श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 12, 13, 14
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 12, 13, 14
ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ ।।12।।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ ।।13।।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ ।।14।।
जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही।
वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) ।
वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है।
व्यक्ति के औचित्य को समझने के लिए क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच के सम्बन्धों की बात की गई है। क्षेत्र शरीर को कहते है और जो इस शरीर को जानता समझता है उसे क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। क्षेत्रज्ञ हम स्वयं हैं लेकिन हम हैं कौन? क्या हाड़ मांस के बने शरीर जिसे हम कोई नाम विशेष दे देते हैं वही क्षेत्रज्ञ है या फिर कोई देवी देवता हैं क्षेत्रज्ञ जो हमारे शरीर का रहस्य जानते हैं?
दरअसल क्षेत्रज्ञ को जान लेने से हम क्षेत्र के रहस्य को भी समझ पाते हैं और यह समझ हमें परम् आनंद की अनुभूति प्रदान करता है।
जो इस शरीर को जानता है वही इस पिण्ड को उसका अस्तित्व भी प्रदान करता है। इसे हम चरणबद्ध ढंग से जानने और समझने का प्रयास करते हैं।
1. शरीर यानी क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ का न तो कोई प्रारम्भ होता है, न ही उसका कोई अंत ही होता है यानी क्षेत्रज्ञ न ही सत है न ही असत। जिसका प्रारंभ है वह जन्म लेता है, परिवर्धित और परिवर्तित होता है और अंत में नष्ट हो जाता है। लेकिन क्षेत्र इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त बिना प्रारम्भ और बिना अंत वाला होता है यानी सनातन होता है।
2. क्षेत्र को जानने समझने वाला क्षेत्रज्ञ निरन्तर बना हुआ होता है तो फिर इसका भान कैसे होता है? दरअसल पिण्ड को जाना जाता है चेतना के सहारे। यह चेतना निरन्तर उपस्थित तो रहती है किंतु इसकी उपस्थिति का ज्ञान पिंड से ही होता है। हम इसे प्रकाश से समझ सकते हैं। प्रकाश के मार्ग में यदि कोई पिंड यानी ऑब्जेक्ट नही। आये तो प्रकाश की उपस्थिति का भान नहीं होता है। किन्तु यदि कोई पिंड या ऑब्जेक्ट पर जब प्रकाश गिरता है तो उससे रिफ्लेक्ट होकर जो लौटता है उससे हमें लगता है कि कोई पिंड है। कमरे में कोई प्रकाश स्रोत नही। हो तो हमें लग सकता है कि कमरा खाली है। किंतु जैसे ही कमरे में प्रकाशस्रोत होता है हमें ज्ञात होता है कि कमरे में क्या सामग्री है। यानी प्रकाश की उपस्थिति तो निरन्तर है बस उसका किसी पिंड यानी ऑब्जेक्ट से सम्पर्क होने पर हमें प्रकाश का ज्ञान हो पाता है और साथ ही उस पिंड के रूप रंग आकार को भी हम प्रकाश की उपस्थिति से समझ पाते हैं। यदि प्रकाशपुंज न हो तो हमें उस पिंड के बारे में कुछ नहीं ज्ञात हो। यही चेतना होती है। चेतना की उपस्थिति से पिंड का ज्ञान होता है। पिंड उतपन्न होता है नष्ट होता है लेकिन चेतना निरन्तर बनी होती है जो पिंड और उसकी अवस्था से हमें अवगत कराती रहती है। यदि हममें चेतना न हो तो हमें स्वयं अपने इस पिंड रूपी शरीर का कोई ज्ञान न हो।
3. यह चेतना सार्वभौमिक सत्य है जो परम् है। सो इसे ही परमब्रह्म कहा जाता है जो बिना जन्म और बिना मृत्यु के, बिना प्रारम्भ और बिना अंत के, बिना किसी स्वरूप, आकार, नाम के , समय, काल , स्थान से स्वतंत्र सनातन उपस्थित है। प्रत्येक पिंड की ऊर्जा यही चेतना है । जब तक पिंड इस चेतना से जुड़ा है उसका अस्तित्व है और जैसे उससे विलग होता है उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
4.चूँकि यही एकमात्र चेतना सार्वभौमिक और सार्वकालिक है सो सब में एक ही चेतना का वास है।पिंड अपने स्वरूप और आकार में भिन्न भले हो लेकिन सभी में एक ही चेतना यानी एक ही परमब्रह्म की उपस्थिति व्याप्त है। सो संसार में कँही कोई भेद नहीं है ब्रह्म के द्वारा। सभी पिंड उसी एक परमचेतना के द्वारा व्यक्त हो रहें हैं और इसी लिए कहा जाता है कि वह परमब्रह्म अनंत सिर, आँख, मुख,हाथ , पैर वाला है। आखिर हो भी क्यों नहीं क्योंकि हर पिंड का अस्तित्व तो उसी एकमात्र चेतना के फलस्वरूप है, सब एक ही चेतना की अभिव्यक्ति हैं।
5. इस चेतना की उपस्थिति से जैसे हमें अपने कर्मेन्द्रियों का भान होता है वैसे ही हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ भी इसी परम् चेतना के कारण अपना प्रभाव व्यक्त कर पाती हैं। चेतना तो अव्यक्त है, पिंड की उपस्थिति से यह व्यक्त होती है। उसी प्रकार चेतना की अपनी कोई सम्वेदना नहीं लेकिन इस चेतना की उपस्थिति से संवेदना प्रदान करने वाले अंग यानी इन्द्रियाँ अपना प्रभाव सम्प्रेषित कर पाती हैं जिनको चेतना अनुभूत करती है। इस प्रकार चेतना स्वयं में इंद्रियों से रहित होकर भी इंद्रियों के प्रभाव को भोक्ता भाव से लेती हैं। चेतना स्वयं में किसी से आसक्त नहीं होती क्योंकि उसका अपना कुछ भी नहीं । लेकिन उसकी उपस्थिति पिंड को ऊर्जा प्रदान करती है सो पिंड के भिन्न भिन्न अवयव अपना प्रभाव छोड़ते हैं जिन्हें चेतना बिना किसी आसक्ति के भाव के ग्रहण कर लेती है।
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