श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 15, 16, 17 एवं 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 15, 16,17 एवं 18

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌॥ ।।15।।

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ ।।16।।

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌॥ ।।17।।

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥ ।।18।।


वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है।

वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है।

वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (गीता अध्याय 15 श्लोक 12 में देखना चाहिए) एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।

इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेय का स्वरूप कहा है) संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
     यह परम् चेतना सभी चर और अचर में होती है लेकिन यह प्राप्त उसी को होती है जो इसके लिए सजग प्रयास करता हुआ स्वयं में उन बीस ज्ञान की शिक्षा को, उन बीस दैवी गुणों को अपने मन, वचन और कर्म में धारण कर पाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए यह चेतना उंसके जीवन का अविभाज्य भाग होती है और इसी चेतना को परम् चेतना में विलीन कर व्यक्ति परमब्रह्म की उस स्थिति को प्राप्त कर लेता है जिसका वह स्वाभाविक हक़दार है। किंतु जब व्यक्ति इस ज्ञान से शून्य होता है तो वह सब कुछ जानकर भी अनजाना बना रह जाता है, वह जीवन अवश्य जीता है किंतु उसका जीवन चेतनाशून्य होता है। चेतना का कोई स्वरुप नहीं होता है। वह तब तक नहीं अनुभव में आता है जब तक व्यक्ति में ज्ञान का वास न हो। अज्ञानी यानी वह व्यक्ति जो पूर्व वर्णित बीसों सदगुणों से मुक्त होता है उसे इस चेतना का जो उसके अंदर ही होती है भान तक नहीं हो पाता है।
     हम खाली स्थान में एक घर बनाते हैं , उसमें कमरे होते हैं, दीवारें होती हैं, चाहरदीवारी होती है। तो क्या हमने उस खाली स्थान को बाँट दिया? जी नहीं, ऐसा सोचना हमारा भ्रम है। दरअसल वे दीवारें, कमरे आदि उस स्पेस का आभासी विभक्तिकरण मात्र है और जैसे ही दीवारें हटाई जाती हैं उनका स्पेस बृहत्त स्पेस में मिल जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि विभक्त स्पेस हमेशा ही वृहत्त स्पेस के ही भाग हैं और दीवारों से विभक्त होकर भले अलग अलग दिखते हैं वे दरअसल अलग अलग हैं नहीं। इसी प्रकार परम् चेतना का अनुभव हमें तब तक नहीं होता है जब तक उसकी अभिव्यक्ति पिंडों के द्वारा हमें दिखती नहीं है। लेकिन वह परम चेतना उस वृहत्त स्पेस की तरह होती है जो पिण्डों में बंटा हुआ मात्र दिखता है, वह बंटा हुआ होता नही। है और जैसे ही वह नश्वर पिण्ड खत्म होता है उंसकी चेतना वृहत चेतना से मिल जाती है। इस प्रकार सभी चर और अचर में व्याप्त चेतना एक ही है कोई भिन्नता नही है। जब यह चेतना का अनुभव कर पिण्ड  चैतन्य होता है तो चेतना को ब्रह्मा का नाम दिया जाता है, जब उस चेतना को पाकर पिण्ड विकसित होता है तो उसे विष्णु का नाम दिया जाता है और जब वही चेतना पुनः वृहत्तर चेतना में मिलती है तो उसे रुद्र कहा जाता है। इस प्रकार एक ही परम चेतना ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों है। मात्र जीवन प्राप्त हो जाने से प्राणी को अपने जीवन का उद्देश्य नहीं मिलता है। जब ब्रह्मा रूपी चेतना उसमें संस्कारों का संचार करती है तो उस प्राणी में जीवन का भाव उतपन्न होता है,  विष्णु रूपी चेतना प्राणी के चैतन्य स्वरूप को जागृत करती हुई उंसे प्राप्त संस्कारों की बदौलत जीवन का उद्देश्य देती है और रुद्र रूपी चेतना प्राणी के संस्कारों को समाहित करते हुए उसे उसके परम् स्वरुप परमात्मा से एकाकार करती है।
   यही चेतना जो परमचेतना का ही पिंडों में व्यक्त स्वरूप मात्र है उसी को प्राप्त करना जीवन का परम लक्ष्य होता है जिसे पाकर प्राणी परमात्मा में जो परमचेतना ही है में विलीन हो जाता है। यह सभी में व्याप्त तो होता है किंतु इसे अपने अंदर वही ढूंढ पाता है जिसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है यानी जो दैवी गुणों से संपन्न होता है।
     इसप्रकार हम स्वयं को खोजने की यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव को पार करते हैं। जीवधारी कौन है इसे समझने के लिए आवश्यक है कि
1.हम इस शरीर यानी क्षेत्र को जानें कि यह कैसे बनता है और इसके अवयव क्या हैं,
2.हम उस ज्ञान को प्राप्त करें जो हमारी स्व के अन्वेषण का मार्ग प्रशस्त करता है, तथा
3.इस ज्ञान की मदद से हम शरीर यानी क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ को जानें, हम उस चेतना को प्राप्त करें जो हमें बोध कराती है कि हम कौन हैं।
   इन तीनों चरणों को सफलता पूर्वक वही प्राप्त कर पाता है जिसे श्रद्धापूर्वक परमसत्य परमात्मा पर पूरा भरोसा हो और जो उसपर पूर्णतः समर्पित हो यानी जो  मन , वचन और कर्म से इस शिक्षा को और इसे देने वाले के प्रति समर्पित हो। विश्वास और श्रद्धा में विचलन स्व के अन्वेषण के मार्ग से हमें भटका देती है। और जिसे क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और ज्ञान की इन धाराओं की समझ प्राप्त होती है वह इसी शरीर (क्षेत्र) में  इस ज्ञान(दैवी गुणों) के माध्यम से परमचेतना यानी परमात्मा(क्षेत्रज्ञ) को प्राप्त करता है। इसी को लोग मोक्ष भी कहते हैं। मोक्ष जीवन का अंत नहीं बल्कि परम् चेतना की प्राप्ति है जो चैतन्य अवस्था में इसी शरीर का उपयोग कर प्राप्त होता है।

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