श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13



परिचय


हम कौन हैं और हमारा क्या औचित्य है? क्या हम वही हैं जिसे दुनिया देखती , सुनती और जानती है? हमारा खुद का खुद से क्या परिचय है? क्या हम खुद को खुद से अपने नाम, अपने रूप रंग, अपने भौतिक उपलब्धियों से ही जानते हैं या कुछ अन्य भी है? तो फिर हमारे होने का औचित्य क्या है?

   इन प्रश्नों का उत्तर हमें श्रीमद्भागवादगीता में तीन चरणों में मिलता है:-

प्रथम चरण में हम यह समझते हैं कि हम वो शरीर नहीं हैं जिसे देखा और भोगा जाता है, बल्कि इस स्थूल स्वरूप से भिन्न हम आत्मा हैं, यानी चेतना हैं।

द्वितीय चरण में हम ये जानते हैं कि परम सत्ता ईश्वर की है जिसे हम परमात्मा कहते हैं ।

और तीसरे चरण में हम समझते हैं कि चेतना के रूप में हम उस परम चेतना के ही प्रतिरूप हैं जिससे सम्पूर्ण संसार नियंत्रित और चालित है। 

      परमात्मा यानी परम् चेतना उस निराकार स्पेस की तरह है जिसे हम न तो देख सकते हैं , न ही हम उसे माप सकते हैं और न ही उसे कोई भौतिक रूप ही दे सकते हैं। हाँ हमें यह तो जरूर लगता है कि यह फलाना वस्तु है जिसका यह रूप रंग आकार है। इस स्वरूप में वह वस्तु कुछ स्पेस धारण करता है  किंतु द उस रूप रंग आकार के समाप्त होते ही वह स्पेस वृहत्त स्पेस में मिल जाता है। यही हाल मनुष्य के रूप में हमारा भी है। शरीर का स्थूल स्वरुप बाहरी है किंतु आत्मा उस वृहत्त परमात्मा का ही स्वरूप है और स्थूल शरीर एकआवरण मात्र है। चूँकि व्यक्ति का मूल उसकी आत्मा है और वह सभी जीवों में समान है सो सभी जीव एक समान ही ईश्वरीय स्वरूप की भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति मात्र हैं। और यही ईश्वरीय उद्गम व्यक्ति के अस्तित्व का औचित्य भी है।

        आत्मा और परमात्मा के इसी सम्बन्ध को, यानी अहम ब्रह्मास्मि के स्वरूप को श्रीमद्भागवादगीता के अध्याय संख्या 13 से 18 तक में निरूपित किया गया है।


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ ।।1।।

श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं।

        जीव के शरीर की तुलना क्षेत्र से की गई है और जो इस क्षेत्र को जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहा गया है। शरीर को क्षेत्र यानी field कहने के पीछे कारण यह है कि इस शरीर से हमारे कर्म निष्पादित होते हैं। और उन कर्मों के परिणाम भी इसी शरीर को प्राप्त होते हैं। यही शरीर सद्कर्मों को करते हुए धर्मक्षेत्र भी है और दुष्कर्मों को करते हुए कुरुक्षेत्र भी है। और जो शरीर के इस रहस्य को जानता समझता है वही क्षेत्रज्ञ है।
     शरीर में शरीर के भौतिक पदार्थों के साथ साथ मन , बुद्धि, विवेक, भावना भी आ जाते हैं। लेकिन इस शरीर की अनुभूति किस चीज से होती है? इसकी समझ उस चेतना से होती है जो शरीर की चैतन्य स्थिति से हमें अवगत कराता है। जरूरी नहीं कि शरीर धारण करने मात्र से हम शरीर के सत्य से परिचित ही हों । शरीर का सत्य तो हमें हमारी चेतना से ज्ञात होता है। यह चेतना ही किसी को क्षेत्रज्ञ बनाती है। बिना चेतना के शरीर की कोई अनुभूति नहीं होती है। यह चेतना हमें शरीर और इस शरीर के बुद्धि, विवेक, भावना से भी अवगत कराती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 2

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥ ।।2।।

हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान  और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है।

अब श्रीकृष्ण समझाते हैं कि शरीर की चेतना रखने वाला चैतन्य है कौन। इस शरीर यानी क्षेत्र का अस्तित्व तभी तक है जब तक कि हमें  इसके प्रति चेतना हो यानी इस क्षेत्र अर्थात शरीर को जानने वाला हो। यह अनुभूति बुद्धि, विवेक या मन से नहीं होती है बल्कि इसकी अनुभूति उस चेतना से होती है जो इस शरीर के प्रति शरीरधारी को चेतन करता है। वही चेतना क्षेत्रज्ञ है यानी क्षेत्र अर्थात शरीर को जानने वाला है।
     तो क्या इसका अर्थ ये हुआ कि जितने शरीर हैं , उतने क्षेत्रज्ञ भी होते हैं? नहीं। बल्कि सभी शरीरों में यह चेतना समान रूप से एक ही होती है और वह चेतना ही आत्मा या परमात्मा कहलाती है। यानी भिन्न भिन्न शरीरों को धारण करने के बावजूद भी सभी जीवों में एक ही चेतना का निवास है और वह चेतना कोई और नहीं परम् पिता परमेश्वर हैं। अर्थात शरीरों के स्तर पर भले ही जीवधारी भिन्न भिन्न हों किन्तु चेतना के स्तर पर सभी समान हैं, सभी एक हीं हैं। 
    यह शरीर बिना चेतना के निरर्थक है किंतु चेतना अपने अस्तित्व के लिए शरीर पर निर्भर नहीं है। हाँ चेतना की चेतना तभी हो सकती है जब शरीर हो और इस शरीर के द्वारा जीवधारी चैतन्य की चेतना को समझ पाता है। सो प्रत्येक शरीरधारी के लिए यह आवश्यक है कि वह शरीर से ऊपर उठकर शरीर की चेतना को समझने जानने का प्रयास करे। शरीर के स्तर पर भिन्न भिन्न जीवधारी भले भिन्न हों किन्तु चेतना के स्तर पर सभी शरीरधारी एक ही हैं क्योंकि सभी में एक ही परमात्मा की चेतना होती है और वही चेतना उन्हें अपने जीव होने की अनुभूति भी प्रदान करती है। इस प्रकार जब हमारे सोच के केंद्र में हमारी चेतना होती है तब हम समझ पाते हैं कि हम सब कोई अलग अलग जीव नहीं बल्कि एक ही ब्रह्म के स्वरूप हैं, हम सभी एक ही हैं।
       क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की यह समझ ही ज्ञान है। हम बहुत कुछ जानते हो सकते हैं किंतु इस समझ से अनजान हैं तो फिर हमें ज्ञान नहीं है। जब जीवधारी चेतना से अलग होकर मात्र शरीर के प्रति जागरूक होता है तो वह सांसारिक हो जाता है। किंतु जब वही व्यक्ति शरीर के परे शरीर की चेतना के प्रति जागरूक हो तो वह आध्यात्मिक होता है और इस स्तर पर उंसके अंदर किसी भी प्रकार का भेद भाव नहीं होता है बल्कि वह समझता है कि प्रत्येक जीवधारी और कुछ नही परम् पिता परमेश्वर का ही स्वरूप मात्र है। वह स्वयं को ब्रह्म के रूप में। पहचानता है और शरीर की  समस्त सीमाओं से मुक्त होता है।
        श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन में यह ध्यान रखना चाहिये कि क्षेत्र ही प्रकृति है और क्षेत्रज्ञ ही पुरुष है। क्षेत्र ही अपरा प्रकृति है और क्षेत्रज्ञ ही परा प्रकृति है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 3 एवम 4

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्‌।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥ ।।3।।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥ ।।4।।
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है- वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किए हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।

शरीर और शरीर को जानने वाले का परिचय तो हुआ लेकिन अब उनके बारे में बिस्तर से समझना भी तो जरूरी है। शरीर यानी क्षेत्र मात्र पदार्थ नहीं है बल्कि इसमें मन, बुद्धि, इन्द्रिय भी शामिल हैं और इसे जानने वाले को चेतना कहते हैं। शरीर की सारी गतिविधियां भिन्न भिन्न अंगों के अतिरिक्त उंसके मन, बुद्धि, विवेक और इंद्रियों से संचालित होती हैं। इसकी व्यख्या श्रीकृष्ण के पूर्व से होती आ रही है। ऋषियों ने, वेद मंत्रों ने और ब्रह्मसूत्र ने शरीर की और उसपर प्रभाव रखने वाले चेतन की व्यख्या की है। श्रीकृष्ण ने भी इसे पुनः परिभाषित किया है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 5 एवं 6

महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥ ।।5।।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌॥ ।।6।।

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना (शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति।) और धृति। इस प्रकार विकारों  तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए,  के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया।
 क्षेत्र यानी शरीर को उंसके अवयवों के साथ समझना आवश्यक है। शरीर मूल रूप से पाँच तत्व यानी आकाश, जल, अग्नि, पृथ्वी और वायु , इन पाँच तत्वों के पाँच इंद्रियों, दस कर्मेन्द्रियों, मन और बुद्धि  चित्त और अहंकार से बनता है। अहंकार का अर्थ मैं की चेतना से है जो शरीर के ईगो से प्रकट होता है। इनके अतिरिक्त क्षेत्र यानी शरीर में कई अन्य विकार भी सम्मिलित होते हैं जैसे, ईक्षा, सुख और दुख की भावना, द्वेष की भावना, , धृति(यानी सहने की क्षमता यानी forbearance)।
    इस प्रकार शरीर का निर्माण स्थूल पदार्थों और अव्यक्त अवयवों से होती है जिसमें शरीर होने की चेतना भी शामिल है। यह चेतना जब तक होती है तभी तक शरीर होता है, इसके समाप्त होते ही शरीर यानी क्षेत्र भी समाप्त हो जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 7 

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ ।।7।।

श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह।

क्षेत्र यानी शरीर को समझने वाले को क्षेत्रज्ञ कहा गया है। क्षेत्र यानी शरीर को कैसे जाना समझा जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति में ऐसे गुण हों जिनकी सहायता से हम क्षेत्र को समझते हैं।
इन गुणों को हम मूल्य भी कह सकते हैं और इन्हें ही दैवी गुण भी कहते हैं। इन्हीं गुणों को धारण कर व्यक्ति स्थितप्रज्ञ भी कहलाता है। 
     एक एक कर इन गुणों को देखते और समझते हैं। जब इन्हें समझ लेंगे तो इनको धारण करने में भी सहायता मिलती है।
1.श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव
          लोगों के अंदर ये अहम होता है कि उनसे बेहतर कोई अन्य नहीं है। उन्हें रूप , रंग, अपनी  उपलब्धि आदि पर अभिमान होता है और वे चाहते हैं कि दूसरे लोग इनके लिए उनकी प्रशंसा करें। ये एक ऐसा दुर्गुण है जिसके कारण हम सत्य देखने समझने में असमर्थ हो जाते हैं और हमेशा अपनी श्रेष्ठता के अभिमान में डूबे रहते हैं। यह आदत हमारे ईगो को खुराक देती है जिसके कारण हमें सत्य नहीं दिखता है। इस कारण हमें ऐसे अभिमान से मुक्त होना चाहिए।
2.दम्भ का अभाव
         जो चीज हमारे पास नहीं होती है उंसके होने का दिखावा करना ही दम्भ है और हमेमें से सभी लोगों को यह दुर्गुण होता है। हम दिखावे के लिए विद्वान या कुछ ऐसा दिखने की कोशिश करते हैं जिसे लोग मान्यता देते हैं। इस कारण हम हमेशा अपने बने असत्य के जाल में उलझे रहते हैं । यदि हमें सत्य को जानना है तो दम्भ से मुक्त होना होता है।
3. किसी भी प्राणी को किसी भी तरह नही सताना
      किसी को भी पीड़ा देना हिंसा है। यह पीड़ा हम वाणी या क्रिया से देते हैं।  हिंसा में पीड़ा देने से लेकर हत्या तक शामिल है। इस प्रकार की पीड़ा देने के पूर्व हमें स्वयम को भी अंदर से पीड़ा देनी होती है। जैसे ही हम किसी को हानि पहुँचाने का विचार करते हैं उंसके प्रति द्वेष, क्रोध, जैसे भाव हमारे अंदर जन्मते हैं जो हमें ही पहले अशांत करते हैं और तब हम उस जीव को हानि पहुँचा पाते हैं। इस कारण हम शरीर की स्वाभाविक गति को नही समझ पाते हैं। सो यह आवश्यक है कि हम किसी द्वेष, क्रोध , लालच आदि के अधीन आकर किसी को पीड़ा पहुँचाने के दुर्गुण से बचें।
4. शान्त भाव का होना
      हमारे अंदर किसी प्रकार की अशांति न हो इसका हमें ध्यान रखना होता है। मोह जनित माया, क्रोध, ईर्ष्या, लालच, हिंसा आदि के भाव हमें अशांत करते हैं , सो अशांति के मूल को खत्म करना अनिवार्य होता है।
5.मन-वाणी की सरलता 
         जब हमारे मन , वाणी और कर्म में सरलता होती है और यह सरलता स्वभावतः आती है तब हमारी स्थिति शान्त और संयमित होती है। ऐसी स्थिति में हम किसी का न तो अपमान करते हैं और न किसी के व्यवहार से अपमानित होते हैं।
6.श्रद्धा भक्ति सहित गुरु सेवा
        हम सभी को ज्ञान स्वतः नहीं मिलता है बल्कि कोई न कोई हमें दिशा दिखाता है। वही हमारा गुरु है। लेकिन हम क्यों किसी की बात माने भला। गुरु और गुरु की शिक्षा पर भरोसा बनाये बिना ज्ञान नहीं हासिल हो सकता। लेकिन यह भरोसा बनता कैसे है? दरअसल जब हमें गुरु के प्रति श्रद्धा होती है तभी विश्वास हो पाता है और जब विश्वास होता है तो उनकी शिक्षा में लगन लगता है। बिना शिक्षा पाए मार्ग नहीं सूझता है। सो यह श्रद्धा अनिवार्य है और जब मन में गुरु और गुरु  के द्वारा दी गई शिक्षा पर भरोसा है तो गुरु और उनकी शिक्षा दोनों को ही हम आत्मसात करते हैं। जब गुरु शिष्य के प्रति श्रद्धा और विश्वास का यह बन्धन बनता है तो उनके प्रति सेवा की भावना भी बलवती होती है। प्राप्त शिक्षा का हम उसके उद्देश्य हेतु उपयोग करते हैं। इसके विपरीत यदि अहंकार भाव से गुरु से शिक्षा को हासिल करते हैं तो फिर उनसे प्राप्त शिक्षा का हम गलत उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रयोग करते हैं। द्रोण पांडवों और कौरवों दोनों के गुरु थे लेकिन पांडवों के मन में उनके प्रति श्रद्धा थी सो वे कभी भी उनसे प्राप्त शिक्षा के बल पर अत्याचार अनाचार नहीं करते हैं। लेकिन कौरव पक्ष में अहंकार था सो वे उसी शिक्षा का उपयोग राज्य हड़पने और स्त्री छिनने के लिए करते हैं।
7.बाहर भीतर की शुद्धि
         बिना राग, द्वेष, ईर्ष्या, कपट के जब हम व्यवहार करते हैं तो यह शुद्ध आचरण कहलाता है। इन भावों से अलग रहना आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए जब हम किसी अन्य से कपट पूर्ण व्यवहार करते हैं तो उस व्यक्ति के साथ कपट करने के पूर्व हम स्वयं के मन में उंसके प्रति विद्वेष का भाव उतपन्न करते हैं जिससे सबसे पहले हमें स्वयं ही कष्ट होता है, पहले हम स्वयं को धोखा देते हैं। फिर उस विद्वेष के वशीभूत होकर उस व्यक्ति के साथ कपट करते हैं। इस प्रकार हम पहले स्वयं के साथ हिंसा करते हैं , स्वयं से झूठ बोलते हैं तभी हम दूसरे के प्रति छल कर पाते हैं। सो हमें इन दुराचरण पूर्ण व्यवहार करने की प्रवृत्ति को नहीं ग्रहण करना चाहिए।

8.अन्तःकरण की स्थिरता
       मन को सत्य के प्रति समर्पित कर देने के उपरांत व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मन , वचन और कर्म से अपने लक्ष्य यानी अपने सत्य की प्राप्ति के प्रति स्थिर रहे। व्यक्ति को बारम्बार अपने आचार विचार में बदलाव नहीं लाना चाहिए।
9.मन सहित इंद्रियों का निग्रह
         हमारी इन्द्रियाँ अपना स्वभावगत आचरण करती रहती हैं। किंतु मन इंद्रियों को उनके आचरण में शुद्धता लाना सिखलाता है। यदि मन यह काम नहीं करे तो फिर इन्द्रियाँ अपने विषयों को उद्वेलित करती हैं और हमें दुराचरण करने के लिए प्रेरित करती हैं। यह एक खतरनाक स्थिति होती है जब हम अनियंत्रित मन के वश में होकर अपनी इंद्रियों से उन चीजों को करने लगते हैं जिनसे हमारी और समाज की स्थिरता प्रभावित होती है। सो मन और मन के द्वारा इंद्रियों को उनके बहकावे से बचाना चाहिए।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 8

