श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 24 एवं 25
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 24 एवं 25
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥ ।।24।।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ ।।25।।
उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान द्वारा हृदय में देखते हैं, अन्य कितने ही ज्ञानयोग द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोग द्वारा देखते हैं अर्थात प्राप्त करते हैं।
परन्तु इनसे दूसरे अर्थात जो मंदबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को निःसंदेह तर जाते हैं।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रकृति और पुरुष को समझने के पश्चात अब मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि पुरुष यानी क्षेत्रज्ञ जो ईश्वर ही है की प्राप्ति कैसे हो सकती है। इस हेतु चार मार्ग सुझाये गए हैं। और ये मार्ग हैं
ध्यान का मार्ग
ज्ञान का मार्ग
कर्म का मार्ग
श्रवण का मार्ग।
ध्यान का मार्ग सबसे कठीन है जिसकी चर्चा अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक विस्तारपूर्वक किया है। इस मार्ग में व्यक्ति अपनी समग्र एकाग्रता को सभी ओर से वापस खींच कर मात्र और मात्र अपने स्व पर केन्दित होता है। अपनी एकाग्रता को सभी ओर से तभी खींचा जा सकता है जब मन में पूर्णतः असंबद्धता का भाव हो यानी किसी भी चीज से कोई लगाव नहीं हो अर्थात पूर्ण सन्यास की स्थिति प्राप्त हो। जब व्यक्ति प्रकृति से मुक्त होता है तभी वह सम्बद्धता से भी मुक्त हो सकता है। मात्र और मात्र स्व पर केंद्रित होने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति जब कुछ देख रहा है तो उसकी चेतना प्रकृति के उस अंश को जिसे वह देख रहा है उसपर नही जा रही है बल्कि उसकी चेतना में प्रकृति समान है कोई गुण ही नही है। यही स्थिति है जब व्यक्ति आत्मा में आत्मा के द्वारा आत्मा को ही देख पा रहा होता है।
लेकिन ध्यान का मार्ग साधना की सर्वोच्च स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी प्रकृति का त्याग कर चुका होता है। अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति में नहीं भी पहुँचा हो तब भी वह उस मार्ग पर चलता हुआ जिससे उसे इसका ज्ञान मिलता है परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। ज्ञान मार्ग का वर्णन अध्याय 2 मेंक 11 से 30 तक विस्तारपूर्वक किया है और पुनः इस अध्याय में भी 20 तरीके इस ज्ञान की प्राप्ति के सुझाये और बताए गए हैं।
गीता में निष्काम कर्म की व्याख्या विस्तार से की गई है जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्तिपर्यन्त विस्तारपूर्वक किया है। दरअसल सारा ज्ञान और ध्यान तक पहुँचने का मार्ग इसी कर्मयोग के मार्ग से होकर ही जाता है और बिना इसपर चले न ज्ञान मिलता है, न ध्यान और न ही परमात्मा ही। कर्मयोग वह मार्ग है जिसपर चलकर व्यक्ति साधना का अभ्यास करता है और अपनी चेतना से प्रकृति के प्रभाव को मुक्त कर शुद्ध चेतना यानी परमात्मा को प्राप्त कर पाता है।
हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन तीनों मार्गों का अनुसरण नहीं कर पाए फिर भी उंसके अंदर अपनी परम् चेतना की स्थिति को यानी परम् चैतन्य की स्थिति को।प्राप्त करने की तीव्र ईक्षा बनी रहे। यदि ऐसा व्यक्ति तत्वज्ञानी गुरु की शरण में रहकर उनकी वाणी में चैतन्य अवस्था के सम्बंध में सुनता है तो अंततः उसे भी वही चैतन्य अवस्था यानी परम् चेतना अर्थात परमात्मा की प्राप्ति होती है।
दरअसल परमात्मा की प्राप्ति की यात्रा ऐसी यात्रा है जिसपर पथिक यदि एक बार चल भर देता है तो वह अंततः अपनी मंजिल तक पहुँचता ही है। बस आपको यात्रा शुरू भर करनी है, फिर बाकी का मार्ग स्वतः खुलते जाता है। इस यात्रा की शुरुआत श्रवण से होती है यानी इस यात्रा के सम्बंध में पहले च चुके और उस मंजिल तक पहुंच चुके यात्री के द्वारा किये वर्णन के श्रवण से होती है। फिर तो नया यात्री उसी से क्रमशः कर्म, ज्ञान और ध्यान का सिरा भी पकड़ ही लेता है। और अंततः व्यक्ति अपने ही प्रयास से, अभ्यास से, श्रद्धा और समर्पण से अपनी प्रकृति और उससे उतपन्न गुणों को धीरे धीरे त्यागते त्यागते शुद्ध चेतना का स्वामी बन जाता है। जैसे ही उससे उसकी प्रकृति पूर्ण रूप से अलग होती है वह चेतना भर रह जाता है और यही वह अवस्था होती है जब वह परमात्मा में विलीन हो जाता है।
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