श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 20, 21
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 20, 21
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥ ।।20।।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥ ।।21।।
कार्य और करण को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।
प्रकृति में स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
प्रकृति और पुरुष के बीच के सम्बंध से संसार के सत्य से परिचित कराता है। प्रकृति और पुरुष एक दूसरे की उपस्थिति में ही समझे जा सकते हैं, और इन दोनों के योग से ही संसार परिलक्षित होता है।
प्रकृति कार्य और करण से व्यक्त होती है। यँहा कार्य और करण को समझना जरूरी है। प्रकृति जिन पाँच महाभूतों से बनती है उसे ही कार्य कहते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है। और बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम 'करण' है। प्रकृति अपने कार्य और करण से खुद को प्रकट करती है।
प्रकृति में असीम सम्भावनाएँ होती हैं और प्रकृति अपनी इन्ही सम्भावनाओं के द्वारा संसार और संसार की विचित्रताओं को जन्म देती है । यह प्रकृति ही है जो कार्य और करण दोनों का कारण बनती है।
हमने समझा है कि पुरुष प्रकृति में निवास करता हुआ द्रष्टा भाव से बना रहता है। किंतु जब पुरुष प्रकृति से सम्बद्धता को अनुभव करने लगे तो फिर पुरुष का द्रष्टा भाव जाते रहता है और पुरुष भोक्ता भाव में आ जाता है। मन, बुद्धि, अहंकार और विवेक के माध्यम से प्रकृति जो कुछ प्राप्त करती है, पुरुष प्रकृति से अपने बन्धन की वजह से उसे अनुभव करता है और सुख दुख सहित अन्य सभी भावों को भोक्ता भाव से भोगता है।
हमने पहले ही समझा है कि क्षेत्र को समझने वाला क्षेत्रज्ञ क्षेत्र में वास करने वाली चेतना है। चेतना क्षेत्र में अवस्थित रहकर द्रष्टा भाव से क्षेत्र यानी शरीर का साक्षी बना हुआ रहता है। वही बात यँहा प्रकृति और पुरुष के माध्यम से समझाई गई है। पुरुष प्रकृति में अवस्थित होकर द्रष्टा भाव से उसे देखता है किंतु जब वह प्रकृति से बंध जाता है और भोक्ता हो जाता है यानी प्रकृति द्वारा उतपन्न गुणों के प्रभाव में आ जाता है। यानी आध्यात्मिक चेतना सांसारिक हो जाती है। प्रत्येक प्राणी स्वयम में प्रकृति और पुरुष का योग है। आगे हम समझेंगे कि किस प्रकार पुनः इस चेतना को बन्धन मुक्त कर आध्यात्मिक करना है।
पुरुष यानी शुद्ध चेतना का वास्तविक स्वरूप मात्र द्रष्टा का होता है जो प्रकृति में घट रही चीजों का साक्षी मात्र होता है किंतु प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से सम्बद्धता के कारण प्रकृति से उतपन्न तीनों गुणों का मात्र द्रष्टा नहीं रह जाता है बल्कि उसका भोक्ता बन जाता है, और इस भोक्ता भाव के कारण वह प्रकृति में सुख-दुख, लाभ-हानि, अच्छा-बुरा आदि को जीता है जो प्रकृति के गुणों से निकलते हैं। प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार प्राणी भिन्न भिन्न योनियों में भ्रमण करता है और अंततः उनसे मुक्त होने के लिए आवश्यक है कि पुरुष प्रकृति के साथ अपने सम्बद्धता को समाप्त कर पाए यानी इन तीनों गुणों से मुक्त हो सके।
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