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌।। ।।8।।

इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।

10.भोगों में आसक्ति का अभाव
          जब व्यक्ति इंद्रियों को उनके स्वाभाविक अर्थ में रहने देता है और उनके कर्मों से राग और द्वेष नहीं रखता है तब जाकर उसे सांसारिक सुखों की लिप्सा से छुटकारा मिल पाता है, अन्यथा यदि आप इंद्रियों से संसार के मिलने वाले सुखों की ओर आकर्षित होते हैं तो फिर उन इंद्रियों को उन्हीं कर्मों की तरफ आप बार बार प्रेरित करते हैं। नतीजा यह निकलता है  व्यक्ति उनमें लिप्त होते जाता है और फिर उनके लिए बुरा से बुरा, गलत से गलत आचरण करने में नहीं हिचकता है।

11.अहंकार का अभाव
         जो करते हैं हम ही करते हैं, कर्तापन का यह भाव मन में घमंड भी भरता है और असफलता की स्थिति में निराशा भी, हताशा भी। सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति समझे कि कर्ता वो नहीं है और जो कुछ वह करता है वह स्वाभाविक रूप से उंसके कर्म करने के धर्म के कारण करता है। जब इस भाव से व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त होता है तो उसमें कर्तापन का अहंकार नहीं उपजता है।

12जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।
          शरीर अस्थाई है , वस्तुतः व्यक्ति के पास, उंसके इर्द गिर्द जो कुछ है वह सब अस्थाई है। इनसे अनुराग कष्ट के कारण बनते हैं क्योंकि जो मिलता है , उसमें धीरे धीरे , समय के साथ क्षरण होना ही है सो उंसके अनुराग दुख के कारण बनते हैं। अतः आवश्यक है कि व्यक्ति शरीर के अवस्थाओं की वास्तविकता से परिचित रहकर उनसे बिना लिप्त हुए रह सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 9

असक्तिरनभिष्वङ्‍ग: पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ ।।9।।

पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना।

13.आसक्ति का अभाव
        जब व्यक्ति किसी से बहुत जुड़ जाता है तो उसकी वजह से मोह और मोह जनित अन्य भाव जैसे लोभ, ईक्षा, ईर्ष्या, आदि का जन्म अवश्यम्भावी हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने जुड़ाव के बन्धन के कारण कुछ भी सही देख पाने में असमर्थ हो जाता है। वैसे जुड़े व्यक्ति या वस्तु के विलगाव से उसे दुख और क्रोध, निराशा और लोभ होते हैं जिसके कारण उसका चित्त चंचल हो उठता है । सगे सम्बन्धियों , मित्रों आदि के प्रति प्रेम होना बुरी बात नहीं होती है, बुरा तब होता है जब यह प्रेम बन्धनकारी हो जाता है और व्यक्ति उस प्रेम में दायित्वबोध से शून्य होने लगता है जिसके कारण से वह हिंसा, असत्य, लोभ आदि का भी वरण करने से नहीं हिचकता है जो उसे कर्तव्य से विमुख कर देते हैं। सो व्यक्ति को आसक्ति रहित होने का अभ्यास करना चाहिए।
14.ममता का अभाव
       व्यक्ति जब खुद को अन्य के अस्तित्व से पहचाने तो उसके अंदर एक ममत्व का भाव आ जाता है। यह ममत्व उसे दुख तो देता ही है, साथ ही साथ ममता में उलझ कर वह अनर्गल निर्णय भी लेने लगता है जिस कारण से वह अपने मौलिक कर्तव्य से विमुख हो जाता है।
15.प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना
      आसक्ति और ममत्व से मुक्त व्यक्ति हर स्थिति में चाहे वह स्थिति मनोकुल हो या न हो संयमित बना रहता है। उसे न प्राप्ति से सुख होता है न विलगाव से दुख। सुख और दुख, लाभ और हानि जैसे द्वामदात्मक युग्मों से मुक्त व्यक्ति हर स्थिति में एक भाव रहकर निर्णय लेने और कर्तव्य निर्वहन में सक्षम होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 10

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥ ।।10।।

मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना।

16.अव्यभिचारिणी भक्ति

               सत्य की प्राप्ति के  लिये आवश्यक है कि व्यक्ति को सत्य के स्रोत पर अटूट विश्वास ही नहीं हो बल्कि उसपर अटूट श्रद्धा भी हो ताकि उसका ध्यान भटके नहीं। इसी अटूट श्रद्धामयी विश्वास को  श्रीकृष्ण ने अव्यभिचारिणी भक्ति का नाम दिया है। इसके अभाव में व्यक्ति जो कुछ करता है उसी के प्रति उसके मन में संशय हो सकता है और संशय व्यक्ति को सत्य के मार्ग से भटका देता है।

17.एकांत वास
              एकांत में रहने की प्रवृत्ति व्यक्ति के मन को शांत करती है। उसे तरह तरह के भटकाव से बचाती है। यदि व्यक्ति एकांत स्थान में जिसमें शुद्धता हो रहने का आदि होता है तो वह उन तमाम विचारों, और कर्मकांडों से बच पाता है जो उसके संकल्पों को डिगा सकते हैं। ध्यान रहें यह  प्रवृत्ति हमें इस बात के लिए प्रेरित नहीं करती है कि हम अन्य लोगों से दूर भाग जाएं। और न ही यह प्रवृत्ति हमें सामाजिक संव्यवहार से दूर करने के लिए होती है। साथ ही यह हमें ये शिक्षा भी नहीं देती है कि हम अपना जीवन अकेलेपन में गुजारे। एकांत और शुद्ध स्थान में रहने की प्रवृति का अर्थ है कि व्यक्ति असम्बद्ध भाव से, असंगत भाव से यानी निर्लेप भाव से रहते हुए माया, मोह से दूर रहे और निरन्तर सत्य के सम्बंध में चिंतन करता हुआ अपने कर्म, अपने दायित्वों का निर्वहन करे। 
18.विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना
     श्रीकृष्ण पुनः इस बात पर बल देते हैं कि स्वयं के अन्वेषण में चिंतनशील व्यक्ति को वैसे लोगों से दूर रहना चाहिए जो निरन्तर इन्द्रियों के विषयों के भोग में लिप्त रहते हैं क्योंकि ऐसे विषयभोगी लोगों के जीवन का लक्ष्य इन्द्रियों से प्राप्त आनंद के लिए जीवन को होम करना होता है। इसकारण ऐसे लोग माया, लोभ, वासना, ईर्ष्या जैसे दुर्गुणों में आसक्त हुए रहते हैं और हमेशा ही शारीरिक सुख के लिए दूसरों को क्षति पहुँचाने के लिए ततपर रहते हैं। यदि कोई व्यक्ति आत्मचिंतन में लगा हुआ सत्य को प्राप्त करने के लिए प्रत्यनशील है तो ऐसे लोगों की संगति से उसका ध्यान आत्मिक सन्तुष्टि से हटकर दैहिक सन्तुष्टि पर चले जाने की आशंका होती है जिसके परिणामस्वरूप उसके सारे प्रयास निरर्थक हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ ।।11।।

अध्यात्म ज्ञान में (जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है) नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।
 
19.अध्यात्म ज्ञान
          संसार में ज्ञान दो प्रकार का है, एक है सांसारिक ज्ञान और दूसरा है आत्मज्ञान। आत्मज्ञान को अध्यात्म कहा जाता है जिसमें व्यक्ति अपने स्व यानी अपनी आत्मा के सम्बंध में विचार करता है और इसके माध्यम से वह ईश्वर से तादाम्य जोड़ता है। सांसारिक ज्ञान संसार में रहकर जीवकोपार्जन करने के लिए तथा प्रकृति के रहस्यों को।समझने के लिए आवश्यक है किंतु मात्र इस ज्ञान से व्यक्ति अपने जीवन मूल्यों को परिमार्जित नहीं कर पाता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं का अन्वेषण करते हुए ईश्वरीय मार्ग का अनुसरण करें। जिस व्यक्ति को अध्यात्म का ज्ञान होता है वह ईश्वरीय मार्ग पर सदाचार युक्त आचरण करता हुआ अग्रगामी होता है। इस प्रकार का व्यक्ति ही सांसारिक ज्ञान का भी सदुपयोग संसार के उत्थान और कल्याण के लिए कर पाता है।

