श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ ।।11।।

अध्यात्म ज्ञान में (जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है) नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।
 
19.अध्यात्म ज्ञान
          संसार में ज्ञान दो प्रकार का है, एक है सांसारिक ज्ञान और दूसरा है आत्मज्ञान। आत्मज्ञान को अध्यात्म कहा जाता है जिसमें व्यक्ति अपने स्व यानी अपनी आत्मा के सम्बंध में विचार करता है और इसके माध्यम से वह ईश्वर से तादाम्य जोड़ता है। सांसारिक ज्ञान संसार में रहकर जीवकोपार्जन करने के लिए तथा प्रकृति के रहस्यों को।समझने के लिए आवश्यक है किंतु मात्र इस ज्ञान से व्यक्ति अपने जीवन मूल्यों को परिमार्जित नहीं कर पाता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं का अन्वेषण करते हुए ईश्वरीय मार्ग का अनुसरण करें। जिस व्यक्ति को अध्यात्म का ज्ञान होता है वह ईश्वरीय मार्ग पर सदाचार युक्त आचरण करता हुआ अग्रगामी होता है। इस प्रकार का व्यक्ति ही सांसारिक ज्ञान का भी सदुपयोग संसार के उत्थान और कल्याण के लिए कर पाता है।

20.तत्वज्ञान
          अध्यात्म के ज्ञान के साथ साथ तत्वज्ञान भी आवश्यक है। तत्वज्ञान भौतिकी या रसायन शास्त्र का ज्ञान नहीं है बल्कि इस ज्ञान के द्वारा व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के सम्बन्धों को समझ पाता है। शरीर मात्र पिण्ड ही है किंतु चैतन्य की उपस्थिति शरीर को उसकी महत्ता, उसका उद्देश्य प्रदान करती है। और व्यक्ति यह समझ पाता है कि पिण्ड रूपी उसका शरीर जब आत्मा को धारण करता है तो उसका एक ही उद्देश्य होता है कि किस प्रकार आत्मा का परमात्मा में विलय हो सके।

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