श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 19

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्‌यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌॥ ।।19।।

प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान।

इस संसार को समझने के लिए हमें समझना चाहिए कि पुरुष और प्रकृति के बीच का सम्बंध क्या है। वस्तुतः क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ ही क्रमशः प्रकृति और पुरुष हैं।
      प्रकृति क्षेत्र है और इसकी समझ हमें वही होनी चाहिए जो क्षेत्र की समझ को हमने समझा है यानी 

""क्षेत्र यानी शरीर को उंसके अवयवों के साथ समझना आवश्यक है। शरीर मूल रूप से पाँच तत्व यानी आकाश, जल, अग्नि, पृथ्वी और वायु , इन पाँच तत्वों के पाँच इंद्रियों, दस कर्मेन्द्रियों, मन और बुद्धि  चित्त और अहंकार से बनता है। अहंकार का अर्थ मैं की चेतना से है जो शरीर के ईगो से प्रकट होता है। इनके अतिरिक्त क्षेत्र यानी शरीर में कई अन्य विकार भी सम्मिलित होते हैं जैसे, ईक्षा, सुख और दुख की भावना, द्वेष की भावना, , धृति(यानी सहने की क्षमता यानी forbearance)।""
यह प्रकृति तीन गुणों अर्थात सत्वगुण, रजो गुण और तमो गुण भी इसी प्रकृति की देन हैं। दूसरी तरफ इस प्रकृति को समझने वाले को ही पुरुष कहते हैं। पुरुष का वास इस प्रकृति में होता है किंतु पुरुष प्रकृति पर निर्भर नहीं होता है। प्रकृति में रहकर भी पुरुष द्रष्टा भाव से ही होता है , वह प्रकृति को होते हुए देखता है। 
     प्रकृति और पुरुष दोनों अजन्मा हैं यानी इनका कोई प्रारम्भ नहीं और अंत नहीं होता है। प्रकृति के तीनों गुणों की साम्यावस्था प्रकृति को अव्यकयक्त बनाती है और इनमें जब भी कोई विचलन होता है संसार परिलक्षित होता है। 

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