20.तत्वज्ञान
          अध्यात्म के ज्ञान के साथ साथ तत्वज्ञान भी आवश्यक है। तत्वज्ञान भौतिकी या रसायन शास्त्र का ज्ञान नहीं है बल्कि इस ज्ञान के द्वारा व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के सम्बन्धों को समझ पाता है। शरीर मात्र पिण्ड ही है किंतु चैतन्य की उपस्थिति शरीर को उसकी महत्ता, उसका उद्देश्य प्रदान करती है। और व्यक्ति यह समझ पाता है कि पिण्ड रूपी उसका शरीर जब आत्मा को धारण करता है तो उसका एक ही उद्देश्य होता है कि किस प्रकार आत्मा का परमात्मा में विलय हो सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11 का द्वितीय भाग (ज्ञान अथवा दैवी सम्पदा)

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ ।।11।।

नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।

           जब व्यक्ति आत्म अन्वेषण पर निकलता है तो उसे कुछ नियमों का पालन करना होता है। यही नियम वे गुण हैं जिनको अभ्यास से अपना कर व्यक्ति आत्मान्वेषण कर पाता है। इन्हीं नियमों और गुणों को ज्ञान भी कहा गया है और इन्हें ही दैवी सम्पद भी कहा गया है। इनमें जो महत्वपूर्ण हैं उनको निम्न तरह से व्यक्त किया गया है
1.श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव
2.दम्भ का अभाव
3. किसी भी प्राणी को किसी भी तरह नही सताना
4. शान्त भाव का होना
5.मन-वाणी की सरलता 
6.श्रद्धा भक्ति सहित गुरु सेवा
7.बाहर भीतर की शुद्धि
8.अन्तःकरण की स्थिरता
9.मन सहित इंद्रियों का निग्रह
10.भोगों में आसक्ति का अभाव
11.अहंकार का अभाव
12. जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना
13.आसक्ति का अभाव
14.ममता का अभाव
15.प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना
16.अव्यभिचारिणी भक्ति
17.एकांत वास
18.विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना
19.अध्यात्म ज्ञान
20.तत्वज्ञान
     इन गुणों के अतिरिक्त जो है वह अज्ञान या आसुरी सम्पद की श्रेणी में आता है, अर्थात जो गुण इन गुणों के विपरीत हैं वे व्यक्ति को सन्मार्ग से विचलित करते हैं।
      ऐसा नहीं है कि ये गुण कँही बाहर मिलते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में ये सारे गुण मौजूद होते हैं। जरूरत है अपने अंदर के इन गुणों को पहचान कर निरंतर अभ्यास कर उनको अपने व्यवहार में आत्मसात करने की। यही अभ्यास की प्रक्रिया ही साधना है और इसी में परिपूर्णता से ईश्वरीय स्थिति प्राप्त होती है। हम सभी के अंदर निरन्तर इन गुणों। और इनके विपरीत के दुर्गुणों में संघर्ष चलते रहता है। जब ये सद्गुण यानी दैवी सम्पद अर्थात ज्ञान विपरीत अज्ञानता को तिरोहित कर स्वयं को हमारे अपने जीवनशैली में स्थापित कर लेते हैं तो फिर ईश्वरीय मार्ग से बढ़ते हुए ईश्वरीय स्थिति की प्राप्ति होनी ही है। व्यक्ति और कुछ भी न करे लेकिन इन गुणों को आत्मसात कर अपने दैनिक जीवन की दिनचर्या बना ले तो उसे किसी भी अन्य मार्ग को खोजने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 12, 13, 14

ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ ।।12।।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ ।।13।।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ ।।14।।

जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत्‌ ही कहा जाता है, न असत्‌ ही।
        वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) ।
          वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है।

व्यक्ति के औचित्य को समझने के लिए क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच के सम्बन्धों की बात की गई है। क्षेत्र शरीर को कहते है  और जो इस शरीर को जानता समझता है उसे क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। क्षेत्रज्ञ हम स्वयं हैं लेकिन हम हैं कौन? क्या हाड़ मांस के बने शरीर जिसे हम कोई नाम विशेष दे देते हैं वही क्षेत्रज्ञ है या फिर कोई देवी देवता हैं क्षेत्रज्ञ जो हमारे शरीर का रहस्य जानते हैं? 
    दरअसल क्षेत्रज्ञ को जान लेने से हम क्षेत्र के रहस्य को भी समझ पाते हैं और यह समझ हमें परम् आनंद की अनुभूति प्रदान करता है।
जो इस शरीर को जानता है वही इस पिण्ड को उसका अस्तित्व भी प्रदान करता है। इसे हम चरणबद्ध ढंग से जानने और समझने का प्रयास करते हैं।
    1. शरीर यानी क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ का न तो कोई प्रारम्भ होता है, न ही उसका कोई अंत ही होता है यानी क्षेत्रज्ञ न ही सत है न ही असत। जिसका प्रारंभ है वह जन्म लेता है, परिवर्धित और परिवर्तित होता है और अंत में नष्ट हो जाता है। लेकिन क्षेत्र इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त बिना प्रारम्भ और बिना अंत वाला होता है यानी सनातन होता है।
    2. क्षेत्र को जानने समझने वाला क्षेत्रज्ञ निरन्तर बना हुआ होता है तो फिर इसका भान कैसे होता है? दरअसल पिण्ड को जाना जाता है चेतना के सहारे। यह चेतना निरन्तर उपस्थित तो रहती है किंतु इसकी उपस्थिति का ज्ञान पिंड से ही होता है। हम इसे प्रकाश से समझ सकते हैं। प्रकाश के मार्ग में यदि कोई पिंड यानी ऑब्जेक्ट नही। आये तो प्रकाश की उपस्थिति का भान नहीं होता है। किन्तु यदि कोई पिंड या ऑब्जेक्ट पर जब प्रकाश गिरता है तो उससे रिफ्लेक्ट होकर जो लौटता है उससे हमें लगता है कि कोई पिंड है। कमरे में कोई प्रकाश स्रोत नही। हो तो हमें लग सकता है कि कमरा खाली है। किंतु जैसे ही कमरे में प्रकाशस्रोत होता है हमें ज्ञात होता है कि कमरे में क्या सामग्री है। यानी प्रकाश की उपस्थिति तो निरन्तर है बस उसका किसी पिंड यानी ऑब्जेक्ट से सम्पर्क होने पर हमें प्रकाश का ज्ञान हो पाता है और साथ ही उस पिंड के रूप रंग आकार को भी हम प्रकाश की उपस्थिति से समझ पाते हैं। यदि प्रकाशपुंज न हो तो हमें उस पिंड के बारे में कुछ नहीं ज्ञात हो। यही चेतना होती है। चेतना की उपस्थिति से पिंड का ज्ञान होता है। पिंड उतपन्न होता है नष्ट होता है लेकिन चेतना निरन्तर बनी होती है जो पिंड और उसकी अवस्था से हमें अवगत कराती रहती है। यदि हममें चेतना न हो तो हमें स्वयं अपने इस पिंड रूपी शरीर का कोई ज्ञान न हो।
    3. यह चेतना सार्वभौमिक सत्य है जो परम् है। सो इसे ही परमब्रह्म कहा जाता है जो बिना जन्म और बिना मृत्यु के, बिना प्रारम्भ और बिना अंत के, बिना किसी स्वरूप, आकार, नाम के , समय, काल , स्थान से स्वतंत्र सनातन उपस्थित है। प्रत्येक पिंड की ऊर्जा यही चेतना है । जब तक पिंड इस चेतना से जुड़ा है उसका अस्तित्व है और जैसे उससे विलग होता है उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
      4.चूँकि यही एकमात्र चेतना सार्वभौमिक और सार्वकालिक है सो सब में एक ही चेतना का वास है।पिंड अपने स्वरूप और आकार में भिन्न भले हो लेकिन सभी में एक ही चेतना यानी एक ही परमब्रह्म की उपस्थिति व्याप्त है। सो संसार में कँही कोई भेद नहीं है ब्रह्म के द्वारा। सभी पिंड उसी एक परमचेतना के द्वारा व्यक्त हो रहें हैं और इसी लिए कहा जाता है कि वह परमब्रह्म अनंत सिर, आँख, मुख,हाथ , पैर वाला है। आखिर हो भी क्यों नहीं क्योंकि हर पिंड का अस्तित्व तो उसी एकमात्र चेतना के फलस्वरूप है, सब एक ही चेतना की अभिव्यक्ति हैं।
     5. इस चेतना की उपस्थिति से जैसे हमें अपने कर्मेन्द्रियों का भान होता है वैसे ही हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ भी इसी परम् चेतना के कारण अपना प्रभाव व्यक्त कर पाती हैं। चेतना तो अव्यक्त है, पिंड की उपस्थिति से यह व्यक्त होती है। उसी प्रकार चेतना की अपनी कोई सम्वेदना नहीं लेकिन इस चेतना की उपस्थिति से संवेदना प्रदान करने वाले अंग यानी इन्द्रियाँ अपना प्रभाव सम्प्रेषित कर पाती हैं जिनको चेतना अनुभूत करती है। इस प्रकार चेतना स्वयं में इंद्रियों से रहित होकर भी इंद्रियों के प्रभाव को भोक्ता भाव से लेती हैं। चेतना स्वयं में किसी से आसक्त नहीं होती क्योंकि उसका अपना कुछ भी नहीं । लेकिन उसकी उपस्थिति पिंड को ऊर्जा प्रदान करती है सो पिंड के भिन्न भिन्न अवयव अपना प्रभाव छोड़ते हैं जिन्हें चेतना बिना किसी आसक्ति के भाव के ग्रहण कर लेती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 15, 16,17 एवं 18

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌॥ ।।15।।

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ ।।16।।

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌॥ ।।17।।

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥ ।।18।।


वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है।

वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है।

वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (गीता अध्याय 15 श्लोक 12 में देखना चाहिए) एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।

इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेय का स्वरूप कहा है) संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
     यह परम् चेतना सभी चर और अचर में होती है लेकिन यह प्राप्त उसी को होती है जो इसके लिए सजग प्रयास करता हुआ स्वयं में उन बीस ज्ञान की शिक्षा को, उन बीस दैवी गुणों को अपने मन, वचन और कर्म में धारण कर पाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए यह चेतना उंसके जीवन का अविभाज्य भाग होती है और इसी चेतना को परम् चेतना में विलीन कर व्यक्ति परमब्रह्म की उस स्थिति को प्राप्त कर लेता है जिसका वह स्वाभाविक हक़दार है। किंतु जब व्यक्ति इस ज्ञान से शून्य होता है तो वह सब कुछ जानकर भी अनजाना बना रह जाता है, वह जीवन अवश्य जीता है किंतु उसका जीवन चेतनाशून्य होता है। चेतना का कोई स्वरुप नहीं होता है। वह तब तक नहीं अनुभव में आता है जब तक व्यक्ति में ज्ञान का वास न हो। अज्ञानी यानी वह व्यक्ति जो पूर्व वर्णित बीसों सदगुणों से मुक्त होता है उसे इस चेतना का जो उसके अंदर ही होती है भान तक नहीं हो पाता है।
     हम खाली स्थान में एक घर बनाते हैं , उसमें कमरे होते हैं, दीवारें होती हैं, चाहरदीवारी होती है। तो क्या हमने उस खाली स्थान को बाँट दिया? जी नहीं, ऐसा सोचना हमारा भ्रम है। दरअसल वे दीवारें, कमरे आदि उस स्पेस का आभासी विभक्तिकरण मात्र है और जैसे ही दीवारें हटाई जाती हैं उनका स्पेस बृहत्त स्पेस में मिल जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि विभक्त स्पेस हमेशा ही वृहत्त स्पेस के ही भाग हैं और दीवारों से विभक्त होकर भले अलग अलग दिखते हैं वे दरअसल अलग अलग हैं नहीं। इसी प्रकार परम् चेतना का अनुभव हमें तब तक नहीं होता है जब तक उसकी अभिव्यक्ति पिंडों के द्वारा हमें दिखती नहीं है। लेकिन वह परम चेतना उस वृहत्त स्पेस की तरह होती है जो पिण्डों में बंटा हुआ मात्र दिखता है, वह बंटा हुआ होता नही। है और जैसे ही वह नश्वर पिण्ड खत्म होता है उंसकी चेतना वृहत चेतना से मिल जाती है। इस प्रकार सभी चर और अचर में व्याप्त चेतना एक ही है कोई भिन्नता नही है। जब यह चेतना का अनुभव कर पिण्ड  चैतन्य होता है तो चेतना को ब्रह्मा का नाम दिया जाता है, जब उस चेतना को पाकर पिण्ड विकसित होता है तो उसे विष्णु का नाम दिया जाता है और जब वही चेतना पुनः वृहत्तर चेतना में मिलती है तो उसे रुद्र कहा जाता है। इस प्रकार एक ही परम चेतना ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों है। मात्र जीवन प्राप्त हो जाने से प्राणी को अपने जीवन का उद्देश्य नहीं मिलता है। जब ब्रह्मा रूपी चेतना उसमें संस्कारों का संचार करती है तो उस प्राणी में जीवन का भाव उतपन्न होता है,  विष्णु रूपी चेतना प्राणी के चैतन्य स्वरूप को जागृत करती हुई उंसे प्राप्त संस्कारों की बदौलत जीवन का उद्देश्य देती है और रुद्र रूपी चेतना प्राणी के संस्कारों को समाहित करते हुए उसे उसके परम् स्वरुप परमात्मा से एकाकार करती है।
   यही चेतना जो परमचेतना का ही पिंडों में व्यक्त स्वरूप मात्र है उसी को प्राप्त करना जीवन का परम लक्ष्य होता है जिसे पाकर प्राणी परमात्मा में जो परमचेतना ही है में विलीन हो जाता है। यह सभी में व्याप्त तो होता है किंतु इसे अपने अंदर वही ढूंढ पाता है जिसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है यानी जो दैवी गुणों से संपन्न होता है।
     इसप्रकार हम स्वयं को खोजने की यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव को पार करते हैं। जीवधारी कौन है इसे समझने के लिए आवश्यक है कि
1.हम इस शरीर यानी क्षेत्र को जानें कि यह कैसे बनता है और इसके अवयव क्या हैं,
2.हम उस ज्ञान को प्राप्त करें जो हमारी स्व के अन्वेषण का मार्ग प्रशस्त करता है, तथा
3.इस ज्ञान की मदद से हम शरीर यानी क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ को जानें, हम उस चेतना को प्राप्त करें जो हमें बोध कराती है कि हम कौन हैं।
   इन तीनों चरणों को सफलता पूर्वक वही प्राप्त कर पाता है जिसे श्रद्धापूर्वक परमसत्य परमात्मा पर पूरा भरोसा हो और जो उसपर पूर्णतः समर्पित हो यानी जो  मन , वचन और कर्म से इस शिक्षा को और इसे देने वाले के प्रति समर्पित हो। विश्वास और श्रद्धा में विचलन स्व के अन्वेषण के मार्ग से हमें भटका देती है। और जिसे क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और ज्ञान की इन धाराओं की समझ प्राप्त होती है वह इसी शरीर (क्षेत्र) में  इस ज्ञान(दैवी गुणों) के माध्यम से परमचेतना यानी परमात्मा(क्षेत्रज्ञ) को प्राप्त करता है। इसी को लोग मोक्ष भी कहते हैं। मोक्ष जीवन का अंत नहीं बल्कि परम् चेतना की प्राप्ति है जो चैतन्य अवस्था में इसी शरीर का उपयोग कर प्राप्त होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 19

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्‌यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌॥ ।।19।।

प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान।

इस संसार को समझने के लिए हमें समझना चाहिए कि पुरुष और प्रकृति के बीच का सम्बंध क्या है। वस्तुतः क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ ही क्रमशः प्रकृति और पुरुष हैं।
      प्रकृति क्षेत्र है और इसकी समझ हमें वही होनी चाहिए जो क्षेत्र की समझ को हमने समझा है यानी 

यह प्रकृति तीन गुणों अर्थात सत्वगुण, रजो गुण और तमो गुण भी इसी प्रकृति की देन हैं। दूसरी तरफ इस प्रकृति को समझने वाले को ही पुरुष कहते हैं। पुरुष का वास इस प्रकृति में होता है किंतु पुरुष प्रकृति पर निर्भर नहीं होता है। प्रकृति में रहकर भी पुरुष द्रष्टा भाव से ही होता है , वह प्रकृति को होते हुए देखता है। 
     प्रकृति और पुरुष दोनों अजन्मा हैं यानी इनका कोई प्रारम्भ नहीं और अंत नहीं होता है। प्रकृति के तीनों गुणों की साम्यावस्था प्रकृति को अव्यक्त बनाती है और इनमें जब भी कोई विचलन होता है संसार परिलक्षित होता है। 
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 20, 21

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥ ।।20।।

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌।
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥ ।।21।।

कार्य और करण  को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।

प्रकृति में  स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है। 

प्रकृति और पुरुष के बीच के सम्बंध से संसार के सत्य से परिचित कराता है। प्रकृति और पुरुष एक दूसरे की उपस्थिति में ही समझे जा सकते हैं, और इन दोनों के योग से ही संसार परिलक्षित होता है।
  प्रकृति कार्य और करण से व्यक्त होती है। यँहा कार्य और करण को समझना जरूरी है। प्रकृति जिन पाँच महाभूतों से बनती है उसे ही कार्य कहते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है। और बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्‌, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम 'करण' है। प्रकृति अपने कार्य और करण से खुद को प्रकट करती है।
     प्रकृति में असीम सम्भावनाएँ होती हैं और प्रकृति अपनी इन्ही सम्भावनाओं के द्वारा संसार और संसार की विचित्रताओं को जन्म देती है । यह प्रकृति ही है जो कार्य और करण दोनों का कारण बनती है।
     हमने समझा है कि पुरुष प्रकृति में निवास करता हुआ द्रष्टा भाव से बना रहता है। किंतु जब पुरुष प्रकृति से सम्बद्धता को अनुभव करने लगे तो फिर पुरुष का द्रष्टा भाव जाते रहता है और पुरुष भोक्ता भाव में आ जाता है। मन, बुद्धि, अहंकार और विवेक के माध्यम से प्रकृति जो कुछ प्राप्त करती है, पुरुष प्रकृति से अपने बन्धन की वजह से उसे अनुभव करता है और सुख दुख सहित अन्य सभी भावों को भोक्ता भाव से भोगता है।
        हमने पहले ही समझा है कि क्षेत्र को समझने वाला क्षेत्रज्ञ क्षेत्र में वास करने वाली चेतना है। चेतना क्षेत्र में अवस्थित रहकर द्रष्टा भाव से क्षेत्र यानी शरीर का साक्षी बना हुआ रहता है। वही बात यँहा प्रकृति और पुरुष के माध्यम से समझाई गई है। पुरुष प्रकृति में अवस्थित होकर द्रष्टा भाव से उसे देखता है किंतु जब वह प्रकृति से बंध जाता है और भोक्ता हो जाता है यानी प्रकृति द्वारा उतपन्न गुणों के प्रभाव में आ जाता है। यानी आध्यात्मिक चेतना सांसारिक हो जाती है। प्रत्येक प्राणी स्वयम में प्रकृति और पुरुष का योग है। आगे हम समझेंगे कि किस प्रकार पुनः इस चेतना को बन्धन मुक्त कर आध्यात्मिक करना है।
       पुरुष यानी शुद्ध चेतना का वास्तविक स्वरूप मात्र द्रष्टा का होता है जो प्रकृति में घट रही चीजों का साक्षी मात्र होता है किंतु प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से सम्बद्धता के कारण प्रकृति से उतपन्न तीनों गुणों का मात्र द्रष्टा नहीं रह जाता है बल्कि उसका भोक्ता बन जाता है, और इस भोक्ता भाव के कारण वह प्रकृति में सुख-दुख, लाभ-हानि, अच्छा-बुरा आदि को जीता है जो प्रकृति के गुणों से निकलते हैं। प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार प्राणी भिन्न भिन्न योनियों में भ्रमण करता है और अंततः उनसे मुक्त होने के लिए आवश्यक है कि पुरुष प्रकृति के साथ अपने सम्बद्धता को समाप्त कर पाए यानी इन तीनों गुणों से मुक्त हो सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 22

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥ ।।22।।

इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वह साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा- ऐसा कहा गया है।

यह संसार तब अस्तित्व में आता है जब क्षेत्रज्ञ यानी पुरुष यानी चेतना इस क्षेत्र यानी प्रकृति यानी इस शरीर में रहते हुए इससे युक्त हो जाता है और इस प्रकार इस संसार से मुक्ति का मार्ग है इस पुरुष को उंसके स्वतंत्र अस्तित्व में पहचान कर लेना। अब इस पुरुष को हम अपने शरीर में प्राप्त कैसे करें, तो इसके लिए आवश्यक है कि हम इस पुरुष को उंसके समग्रता में समझ सकें।
       क्षेत्र यानी प्रकृति में अवस्थित पुरुष प्रकृति में घट रही हर घटना का , उस प्रकृति की हर गतिविधि का द्रष्टा मात्र है। वह प्रकृति में वास करते हुए उसका साक्षी बना रहता है सो यह उपद्रष्टा है।
       प्रकृति में अवस्थित पुरुष यानी चेतना प्रकृति की गतिविधियों में हस्तक्षेप नही करता है, बल्कि जो भी अस्तित्व में आता है उसे आने देता है, उसे न रोकता है न टोकता है सो अनुमन्ता है यह पुरुष।
       पुरुष की उपस्थिति में ही प्रकृति में सब कुछ चालित और घटित होने का भान होता है, अगर यह पुरुष न ,हो चेतना न हो तब फिर कुछ भी अस्तिव में नहीं लगता है सो वही भर्ता भी है जो प्रकृति का सब तरह से भरण पोषण करता है। अगर पुरुष न हो तो फिर प्रकृति का अस्तित्व नहीं होता है, उसका भान तक नहीं होता है।
       और जब पुरुष प्रकृति से उतपन्न तीन गुणों और उनके परिणामों से युक्त होता है तो भोक्ता होता है। गुणों के परिणाम को यदि भोगा नही। जाए तो फिर ये निष्प्रभावी हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 23

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥ ।।23।।

इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है (दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको 'तत्व से जानना' है) वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।
      इस संसार को प्रकृति और पुरुष  के द्वारा समझा गया है। प्रकृति यानी क्षेत्र और पुरुष यानी क्षेत्रज्ञ। प्रकृति यानी पदार्थ और पुरुष यानी चेतना। सो पुरुष की उपस्थिति में ही प्रकृति की समझ बनती है। और यह पुरुष तभी समझ में आता है जब पुरुष प्रकृति से जुड़ता है। इस प्रकार प्रकृति से पुरुष अलग होता है किंतु उसको समझने के लिए प्रकृति का साथ चाहिए होता है। लेकिन प्रकृति नित्यप्रिवर्तनधर्मा है क्योंकि यह तीन गुणों-सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से युक्त है और जबकि चेतना हर परिस्थिति में एक समान है। इस चेतना की उपस्थिति में ही प्रकृति का ज्ञान होता है। यदि चेतना न हो यानी पुरुष न हो तो प्रकृति का कोई अस्तित्व नहीं दिखता है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर भी प्रकृति और पुरुष विद्यमान हैं। क्षेत्र(अर्थात शरीर) और उसके विकार प्राणी के प्रकृति हैं जबकि उसकी चेतना उसका पुरुष है। प्रकृति में नित्य परिवर्तन होता है और अगर पुरुष प्रकृति से बन्ध जाता है तो पुरुष स्वयं के अस्तित्व को भूल कर प्रकृतिमय हो जाता उसी का भोक्ता बन जाता है। लेकिन यदि प्राणी सजग है इस सत्य के प्रति की प्रकृति तो अपने गुणों के अनुसार नित्य परिवर्तनीय बनी रहेगी, जबकि चेतना के रूप में उसका पुरुष इस प्रकृति और इसके गुणों से स्वतंत्र सदा एक ही तरह बना रहता है तो उसका प्रकृति से बन्धन खत्म होने लगता है। तब वह प्राणी अपने पुरुसग को  पहचानता है द्रष्टा, अनुमन्ता, महेश्वर और परमात्मा स्वरूप में समझ पाता है। ऐसी स्थिति प्राप्त करने पर प्राणी अपने शरीर यानी क्षेत्र से क्षेत्र के इन्द्रियों के नियत कर्म तो करता है लेकिन उन कर्मों से बंधता नहीं है। और इस स्थिति में प्राणी प्रकृति से मुक्त होकर मात्र चेतना के स्तर पर जीता है। यही अवस्था उसकी मोक्ष की अवस्था होती है जब वह प्रकृति और उसके गुणों से स्वतन्त्र होकर कर्म करता हुआ उनके प्रभाव से मुक्त रहता है। इस प्रकार प्राणी को मृत्यु के पूर्व ही अपने कर्मों को संचालित करते हुए मोक्ष की प्राप्ति होती है जिस अवस्था में प्राणी प्रकृति से मुक्त मात्र चेतना को ही जीता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 24 एवं 25

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥ ।।24।।

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ ।।25।।
उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान द्वारा हृदय में देखते हैं, अन्य कितने ही ज्ञानयोग  और दूसरे कितने ही कर्मयोग से देखते हैं अर्थात प्राप्त करते हैं।
       
