श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 29
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 29
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ ।।29।।
और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है।
व्यक्ति पदार्थ और चेतना का, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का, प्रकृति और पुरुष का मेल है। पदार्थ, जिसे क्षेत्र और प्रकृति भी कहा गया है उसी में गुण होता है और गुणों के कारण यह परिवर्तनीय होता है और परिवर्तनीय होने के कारण वही सब कुछ करता है। दूसरी तरफ चेतना जिसे क्षेत्रज्ञ या पुरुष कहा गया है वह अपनिवर्तनिय है, सभी में एक ही है और वह परमपुरुष अथवा परमचेतना की ही अभिव्यक्ति है। चूँकि यह अपरिवर्तनीय है सो अकर्ता है यानी कुछ दिन करता है , साथ में उपस्थित होकर द्रष्टा बना रहता है अर्थात जिसकी उपस्थिति में प्रकृति क्रियाशील रहकर कर्ता बनी रहती है। यदि पुरुष या चेतना भोक्ता भी बन जाये तब भी सबकुछ भोगते हुए द्रष्टा ही रहती है, कर्ता नहीं होती।
जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है वही समझ पाता है कि वह व्यक्ति स्वयं कुछ भी नहीं करता है, जो होता है उसे उससे प्रकृति से मिलता है। आत्मा अकर्ता बनी रहती है और सबकुछ पदार्थ या प्रकृति या क्षेत्र कर रहा होता है।
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