श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11 का द्वितीय भाग (ज्ञान अथवा दैवी सम्पदा)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11 का द्वितीय भाग (ज्ञान अथवा दैवी सम्पदा)

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ ।।11।।

नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।

           जब व्यक्ति आत्म अन्वेषण पर निकलता है तो उसे कुछ नियमों का पालन करना होता है। यही नियम वे गुण हैं जिनको अभ्यास से अपना कर व्यक्ति आत्मान्वेषण कर पाता है। इन्हीं नियमों और गुणों को ज्ञान भी कहा गया है और इन्हें ही दैवी सम्पद भी कहा गया है। इनमें जो महत्वपूर्ण हैं उनको निम्न तरह से व्यक्त किया गया है
1.श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव
2.दम्भ का अभाव
3. किसी भी प्राणी को किसी भी तरह नही सताना
4. शान्त भाव का होना
5.मन-वाणी की सरलता 
6.श्रद्धा भक्ति सहित गुरु सेवा
7.बाहर भीतर की शुद्धि
8.अन्तःकरण की स्थिरता
9.मन सहित इंद्रियों का निग्रह
10.भोगों में आसक्ति का अभाव
11.अहंकार का अभाव
12. जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना
13.आसक्ति का अभाव
14.ममता का अभाव
15.प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना
16.अव्यभिचारिणी भक्ति
17.एकांत वास
18.विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना
19.अध्यात्म ज्ञान
20.तत्वज्ञान
     इन गुणों के अतिरिक्त जो है वह अज्ञान या आसुरी सम्पद की श्रेणी में आता है, अर्थात जो गुण इन गुणों के विपरीत हैं वे व्यक्ति को सन्मार्ग से विचलित करते हैं।
      ऐसा नहीं है कि ये गुण कँही बाहर मिलते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में ये सारे गुण मौजूद होते हैं। जरूरत है अपने अंदर के इन गुणों को पहचान कर निरंतर अभ्यास कर उनको अपने व्यवहार में आत्मसात करने की। यही अभ्यास की प्रक्रिया ही साधना है और इसी में परिपूर्णता से ईश्वरीय स्थिति प्राप्त होती है। हम सभी के अंदर निरन्तर इन गुणों। और इनके विपरीत के दुर्गुणों में संघर्ष चलते रहता है। जब ये सद्गुण यानी दैवी सम्पद अर्थात ज्ञान विपरीत अज्ञानता को तिरोहित कर स्वयं को हमारे अपने जीवनशैली में स्थापित कर लेते हैं तो फिर ईश्वरीय मार्ग से बढ़ते हुए ईश्वरीय स्थिति की प्राप्ति होनी ही है। व्यक्ति और कुछ भी न करे लेकिन इन गुणों को आत्मसात कर अपने दैनिक जीवन की दिनचर्या बना ले तो उसे किसी भी अन्य मार्ग को खोजने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।

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