श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 31 एवं 32, 33 एवं 34

श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 31 एवं 32, 33 एवं 34

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥ ।।31।।

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥ ।।32।।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥ ।।33।।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌॥ ।।34।।

हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता।

हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।

इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की समझ बताती है कि एक ही क्षेत्रज्ञ सभी क्षेत्रों में एक समान होता है। यही चेतना है जिसकी उपस्थिति से क्षेत्र यानी प्रकृति व्यक्त होती है। यदि इस चेतना का प्रकाश प्रकृति पर नही। पड़े यानी यदि प्रकृति में  इस चेतना का संचार नहीं हो तो फिर प्रकृति की अनुभूति ही नहीं होती है, उसका अस्तित्व ही नहीं ज्ञात होता है।  यह ठीक उसी प्रकार से सत्य है कि प्रकाश की अनुपस्थिति में जो है वह भी नहीं है सा ही जान पड़ता है। यानी प्रकाश की वजह से ही किसी भी वस्तु के होने की अभिव्यक्ति होती है।  यदि प्रकाश की उपस्थिति हमें भिन्न भिन्न वस्तुओं से परिचित कराती है किन्तु प्रकाश भिन्न भिन्न नहीं होता है। एक ही प्रकाश की उपस्थिति में पहाड़ भी अभिव्यक्त होता है, तो समुन्द्र भी, शेर भी तो पेड़ भी। यानी प्रकाश एक है, अनेक तो प्रकृति में  है । यही परमात्मा की समझ प्रदान करता है। वह परम चेतना यानी परम् ब्रह्म अर्थात परमात्मा तो एक ही है बस उसकी उपस्थिति में प्रकृति के भिन्न भिन्न स्वरूप प्रकट होते हैं। और यह एक परमात्मा ही आत्मा है । इसका न कोई आदि है, न ही अंत है, यह अजन्मा,  अपरिवर्तनीय, अक्षर, अजर और अमर है। यह स्वयं कुछ नहीं करता है , बल्कि मात्र द्रष्टा भाव से उपस्थित होकर अवलोकन करता है। जो कुछ कारक है वह प्रकृति के गुणों में है। जैसे प्रकाश में कोई लाल दिखता है, तो कोई पीला, कोई गोलाकर है तो कोई लम्बा। यह सब शरीर के पदार्थों की वजह से है, शरीर में अवस्थित आत्मा के लिए यह एक गैर जरूरी बात है कि कोई लम्बा, तो कोई नाटा है, कोई हरा है तो कोई नीला है।यह सब रूप रंग प्रकृति की देन है, चेतना यानी परमात्मा  तो मात्र द्रष्टा है।
         परमात्मा की  सर्व्यापकता को आकाश यानी स्पेस की सर्वव्यापकता से भी समझा जा सकता है। संसार के समस्त कण में स्पेस व्याप्त है भले भिन्न भिन्न पिंडों के कारण हमें स्पेस की सर्वव्यापकता का आभास नहीं हो पाता हो। दरअसल पिंडों की उपस्थिति से हमें इस बात का भ्रम हो जाता है कि भिन्न भिन्न पिंडों में व्याप्त स्पेस भिन्न भिन्न है। किंतु यदि हम सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो पाएंगे कि भिन्न भिन्न पिंडों में विभक्त स्पेस वृहत स्पेस से उतनी ही देर तक भिन्न प्रतीत होता है जब तक कि पिंड है। पिंड की समाप्ति के बाद पिंड में अवस्थित स्पेस क्या समाप्त हो जाता है? अगर यह प्रश्न हम खुद से करेंगे तो उत्तर भी खुद ही मिल जाएगा। पिंड की समाप्ति के पश्चात उस पिंड को धारण करने वाला स्पेस और वह स्पेस जिसे  पिंड धारण किये रहता है दोनों पिंड के साथ समाप्त नहीं होते हैं बल्कि वे तो वृहत्तर स्पेस में मिल जाते हैं। इसी प्रकार एक ही सूर्य सभी को प्रकाशित करता है न कि भिन्न भिन्न वस्तुएँ जो भिन्न भिन्न रूप रंग की प्रतीत होती हैं भिन्न भिन्न सूर्य से प्रकाशित होती हैं। 
  जब हम इस सत्य को समझते हैं तो समझ  पाते हैं कि क्षेत्र अथवा पिंड अथवा प्रकृति की भिन्नता उसे समझ सकने वाले क्षेत्रज्ञ या पुरुष में भिन्नता के कारण नहीं होती है। क्षेत्र अथवा प्रकृति की भिन्नता तो उसके अपने गुणों के कारण होती है किंतु उन सभी भिन्न प्रतीत होने वाले क्षेत्रों में चेतना अथवा पुरुष एक ही है, जो सभी की आत्मा एक ही है और यह आत्मा जब पिंड में है तो आत्मा कहलाती है और जब इसको हम सर्वव्यापक स्तर पर एक ही रूप में देख पाते हैं तो वही आत्मा परमात्मा कहलाती है।  पिण्ड में अवस्थित आत्मा द्रष्टा भाव से पिण्ड में देखते हुए निर्लेप रहता है और यदि आत्मा में भोक्ता भाव जुड़ जाता है तो क्षेत्र अथवा पिंड यानी व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य होता है कि वह आत्मा पर चढ़ आये  प्रकृति के गुणों को आत्मा से अलग कर दे और यही प्रक्रिया यानी आत्मा को भोक्ता से द्रष्टा बना देने की प्रक्रिया ही मोक्ष की यात्रा है जो ज्ञान, ध्यान , कर्म, भक्ति, समर्पण से पूरी होती है और यही मोक्ष आत्मा को पिण्ड की सीमा से मुक्त कर उसे परमात्मा होने का ज्ञान हमें देता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः

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