श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 28

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 28


समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌॥ 28।।

क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।

इस संसार में सब कुछ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ से मिलकर ही बनता है। क्षेत्र पदार्थ है तो क्षेत्रज्ञ चेतना है। जब क्षेत्रज्ञ क्षेत्र से जुड़ता है तो क्षेत्रज्ञ द्रष्टा भाव से यानी साक्षी बनके क्षेत्र को देखता है। किंतु जब चेतना यानी क्षेत्रज्ञ क्षेत्र से आसक्त हो तब वही क्षेत्रज्ञ द्रष्टा से भोक्ता बन जाता है और क्षेत्र और उसके गुणों में होने वाले परिवर्तनों से प्रभावित भी होने लगता है। क्षेत्रज्ञ यानी पुरुष बिना क्षेत्र यानी प्रकृति के अपने मूल स्वरूप में ब्रह्म है किन्तु क्षेत्र से सम्बद्ध क्षेत्रज्ञ क्षेत्र के भावों का भोक्ता बम जाने पर उसके सुख दुख, लाभ हानि, जय पराजय आदि भाव से लिप्त होने लगता है।।प्राणी का कर्तव्य बनता है कि यह पुरुष यानी क्षेत्र यानी चेतना को पहचान कर उसको उसी मूल रूप में प्राप्त करे यानी कि उसकी चेतना उसके प्रकृति से मुक्त होकर उसे प्राप्त हो और उसे इस सत्य की अनुभूति हो कि समस्त प्राणियों में वही एक मात्र चेतना व्याप्त है। तब व्यक्ति ध्यान, ज्ञान, कर्म और श्रवण की विधियों से अपने स्व अर्थात आत्मा यानी पुरुष को प्रकृति अर्थात क्षेत्र से विलग कर देख पाता है। जब प्राणी शुद्ध चेतना की अनुभूतु करने में सक्षम हो जाता है तो स्वयं को आत्मरूप में पाता है। यही ईश्वर की प्राप्ति कहलाता है, यही तो मोक्ष है जब चेतना प्रकृति से मुक्त हो और इस बात की अनुभूति हो कि सभी चर अचर में यही एकमात्र चेतना है यानी एक ही परमात्मा सभी में व्याप्त है, उनमें भी जो उसे देख नहीं पा रहें अपनी अज्ञानता के कारण। जब व्यक्ति के पास यह ज्ञान हो तब वह अपनी आत्मा का स्वयं संरक्षक भी हो जाता है पर जो इस सत्य को नहीं समझ पाता है वह प्रकृति में पुरुष को लिप्त किये रहता है, उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल पाती है।


Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय