओं का कर्ता वह नहीं है बल्कि गुण हैं और गुण उससे अलग हैं।
जो व्यक्ति गुणों के प्रभाव में होता है वह स्वयं को गुणों और उनके प्रभाव से आँकता है। उसे लगता है कि जो कुछ हो रहा है वह सब उससे सम्बन्धित है। वह अपनी पहचान को गुणों और उनके परिणामों के दर्पण में देखता है।
किन्तु हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रकाश का अस्तित्व वस्तु पर निर्भर नहीं करता है। यह सही है कि जब प्रकाश पुन्ज किसी वस्तु पर पड़ता है तो वस्तु दिखती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वह वस्तु प्रकाश के अस्तित्व का कारण है। प्रकाश तो है हीं बस हमें उसका भान नहीं हो रहा होता है। जैसे कोइ वस्तु उसके मार्ग में पड़ता है हमें लगता है कि प्रकाश दिख रहा है। यही भ्रम है जो सत्य को सामने नहीं आने देता है। पुरुष प्रकृति से भिन्न है और प्रकृति के बिना भी उसका अस्तित्व उसी तरह से है। बस होता यह है कि पुरुष की उपस्थिति से प्रकृति का रूप रंग सामने आ जाता है। लेकिन इसका तातपर्य यह नहीं है कि प्रकृति के कारण पुरुष का अस्तित्व है।
गुणातीत व्यक्ति समझता है कि जो गुण और उसके प्रभाव व्यक्त हो रहें हैं वे उसके पुरुष भाग के कारण नहीं हैं बल्कि पुरुष भाग यानी चेतना की उपस्थिति के कारण गुण और गुणों के प्रभाव परिलक्षित हो रहें हैं। इसी कारण से गुणों से पार हुआ व्यक्त सुख और दुख में समान रहता है, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान समझता है, प्रिय और अप्रिय दोनों के प्रति एकी भाव से रहता है और अपनी निंदा और स्तुति से उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उसे ज्ञात होता है कि ये सब कुछ उसके नहीं हैं बल्कि गुणों के हैं और वह मात्र उनको घटित होते देखने का अधिकारी है।
जब व्यक्ति यह समझता है कि उसके कर्म और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया मात्र गुणों की अभिव्यक्ति भर है और उसकी चेतना को इससे कोई लेना देना नहीं है तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति यह समझता है कि उससे जो भी कार्य हो रहें हैं वे मात्र उसके गुणों की अवस्था के द्योतक भर हैं तब वह व्यक्ति इस दर्प से मुक्त रहता है कि वह कर्ता है। उसे पता होता है कि इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से गुणों की अवस्था को अभिव्यक्त कर रहीं हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को किसी भी कार्य में न तो सम्मान का अनुभव होता है और न हीं अपमान का। साथ ही उसके लिए न तो कोई प्रिय है न अप्रिय, बल्कि सबों के लिए वह सम्भाव में ही रहता है।
गुणों से और उनके प्रभावों से पार पाने का एक मार्ग भक्ति भी है। ऐसी भक्ति जिसमें अपने आराध्य पर अटल भरोसा होता है, जिसके प्रति श्रद्धा सर्वोपरि होता है और जिससे अटूट प्रेम होता है। भक्त के अंदर न तो कोई अभिमान होता है , न ही उसे आराध्य से कोई स्वार्थ ही होता है। जब व्यक्ति परम् समर्पण की स्थिति में आ जाता है तो फिर उसके सारे स्वार्थ, उसका समस्त अभिमान समाप्त हो जाता है और वह तब बिना किसी कारण के ही आराध्य पर अटूट विश्वास और उनके प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम रखने लगता है। तब न तो उसके अंदर गुणों का कोई असर रह जाता है और न उन गुणों के परिणाम का। यही अवस्था तो गुणातीत की अवस्था होती है। और यही परम् ब्रह्म यानी आराध्य में विलीन होकर "अहम ब्रह्नस्मि" की अवस्था होती है।
व्यक्ति के जीवन में गुणों की भूमिका को जानने के बाद और यह जानने के बाद कि इन गुणों से आगे बढ़कर चलने से व्यक्ति ब्रह्मलीन की अवस्था को प्राप्त करता है यह जानना भी आवश्यक है कि आखिर व्यक्ति को इस प्रयास की आवश्यकता क्या है। दरअसल व्यक्ति को अपने गुणों पर और उनके प्रभावों पर जीत हासिल करने पर जो पद प्राप्त होता है वह ईश्वरीय पद हीं है। और इसका महत्व इस वजह से क्योंकि इसी अवस्था में नित्य धर्म, उस स्थिति का जिसमें अजरता होती है, जिसमें समस्त ज्ञान भी होता और जिस अवस्था में प्राप्त आनंद बिना किसी कारण के अखण्ड होता है वह प्राप्त होता है। जब व्यक्ति अपने सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से आगे निकल जाता है तो उसका नाश शरीर की मृत्यु के बाद भी नहीं होता है, उसके समस्त कर्म और आचरण धर्म अनुरूप होते हैं और उसके आननद का कोई बाहरी कारण नहीं होता अपितु वह इस अवस्था में सिर्फ आनंदित ही हो पाता है , दुख उसे हो ही नहीं सकते हैं।
इस प्रकार इस अध्याय में गुण, उनके प्रभाव और उनसे मुक्ति का मार्ग और मुक्ति के बाद कि अवस्था का सम्पूर्ण विवरण मिल जाता है।
दरअसल गुणातीत होने का तात्पर्य है कि व्यक्ति गुणों और उनके प्रभाव से स्वयं को मुक्त कर ले। अति सामान्य भाषा में समझने तो इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति बाहरी प्रभावों से मुक्त होकर अपने भावों और भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीख ले। यह कई तरह से हो सकता है, ज्ञान मार्ग से, कर्मयोग से और भक्तियोग से भी। भक्ति का विशेष उल्लेख यँहा किया गया है। वस्तुतः भक्ति में मन एक मात्र आराध्य पर टिक जाता है और यह समझने लगता है कि जो कुछ है वह तो उसके आराध्य का प्रसाद मात्र है, सो कुछ भी न तो बुरा है न अच्छा बल्कि जैसा है बस है। इस भाव में व्यक्ति की कलुषित भावनाएँ स्वतः नष्ट हो जाती हैं और उसके अंदर अपने आराध्य की भक्ति के कारण मात्र प्रेम, क्षमा, सेवा, सत्य , अहिंसा जैसे भाव ही रह जाते हैं। यहीं तो पहुँचना है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः
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