          परन्तु इनसे दूसरे अर्थात जो मंदबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को निःसंदेह तर जाते हैं।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रकृति और पुरुष को समझने के पश्चात अब मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि पुरुष यानी क्षेत्रज्ञ जो ईश्वर ही है की प्राप्ति कैसे हो सकती है। इस हेतु चार मार्ग सुझाये गए हैं। और ये मार्ग हैं
ध्यान का मार्ग
ज्ञान का मार्ग
कर्म का मार्ग
श्रवण का मार्ग।
     ध्यान का मार्ग सबसे कठीन है जिसकी चर्चा अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक विस्तारपूर्वक किया है। इस मार्ग में व्यक्ति अपनी समग्र एकाग्रता को सभी ओर से वापस खींच कर मात्र और मात्र अपने स्व पर केन्दित होता है। अपनी एकाग्रता को सभी ओर से तभी खींचा जा सकता है जब मन में पूर्णतः असंबद्धता का भाव हो यानी किसी भी चीज से कोई लगाव नहीं हो अर्थात पूर्ण सन्यास की स्थिति प्राप्त हो। जब व्यक्ति प्रकृति से मुक्त होता है तभी वह सम्बद्धता से भी मुक्त हो सकता है। मात्र और मात्र स्व पर केंद्रित होने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति जब कुछ देख रहा है तो उसकी चेतना प्रकृति के उस अंश को जिसे वह देख रहा है उसपर नही जा रही है बल्कि उसकी चेतना में प्रकृति समान है कोई गुण ही नही है। यही स्थिति है जब व्यक्ति आत्मा में आत्मा के द्वारा आत्मा को ही देख पा रहा होता है।
    लेकिन ध्यान का मार्ग साधना की सर्वोच्च स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी प्रकृति का त्याग कर चुका होता है। अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति में नहीं भी पहुँचा हो तब भी वह उस मार्ग पर चलता हुआ जिससे उसे इसका ज्ञान मिलता है परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। ज्ञान मार्ग का वर्णन अध्याय 2 मेंक 11 से 30 तक विस्तारपूर्वक किया है और पुनः इस अध्याय में भी 20 तरीके इस ज्ञान की प्राप्ति के सुझाये और बताए गए हैं।
       गीता में निष्काम कर्म की व्याख्या विस्तार से की गई है जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्तिपर्यन्त विस्तारपूर्वक किया है। दरअसल सारा ज्ञान और ध्यान तक पहुँचने का मार्ग इसी कर्मयोग के मार्ग से होकर ही जाता है और बिना इसपर चले न ज्ञान मिलता है, न ध्यान और न ही परमात्मा ही। कर्मयोग वह मार्ग है जिसपर चलकर व्यक्ति साधना का अभ्यास करता है और अपनी चेतना से प्रकृति के प्रभाव को मुक्त कर शुद्ध चेतना यानी परमात्मा को प्राप्त कर पाता है।
      हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन तीनों मार्गों का अनुसरण नहीं कर पाए फिर भी उंसके अंदर अपनी परम् चेतना की स्थिति को यानी परम् चैतन्य की स्थिति को।प्राप्त करने की तीव्र ईक्षा बनी रहे। यदि ऐसा व्यक्ति तत्वज्ञानी गुरु की शरण में रहकर उनकी वाणी में चैतन्य अवस्था के सम्बंध में सुनता है तो अंततः उसे भी वही चैतन्य अवस्था यानी परम् चेतना अर्थात परमात्मा की प्राप्ति होती है।
    दरअसल परमात्मा की प्राप्ति की यात्रा ऐसी यात्रा है जिसपर पथिक यदि एक बार चल भर देता है तो वह अंततः अपनी मंजिल तक पहुँचता ही है। बस आपको यात्रा शुरू भर करनी है, फिर बाकी का मार्ग स्वतः खुलते जाता है। इस यात्रा की शुरुआत श्रवण से होती है यानी इस यात्रा के सम्बंध में पहले च चुके और उस मंजिल तक पहुंच चुके यात्री के द्वारा किये वर्णन के श्रवण से होती है। फिर तो नया यात्री उसी से क्रमशः कर्म, ज्ञान और ध्यान का सिरा भी पकड़ ही लेता है। और अंततः व्यक्ति अपने ही प्रयास से, अभ्यास से, श्रद्धा और समर्पण से अपनी प्रकृति और उससे उतपन्न गुणों को धीरे धीरे त्यागते त्यागते शुद्ध चेतना का स्वामी बन जाता है। जैसे ही उससे उसकी प्रकृति पूर्ण रूप से अलग होती है वह चेतना भर रह जाता है और यही वह अवस्था होती है जब वह परमात्मा में विलीन हो जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 26

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्‍गमम्‌।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥ ।।26।।

हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान।

क्षेत्र प्रकृति है , शरीर है जो अपने गुणों के साथ है और निरन्तर परिवर्तनीय है। जबकि चेतना गुणों से मुक्त अपरिवर्तनीय है। क्षेत्र का स्वरूप भिन्न भिन्न होता है और प्राणियों का भिन्न भिन्न स्वरूप प्रकृति यानी क्षेत्र की भिन्नता के कारण है। किंतु बिना पुरुष के संयोग के बिना चेतना की उपस्थिति के, बिना क्षेत्रज्ञ से जुड़े यह प्रकृति, यह शरीर अर्थात क्षेत्र  अजन्मा ही रह जाता है यानी व्यक्त नहीं हो पाता है। चेतना अपने आप में प्रकृति से भिन्न और स्वतंत्र है और सभी में समान है। चेतना प्रकृति की तरह भिन्न भिन्न नहीं है और न ही परिवर्तनीय है। प्राणी की उतपत्ति तभी होती है जब प्रकृति चेतना से युक्त होती है, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ से युक्त होता है। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात प्रकृति और पुरुष दोनों होते हैं। प्रकृति के स्वरूप में , क्षेत्र के स्वरूप में भिन्नता होती है, उनके गुणों में भिन्नता होती है लेकिन चेतना तो समान रूप से सभी में एक ही है। सभी में एक ही परमात्मा है , सभी क्षेत्र/शरीर का क्षेत्रज्ञ एक ही है , सभी प्रकृति का पुरुष एक ही है जो सनातन, अजन्मा, अजर,अक्षय, और अपरिवर्तनीय है और वही सभी का परमात्मा है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 27

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ ।।27।।

जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है।

क्षेत्र अथवा प्रकृति को समझने के लिए आवश्यक है कि हम यह समझ सके कि दरअसल क्षेत्र या प्रकृति भले ही नाशवान हो लेकिन सभी क्षेत्रों में अवस्थित परमात्मा एक ही है जो न जन्म लेता है, न मरता है और न ही उसका क्षरण ही होता है बल्कि वही चेतना स्वरूप क्षेत्र को ,प्रकृति को देखता है और उसी की उपस्थिति से क्षेत्र अथवा प्रकृति का भान हो पाता है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 28


समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌॥ 28।।

क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।

इस संसार में सब कुछ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ से मिलकर ही बनता है। क्षेत्र पदार्थ है तो क्षेत्रज्ञ चेतना है। जब क्षेत्रज्ञ क्षेत्र से जुड़ता है तो क्षेत्रज्ञ द्रष्टा भाव से यानी साक्षी बनके क्षेत्र को देखता है। किंतु जब चेतना यानी क्षेत्रज्ञ क्षेत्र से आसक्त हो तब वही क्षेत्रज्ञ द्रष्टा से भोक्ता बन जाता है और क्षेत्र और उसके गुणों में होने वाले परिवर्तनों से प्रभावित भी होने लगता है। क्षेत्रज्ञ यानी पुरुष बिना क्षेत्र यानी प्रकृति के अपने मूल स्वरूप में ब्रह्म है किन्तु क्षेत्र से सम्बद्ध क्षेत्रज्ञ क्षेत्र के भावों का भोक्ता बम जाने पर उसके सुख दुख, लाभ हानि, जय पराजय आदि भाव से लिप्त होने लगता है।।प्राणी का कर्तव्य बनता है कि यह पुरुष यानी क्षेत्र यानी चेतना को पहचान कर उसको उसी मूल रूप में प्राप्त करे यानी कि उसकी चेतना उसके प्रकृति से मुक्त होकर उसे प्राप्त हो और उसे इस सत्य की अनुभूति हो कि समस्त प्राणियों में वही एक मात्र चेतना व्याप्त है। तब व्यक्ति ध्यान, ज्ञान, कर्म और श्रवण की विधियों से अपने स्व अर्थात आत्मा यानी पुरुष को प्रकृति अर्थात क्षेत्र से विलग कर देख पाता है। जब प्राणी शुद्ध चेतना की अनुभूतु करने में सक्षम हो जाता है तो स्वयं को आत्मरूप में पाता है। यही ईश्वर की प्राप्ति कहलाता है, यही तो मोक्ष है जब चेतना प्रकृति से मुक्त हो और इस बात की अनुभूति हो कि सभी चर अचर में यही एकमात्र चेतना है यानी एक ही परमात्मा सभी में व्याप्त है, उनमें भी जो उसे देख नहीं पा रहें अपनी अज्ञानता के कारण। जब व्यक्ति के पास यह ज्ञान हो तब वह अपनी आत्मा का स्वयं संरक्षक भी हो जाता है पर जो इस सत्य को नहीं समझ पाता है वह प्रकृति में पुरुष को लिप्त किये रहता है, उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल पाती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 29

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ ।।29।।

और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है।

व्यक्ति पदार्थ और चेतना का, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का, प्रकृति और पुरुष का मेल है। पदार्थ, जिसे क्षेत्र और प्रकृति भी कहा गया है उसी में गुण होता है और गुणों के कारण यह परिवर्तनीय होता है और परिवर्तनीय होने के कारण वही सब कुछ करता है। दूसरी तरफ चेतना जिसे क्षेत्रज्ञ या पुरुष कहा गया है वह अपनिवर्तनिय है, सभी में एक ही है और वह परमपुरुष अथवा परमचेतना की ही अभिव्यक्ति है। चूँकि यह अपरिवर्तनीय है सो अकर्ता है यानी कुछ  दिन करता है , साथ में उपस्थित होकर द्रष्टा बना रहता है अर्थात जिसकी उपस्थिति में प्रकृति क्रियाशील रहकर कर्ता बनी रहती है। यदि पुरुष या चेतना भोक्ता भी बन जाये तब भी सबकुछ भोगते हुए द्रष्टा ही रहती है, कर्ता नहीं होती। 
   जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है वही समझ पाता है कि वह व्यक्ति स्वयं कुछ भी नहीं करता है, जो होता है उसे उससे प्रकृति से मिलता है। आत्मा अकर्ता बनी रहती है और सबकुछ पदार्थ या प्रकृति या क्षेत्र कर रहा होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 30

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ ।।30।।

जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

प्रकृति-पुरुष /क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के अर्थ और उनके बीच के सम्बंध को जब व्यक्ति अपने व्यवहारिक जीवन में समझ पाता है और इस सम्बंध को जी पाता है, वह इस सत्य के प्रति जागरूक रहता है तो वह समझ पाता है कि एक ही पुरुष जो।परमात्मा है, जो परम् चेतना है वही सभी प्राणियों में स्थित है अर्थात वह यह जानता है कि भिन्न रूपों वाले प्राणियों के बीच की भिन्नता मात्र सतही है और वास्तव में सभी एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं। इस सत्य के साक्षात्कार से व्यक्ति स्वयं में परमात्मा का वास पाता है और वह स्वयं को परमात्मा का रूप समझ पाता है और दूसरों को भी स्वयं का ही रूप और स्वयं को उन अन्य प्राणियों का रूप समझ पाता है। यह सत्य व्यक्ति को परमात्मा के साथ एकाकार कर देता है।

श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 31 एवं 32, 33 एवं 34

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥ ।।31।।

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥ ।।32।।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥ ।।33।।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌॥ ।।34।।

हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता।

हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।

इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की समझ बताती है कि एक ही क्षेत्रज्ञ सभी क्षेत्रों में एक समान होता है। यही चेतना है जिसकी उपस्थिति से क्षेत्र यानी प्रकृति व्यक्त होती है। यदि इस चेतना का प्रकाश प्रकृति पर नही। पड़े यानी यदि प्रकृति में  इस चेतना का संचार नहीं हो तो फिर प्रकृति की अनुभूति ही नहीं होती है, उसका अस्तित्व ही नहीं ज्ञात होता है।  यह ठीक उसी प्रकार से सत्य है कि प्रकाश की अनुपस्थिति में जो है वह भी नहीं है सा ही जान पड़ता है। यानी प्रकाश की वजह से ही किसी भी वस्तु के होने की अभिव्यक्ति होती है।  यदि प्रकाश की उपस्थिति हमें भिन्न भिन्न वस्तुओं से परिचित कराती है किन्तु प्रकाश भिन्न भिन्न नहीं होता है। एक ही प्रकाश की उपस्थिति में पहाड़ भी अभिव्यक्त होता है, तो समुन्द्र भी, शेर भी तो पेड़ भी। यानी प्रकाश एक है, अनेक तो प्रकृति में  है । यही परमात्मा की समझ प्रदान करता है। वह परम चेतना यानी परम् ब्रह्म अर्थात परमात्मा तो एक ही है बस उसकी उपस्थिति में प्रकृति के भिन्न भिन्न स्वरूप प्रकट होते हैं। और यह एक परमात्मा ही आत्मा है । इसका न कोई आदि है, न ही अंत है, यह अजन्मा,  अपरिवर्तनीय, अक्षर, अजर और अमर है। यह स्वयं कुछ नहीं करता है , बल्कि मात्र द्रष्टा भाव से उपस्थित होकर अवलोकन करता है। जो कुछ कारक है वह प्रकृति के गुणों में है। जैसे प्रकाश में कोई लाल दिखता है, तो कोई पीला, कोई गोलाकर है तो कोई लम्बा। यह सब शरीर के पदार्थों की वजह से है, शरीर में अवस्थित आत्मा के लिए यह एक गैर जरूरी बात है कि कोई लम्बा, तो कोई नाटा है, कोई हरा है तो कोई नीला है।यह सब रूप रंग प्रकृति की देन है, चेतना यानी परमात्मा  तो मात्र द्रष्टा है।
         परमात्मा की  सर्व्यापकता को आकाश यानी स्पेस की सर्वव्यापकता से भी समझा जा सकता है। संसार के समस्त कण में स्पेस व्याप्त है भले भिन्न भिन्न पिंडों के कारण हमें स्पेस की सर्वव्यापकता का आभास नहीं हो पाता हो। दरअसल पिंडों की उपस्थिति से हमें इस बात का भ्रम हो जाता है कि भिन्न भिन्न पिंडों में व्याप्त स्पेस भिन्न भिन्न है। किंतु यदि हम सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो पाएंगे कि भिन्न भिन्न पिंडों में विभक्त स्पेस वृहत स्पेस से उतनी ही देर तक भिन्न प्रतीत होता है जब तक कि पिंड है। पिंड की समाप्ति के बाद पिंड में अवस्थित स्पेस क्या समाप्त हो जाता है? अगर यह प्रश्न हम खुद से करेंगे तो उत्तर भी खुद ही मिल जाएगा। पिंड की समाप्ति के पश्चात उस पिंड को धारण करने वाला स्पेस और वह स्पेस जिसे  पिंड धारण किये रहता है दोनों पिंड के साथ समाप्त नहीं होते हैं बल्कि वे तो वृहत्तर स्पेस में मिल जाते हैं। इसी प्रकार एक ही सूर्य सभी को प्रकाशित करता है न कि भिन्न भिन्न वस्तुएँ जो भिन्न भिन्न रूप रंग की प्रतीत होती हैं भिन्न भिन्न सूर्य से प्रकाशित होती हैं। 
  जब हम इस सत्य को समझते हैं तो समझ  पाते हैं कि क्षेत्र अथवा पिंड अथवा प्रकृति की भिन्नता उसे समझ सकने वाले क्षेत्रज्ञ या पुरुष में भिन्नता के कारण नहीं होती है। क्षेत्र अथवा प्रकृति की भिन्नता तो उसके अपने गुणों के कारण होती है किंतु उन सभी भिन्न प्रतीत होने वाले क्षेत्रों में चेतना अथवा पुरुष एक ही है, जो सभी की आत्मा एक ही है और यह आत्मा जब पिंड में है तो आत्मा कहलाती है और जब इसको हम सर्वव्यापक स्तर पर एक ही रूप में देख पाते हैं तो वही आत्मा परमात्मा कहलाती है।  पिण्ड में अवस्थित आत्मा द्रष्टा भाव से पिण्ड में देखते हुए निर्लेप रहता है और यदि आत्मा में भोक्ता भाव जुड़ जाता है तो क्षेत्र अथवा पिंड यानी व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य होता है कि वह आत्मा पर चढ़ आये  प्रकृति के गुणों को आत्मा से अलग कर दे और यही प्रक्रिया यानी आत्मा को भोक्ता से द्रष्टा बना देने की प्रक्रिया ही मोक्ष की यात्रा है जो ज्ञान, ध्यान , कर्म, भक्ति, समर्पण से पूरी होती है और यही मोक्ष आत्मा को पिण्ड की सीमा से मुक्त कर उसे परमात्मा होने का ज्ञान हमें देता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः
 











      
        




        


Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय