धर्म
धर्म
1.धर्म क्या है?
अक्सर कहा जाता है कि धर्म का पालन करें, धार्मिक बने। तो ये धर्म जिसके अनुसरण की बात कही जाती है वह है क्या?
अक्सर धर्म का अर्थ किसी आस्था विशेष से लगाया जाता है। किंतु इसके विपरीत धर्म आचरण से जुड़ा हुआ विषय है और सभी तरह की आस्था वालों में समान रूप से लागू होता है। मन, वचन और कर्म के सम्मिलित रूप में आचरण कहा जाता है और जब इस तरह के आचरण में सद्गुणों का प्रवाह होता है तो उसे धर्म कहते हैं और जब दुर्गुण हावी होते हैं तो उसे ही अधार्मिक या विधर्मी कहते हैं।
ये सद्गुण सभी में, बिना भेद भाव के एक समान होते हैं। सच बोलना, झूठ से परहेज करना, हिंसा नहीं करना, अत्याचार और अनाचार नहीं करना, किसी का अपमान नहीं करना, दया और क्षमा भाव रखना आदि ऐसे गुण हैं जो सद्गुण की श्रेणी में आते हैं और इनको आत्मसात करने के मार्ग में आस्था बाधा नहीं बनती है।
ये आचरण स्थित गुण किसी भी जाति, सम्प्रदाय, नस्ल में आते हैं तो उनकी आस्था इन गुणों का स्वागत ही करती है। सो धर्म आस्था से ऊपर की अवस्था है जिसके केंद्र में जीव मात्र का कल्याण और सभी जीवधारी और स्थूल वस्तुओं , सभी दृश्य और अदृश्य के प्रति सम्मान और आदर होता है। यही आचरण धर्म कहलाता है।
2.धर्म का आचरण
जन्म से धर्म प्राप्त नहीं होता है, जन्म से प्रचलित सम्प्रदाय की प्राप्ति होती है। धर्म तो तब प्राप्त होता है जब धर्म की विशेषताएँ, उंसके लक्षण हमारे आचरण में ढल जाते हैं। जब तक हम धारण नहीं करते तब तक धर्म हमारा नहीं होता है।
धर्माचरण के सम्बंध में जानते तो सभी हैं। सभी जानते हैं कि सत्य बोलना, अहिंसा करना, चोरी नहीं करना, नशा(पदार्थ, धन, सत्ता, स्त्री आदि सभी का) नहीं करना है, व्यभिचार नहीं करना है, सभी शास्त्रीय पुस्तकों में तो यही बताया और समझाया जाता रहा है किंतु जानने मात्र से वह धर्माचरण हमारे आचरण में ढलता नहीं है। सो धर्म जन्म से नहीं अभ्यास से प्राप्त होता है, आचरण से प्राप्त होता है।
अब प्रश्न उठता है कि जब धर्माचरण के बारे में सभी जानते हीं हैं तो फिर सभी उनको अपनाते क्यों नहीं हैं। इसका सीधा सरल उत्तर है कि जान लेने के बाद भी हमारा मन इतना चंचल होता है कि वह इस ज्ञात सत्य को अपना नहीं पाता है। बुद्धि कहती है झूठ मत बोलो, विवेक समझाता है कि झूठ मत बोलो, हमारी आस्था की उक्तियाँ, उंसके प्रवचन, उसकी शास्त्रीय पुस्तकें भी बतलाती हैं कि झूठ मत बोलो, लेकिन मन अपनी चंचलता से विवश हुआ इस पर टिकता ही नहीं। तुरत उंसके अंदर लोभ आ जाता है, क्रोध और घृणा आ जाती है, बदले की भावना और आगे निकल जाने की बेचैनी छा जाती है। फिर तो झूठ, हिंसा, ठगी अनाचार की बयार चल पड़ती है और धर्माचरण का सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।
तो इसका अर्थ यही हुआ कि यदि मन वश में हो, हमारी चेतना हमारे मन की मालिक हो तब तो मन स्थिर होकर धर्माचरण को आत्मसात कर सकता है। मन की एकाग्रता एक बात है और मन की चैतन्य अनुभूति दूसरी बात है। एकाग्रता से मन निर्मल नही होता है। मन तो चोर का भी एकाग्र होता है चोरी करने वक्त। हत्या की घात लगाए बैठे अपराधी की भी एकाग्रता और चौकन्नापन एकदम सटीक होता है लेकिन इस एकाग्रता से आचरण में धर्म की प्रवृत्ति नहीं आती है। तो फिर कैसे आती है? मन को अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक करना होता है, किसी अन्य के प्रति नहीं। मन को स्वयं पर केंद्रित करना होता है, स्वयं की अनुभूतियों पर केंद्रित करना होता है। शांत मन से प्रकृति के नियमों को अपने ऊपर घटित होते देखना होता है। यह तब दिखता है जब हमारा ध्यान स्वयं पर शान्ति से टिक गया हो। जो अनुभूति हो रही हो बस उसका मन के स्तर से निरीक्षण करना होता है, उंसके साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं करनी होती है। स्वयं पर केंद्रित होकर देखते रहें कि प्रकृति के नियमों के द्वारा आपके अंदर किस सत्य को प्रकट किया जा रहा है। जो प्रकट हो रहा है उसे ही देखना है। उसपर अपने किसी पूर्वाग्रह का कोई लेप नहीं चढाना है। स्वयं के बारे में प्रकट हो रही सच्चाई को उसी रूप में जानना और स्वीकारना है। मन आपका है तो फिर सच्चाई दूसरे की क्यों जानना। धर्म का आचरण हमें करना सीखना है तो फिर ध्यान में किसी अन्य को क्यों लाना, दूसरे की खासियतों से हमारा क्या भला होने वाला है। सो शांत मन से स्वयं को देखते जाना है, स्वयं के बारे में जो जो प्रकट होते जा रहा है, उसे उसी तरह , बिना किसी मिलावट के , बिना किसी अपराध बोध के देखते समझते शांत भाव से स्वीकार करना है। बस एकाग्रता भी आती जाएगी और मन का मैल भी निकलता जाएगा। जैसे जैसे मन का मैल उतरेगा वैसे वैसे मन पर धर्माचरण का प्रभाव होते जाएगा। बिना मन का मैल हटाये, पूर्व से बैठे धूल को साफ किये धर्माचरण का प्रभाव उसपर नहीं आता है। यह अभ्यास की चीज है। एक दिन में नही होगा, बारम्बार अभ्यास से होगा।
3. धर्म के आचरण को कैसे पाएँ
अब प्रश्न उठता है कि ध्यान से क्या हो जाएगा, उससे कौन सा सुख मिल जाएगा? हम सभी दुखों से छुटकारा चाहते हैं। दुखों का अंत ही सुखों की परकाष्ठा है। लेकिन दुख हमको है तो उस दुख को दूर भी हम हीं को करना है, कोई अन्य नहीं करने आ रहा है।
दुखों का कारण क्या है? उनका स्रोत क्या है? दुख की अनुभूति भीतर हो कि बाहर हो उनका स्रोत हमेशा हमारे भीतर ही होता है। दुख तब तक नहीं आते जब तक मन में विकार नही जन्मते। मन के विकार एक ही चीज देते हैं-मन को बेचैन करते हैं। गुस्सा, चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, हिंसा आदि जो कोई भी विकार हैं वे हमारे मन के हैं। ये विकार हमें उद्वेलित और बेचैन करते हैं। और ये बेचैनी हमें दुख देती है।
ध्यान से दुख दूर होते हैं। लेकिन कैसे? जब ध्यान खुद पर केंद्रित हो(अपनी साँस पर) और मन मात्र और मात्र वर्तमान पर टिका हो तो मन न बीते साँस(समय) को देखती है, न ही आने वाली साँस ( समय) को। वर्तमान में जो अनुभूति मिल रही है, वही सत्य है, बाकी न बिती हुआ और न ही आने वाली सांस कोई अनुभूति देने में सक्षम है। यदि उनकी चिंता करेंगे तो वर्तमान में मिल रही अनुभूतियों को भूल जायेंगे और अतीत और भविष्य की सोच सोच कर बेचैन होते रहेंगे।
सो मन को वर्तमान पर टिकाए जो अनुभूतियाँ मिल रही हैं उनको उसी रूप में लें। अपनी तरफ से न कुछ जोड़ते हैं न घटाते हैं। जो है सो है। वही सत्य है। सत्य की यह पहचान हमें अपने मन के विकारों को पहचानने और उनको दूर करने का अवसर प्रदान करती है। अन्यथा हम तो अतीत और भविष्य में फँसे विकारों को ही जीते रह जाते हैं। जैसे जैसे मन में बसे विकार दिखते जाते हैं हम उनको अपने मन से और आचरण से निष्काषित करते जाते हैं। सुनी, पढ़ी बातों से मिले ज्ञान पर अपने बुद्धि और विवेक से चिंतन करने पर यह तो पता चलता है कि हमारे लिए उचित और अनुचित क्या है। किंतु यह सैद्धान्तिक ही है अभी। जब उसी बात को चिंतन मनन के पश्चात हम स्वयम अनुभव करते हैं तो पता चलता है कि उसका हमारे जीवन पर क्या असर है। हमारी अनुभूति जो ज्ञान के चिंतन पर आधारित है बतलाती है कि हमारे विकार कौन हैं और अनुभूति के बाद विकारों से मुक्ति के लिए हम प्रयासरत होते हैं। इससे हमारा मन निर्मल होता है। यह शोधन की प्रक्रिया ऐसी है कि इसे हमें खुद ही करना होता है।
जब ध्यान के माध्यम से हम विकारों से मुक्त होते हैं तो मन से दुख खत्म होता है और सुख की प्राप्ति होती है। यही सुख चिरस्थाई है। इस प्रकार जब मन से विकार हटते हैं तो आचरण में धर्म का अवतरण होना तय है।
विकार मुक्त होने का मार्ग
विकारों से मुक्त होने का मार्ग ध्यान से मिलता है। हमारा कल्याण कोई पारलौकिक शक्ति नहीं करती है बल्कि हमें खुद ही खुद का परिमार्जन और सम्वर्द्धन करना होता है। हम चाहे जितनी पूजा अर्चना कर लें, चाहे कितने तीर्थ घूम लें, चाहे कितने शास्त्र पढ़ लें, चाहे जो बाबा और तांत्रिक की शरण में जाएँ लेकिन हमारी भलाई तभी हो सकती है जब हम स्वयं प्रयास करेंगे।
तो हमें करना क्या है? इस प्रश्न का उत्तर तो सरल है कि हमें अपने मन से विकारों को हटाना है। लेकिन ये विकार हटेंगे कैसे? इसके लिए ध्यान का अभ्यास तो करना होगा। शांत मन से देखिए और निम्न चरणों पर ध्यान दीजिए।
1.शांत होकर शांत माहौल में एकांत भाव से बैठिये।
2.अपना सारा ध्यान अपनी साँसों पर केंद्रित कीजिये।
3.सामान्य गति से साँसों को आने जाने दीजिए।
4.मन में विचारों के प्रवाह को आने जाने दीजिए।
5. जो कुछ शरीर और मन में हो रहा है होने दीजिए, उसके साथ कोई छेड़ छाड़ मत कीजिये। बस उसे देखिए कि हो क्या रहा है। जो हो रहा है उसके साथ कोई सम्वाद मत कीजिये।
6.जैसे ही मन में कोई अच्छी बात याद आती है, देखियेगा कि साँसों की गति बढ़ जाती है और मन खुश हो उठता है। फिर मन की ईक्षा होती है कि यही अच्छी बात होती रहे। एक मोह जन्म लेता है, लोभ हो जाता है कि ऐसा ही कुछ होता रहे।
7.फिर मन में कोई बुरी बात याद आती है, मन कसैला हो जाता है, सांसो की गति बढ़ती है, क्रोध, निराशा, धृणा, ईर्ष्या जैसे भाव जन्म लेते हैं।
8.दोंनो भावों को आने जाने दीजिए।
9.ध्यान से देखिए तो पाइयेगा कि इन दोनों स्थिति में मन में विकार जन्मा, राग का विकार जन्मा या द्वेष का विकार जन्मा। हर बार जब किसी चीज से जुड़ गए, किसी चीज से सम्बद्धता हुई कि विकार जन्म लेता है और यही विकार मन से होते हुए हमारी कर्मेन्द्रियों को संचालित करने लगती हैं। सो विकारों से बचना है तो किसी भी चीज से जुड़ाव होने से बचना चाहिए।
10.संसार से हमारा संम्पर्क हमारी इंद्रियों के माध्यम से होता है। आँख, कान, नाक, जिव्हा और त्वचा से हम संसार के सम्पर्क में आते है और इन सम्पर्कों के कारण ही हम प्रतिक्रिया देते है । यही प्रतिक्रिया विकार को जन्म देती है। जैसे किसी का स्पर्श हमें। ममत्व या वासना देता है। फिर उस ममत्व या वासना से सम्बद्धता के कारण हम उस सम्पर्क को अधिक से अधिक चाहने लगते हैं। इससे लोभ उतपन्न होता है और लोभ की पूर्ति के लिए हम येन केन प्रकारेण प्रयास करते हैं। इस कारण से हम गलत मार्ग पर भी चल देते हैं। इसी प्रकार कोई बात हम सुनते हैं। मान लीजिये कि हमने कोई शब्द सुना। सुनते ही मन ने उस शब्द का विश्लेषण कर पहचाना कि यह शब्द गाली का है। बस क्या है , हम उस शब्द की प्रतिक्रिया में। गुस्से में आते हैं। फिर हम भी गाली देते हैं या हिंसा करते हैं या बल नही है तो निराश होकर रह जाते हैं।
11.इस प्रकार ध्यान हमारी मदद करता है कि हम पहचान सकें कि किस प्रकार सम्बद्धता के कारण हम प्रतिक्रिया कर देते हैं और मन में विकारों को जन्म लेने देते हैं। ये विकार हमारी साम्यावस्था को विचलित कर देते हैं।
सिर्फ प्रतिक्रिया की प्रक्रिया के दौरान ही विकारों से नहीं निपटना होता है, बल्कि यदि वास्तव में हम अपने अंदर से विकारों को समाप्त कर एक बेहतर इंसान बनना चाहते हैं तो हमें यह समझना होगा कि जब भी हम कोई कर्म करते हैं तो हमारे लिए जरुरी होता है कि हम इस बात की पर्याप्त सावधानी बरतें कि हमारे मन में वैसे कोई विकार जन्म न लें जिनसे हमारे अंदर क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, आदि विचारों का जन्म हो। ध्यान रखे कि यदि हम किसी को गाली देने का उपक्रम करेंगे तो उस व्यक्ति को गाली देने के पूर्व हमें स्वयं के विचारों को दुषित करना होगा। इससे हम स्वयं को पहले विचलित करते हैं तभी दूसरे के प्रति विकार युक्त आचरण कर पाते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं तो दूसरे का अहित करने के पूर्व हमें खुद का अहित करना पड़ता है जो किसी भी तरह से एक बुद्धिमानी का निर्णय नही हो सकता है।
4. धर्म सार्वभौमिक रूप से एक है
धर्म का स्वरूप सार्वभौमिक और सार्वकालिक होता है। समय, स्थान, काल, से इसका कोई लेना देना नहीं है। परिवर्तन होता है सम्प्रदायों में लेकिन धर्म तो एक ही होता है जो सम्प्रदायों से मुक्त होता है। जैसे यदि किसी कारण वश हमारे मन में कोई विकार उतपन्न होता है तो उस विकार और उस विकार स्वरूप उतपन्न होने वाली बेचैनी और व्याकुलता सभी समय और सभी स्थान में एक ही होता है और उसका दुष्परिणाम भी एक ही होता है। यदि हमारे मन में क्रोध उतपन्न होता है तो उसका कोई सम्प्रदाय नहीं होता है बल्कि वह क्रोध समान रूप से हर सम्प्रदाय के व्यक्ति के मन में एक सी व्याकुलता को पैदा करता है। इस प्रकार विकारों से दूर होने पर मन में जो शांति, व्यवहार में हो कुशलता आती है वह भी सात्वभौमिक रूप से एक ही होती है।
धर्म सार्वजनिन होता है
प्रायः धर्म को किसी सम्प्रदाय या पंथ के नाम से जाना जाता है, जैसे हिन्दू धर्म, मुस्लिम धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म इत्यादि। तो क्या ये सभी धर्म अलग अलग होते हैं? क्या हिंदुओं का धर्म दुसरों से अलग है, क्या व्यक्ति अपने अपने जन्म के अनुसार अलग अलग धर्म पालन के लिए बाध्य होते हैं?
दरअसल, जिनको प्रचलित भाषा में धर्म कह दिया जाता है वह धर्म है ही नही । वह तो मात्र पंथ है। वास्तव में धर्म वह है जो व्यक्ति धारण करता है। व्यक्ति क्या धारण करता है? संसार के सभी व्यक्ति , चाहे वे संसार के जिस कोने में रहते हों, और चाहे काल के किसी खण्ड में रहते आये हों वे सभी एक ही धर्म धारण करते हैं। जो धारण करते हैं वह है कि यदि व्यक्ति अच्छा आचरण, अच्छा विचार रखता है तो उसे शांति मिलती है और यदि बुरा विचार रखता है अथवा दुराचरण करता है तो व्याकुल होता है। हिन्दू गुस्सा होता है तो क्या उसके गुस्सा से उसे जो व्यकुलता होती है वह मुस्लिम के गुस्सा से उंसके अंदर उतपन्न व्यकुलता से भिन्न होती है? गली सुनकर सभी को बुरा लगता है, आग से सभी समान रूप से जलते हैं और बर्फ से समान रूप से शीतलता प्राप्त करते हैं। ऐसा सम्भव है क्या कि हिन्दू को आग से ताप मिले लेकिन मुस्लिम को शीतलता?
इस प्रकार स्पष्ट है कि संसार के सभी प्राणियों का धर्म एक ही है और अधर्म यानी जो धर्म के विपरीत है वह भी एक ही है।
धर्म पंथ से भिन्न है
धर्म सार्वजनिन होता है अर्थात सभी के लिए एक ही होता है। साथ ही सार्वकालिक भी होता है यानी हर समय एक ही होता है।
धर्म कैसे आता है
हमने देखा समझा है कि धर्म पंथों की परंपरा से मुक्त एक सार्वभौमिक और सर्वकालिक सत्य है जो सनातन है, अजर है, अक्षय है, अमर है। जो अपने चरित्र में ऐसा नहीं है वह धर्म नहीं है, धारण करने लायक भी नही है। माया और राग से मोह निकलता है और उससे जन्म लेते हैं ईर्ष्या, जलन, क्रोध, लोभ, हिंसा, अनाचार, असत्य जैसे दुर्गुण। क्या इनमें। से किसी को भी धारण करने से आप शांति का अनुभव कर सकते हैं। और क्या आप मान सकते हैं कि अलग अलग सम्प्रदाय या पंथ के लोगों में इन दुर्गुणों का प्रभाव अलग अलग हो सकता है। आप चाहे जिस पंथ के हों ये दुर्गुण आपके लिए दुर्गुण ही रहते हैं जिनको धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति चाहे जिस सम्प्रदाय का हो एक ही व्यकुल्ता को झेलता है। इसके विपरीत जो सद्गुण हैं वे भी सार्वकालिक और सार्वदेशिक हैं। प्रेम, सत्य , अहिंसा, सदाचार आदि धारण करने वाला व्यक्ति चाहे जिस पंथ का हो अच्छा ही महसूस करता है। इनका पंथ से कोई लेना देना नहीं होता है। सत्य का कोई एक सम्प्रदाय नहीं होता है, सत्य सभी सम्प्रदाय या पंथ में एक समान होता है। गुलाब की सुगंध हिन्दू हो या मुसलमान सबको अच्छी ही लगेगी, और अग्नि से सबको ताप ही मिलेगा, गाली से सबका हृदय व्यथित ही होगा, प्रेम से सभी को शीतलता ही मिलेगी। सो धर्म उसे ही मिलता है जो पंथों में नहीं बन्धकर, सार्वकालिक, सार्वदेशिक, सार्वजननीन सदगुणों को धारण कर मन में शांति, प्रेम, सद्भाव देता है जबकि अधर्म वह दुर्गुण है जो सभी काल और स्थान में सभी को व्याकुलता देता है। सो जो पंथ में बंध जाता है वह तो परम्परा के नाम पर दुर्गुणों को भी ले लेता है, भावनात्मक होकर अनाचार भी करने के लिए तैयार हो जाता है। लेकिन जो पन्थ की परंपरा से आगे सत्य को सपनात है वह धर्म के मार्ग पर चलता है। वह किसी भी सम्प्रदाय अथवा पंथ का हो यदि वह सदगुणों। को धारण करता है तो धर्म धारण करता है और यदि दुर्गुणों को धारण करता है तो अधर्म के मार्ग पर चलता है। उसे न तो पंथ सुधार सकता है नही बिगाड़ सकता है। धर्म ही एकमात्र सहारा होता है।
धर्म का पालन कैसे करें
धर्म का आचरण करने के लिए तीन मार्ग होते हैं
1.शील, सदाचार का पालन करना
2.समाधि/ध्यान करना
3.प्रज्ञा यानी स्वयं को प्रज्वलित करने का अपना ज्ञान पाना।
शील/सदाचार क्या है? जब हम कोई ऐसा आचरण मन से, वाणी से या कर्म से करते हैं जिससे हमारे मन में विकार जन्मता है तो क्या होता है
#सबसे पहले हम स्वयं को उस विकार के कारण व्याकुल हुआ पाते हैं। इसके कारण हम स्वयं को व्यथित कर लेते हैं।
#इस व्यकुलता के कारण हम दूसरे को भी कष्ट पहुँचाते हैं। अपने व्यवहार से हम खुद को, और दूसरे को भी कष्ट देते देते हैं ।
# इस प्रकार हम पूरे वातावरण को व्याकुल कर उसे हिंसक कर देते हैं और पूरा वातावरण ही अशांत कर देते हैं।
यह रास्ता अनाचार, दुराचार का होता है। इसके विपरीत यदि हम ऐसा व्यवहार करते हैं जो हमें भी शांति देता है, तो हम दूसरों को भी सुख और शांति देते हैं। अनाचार, दुराचार के विपरीत किया हुआ व्यवहार शील /सदाचार का आचरण है जो धर्म का आचरण कहलाता है। धर्म सभी परिस्थिति, सभी काल, सभी स्थान सभी व्यक्तियों में एक ही होता है। कोई हिन्दू हो, कोई मुस्लिम हो, ईसाई हो, सिख हो, बौद्ध हो यह सब उसके पंथ हैं। इन सभी के लिए धर्म एक ही है। जब व्यक्ति सच बोलता है, सच का पालन करता है, किसी को अपने मन, वचन और कर्म से क्लेश नहीं देता है तो स्वयं भी खुश और सुखी होता है और दूसरे को भी खुशी और सुख देता है, फिर चाहे ऐसे व्यक्ति किसी पन्थ के हों, हिन्दू हो, मुस्लिम हो, सिख या ईसाई हों या कुछ और। क्रोध आने पर सभी को व्यकुल्ता होती है, लोभ होने पर ईर्षा, काम वासना, जलन, और हिंसा होती ही है फिर चाहे वह हिन्दू हो, मुस्लिम हो, सिख हो ईसाई हो। यही धर्म यानी शील, सदाचार का मार्ग है।
#और जब व्यक्ति शील और सदाचार के मार्ग पर चलता है तो वह सुखी होता है, शांत होता है, संतुष्ट होता है और उसकी यह अवस्था ही उसे स्वतः समाधि यानी ध्यान की तरफ लेकर चली जाती है। उसे समाधि का प्रयास नहीं करना होता है बल्कि वह तो हर समय, हर कर्म करता हुआ भी ध्यान की अवस्था में ही होता है। शील का मार्ग मन से मोह, बन्धन, लोभ, लालच, ईर्ष्या, क्रोध जैसी व्याकुल कर देनी वाली प्रवृत्तियों को समाप्त कर देते हैं तब मन स्वाभाविक रूप से किसी में बन्धता नहीं है और जब मन बन्धता नहीं है तब फिर वह स्वयं पर ही ध्यानस्थ हो जाता है। समस्त कामनाओं और क्रोध सहित हरेक दुराचरण से मुक्त मन एकाग्र होकर एक अपने पर ही एकनिष्ठ ध्यानस्थ हुआ व्यक्ति को समाधिस्थ कर देता है।
धर्म में किसे जाने
धर्म धारण हम करते हैं तो इस धर्म में हम क्या जाने? इस प्रश्न का उत्तर है कि धर्म में हमें किसी बाहरी तत्व, किसी बाहरी शक्ति को नहीं जानना है बल्कि धर्म में , धर्म के द्वारा हमें स्वयं को जानना है और स्वयं को जानकर धर्म का पालन करना होता है। शील, सदाचार, ध्यान आदि की तो बात हम अपने ही सन्दर्भ में करते हैं न ? तो फिर हमें जिसे धर्म धारण करना है कौन हैं ये जानना तो सबसे पहले अनिवार्य है। हम स्वयं को इन शारीरिक इंद्रियों के द्वारा जानते हैं तो क्या इंद्रियों से परे जाकर भी स्वयं को जानने का मार्ग है? निश्चित है। और इसी मार्ग से चलकर हम स्वयं को जानते धर्म को भी जानने लगते हैं।
स्वयम को कैसे जाने
स्वयं को जानने का मार्ग है स्वयं के अंदर जाना। अब यह हो तो कैसे हो? कई लोग महापुरुषों के प्रवचनों को सुनने की हिदायत देते हैं तो कई कहते हैं कि शास्त्रों का अध्ययन करें। कई कहते हैं चिंतन करें तो कई कहते हैं ध्यान करें। कोई ईश्वर की आराधना की बात करता है तो कोई कर्मकांडों के अनुसरण का सुझाव देता है। किंतु ध्यान रहे कि ये सारे सुझाव हमारे लिए तभी हितकारी हैं जब ये हमारा परिचय हमसे करा सकते हों। अन्यथा इनका हमारे जीवन में कोई मोल नहीं है। तो फिर क्या करें? इन सारे सुझावों के प्रति सम्मान रखे किन्तु आप स्वयं पर टिके और स्वयं के वर्तमान पर टिके। ध्यान एकाग्र कर स्वयं को वर्तमान पर टिकाएं और देखें कि वर्तमान में आपके अंदर क्या चल रहा है। जो चल रहा है उसे सिर्फ देखें, उसमें हस्तक्षेप न करें। देखें कि आपके अंदर वर्तमान में क्या क्या घटित हो रहा है, कौन कौन भाव उतपन्न हो रहें हैं । जैसे भटक कर आप भूत या भविष्य की तरफ जाते हैं वैसे आप द्रष्टा से भोक्ता हो जाते हैं। तब आप किसी मन भावन या वैर से ग्रस्त हो कर राग या द्वेष में पड़ जाते हैं। ठहरिये, ध्यान को खींच कर पुनः वर्तमान पर टिकाये और देखें कि वर्तमान में आवक सत्य क्या है। तब आपको पता चलता है कि कितने तरह के भाव जो राग के हैं, द्वेष के हैं आपके अंदर पल रहें हैं और ये आपको आपके स्वयं से मिलने नहीं दे रहें हैं। इनसे मुक्त होइए, इनसे खुद को दूर कीजिये, तब आप विकारों से दूर हो पाइयेगा। विकार समाप्त होंगे तो दृष्टि साफ होगी। यह अंतर्दृष्टि आपको अपने अंदर का सत्य बतायेगी कि आप विकारों के समग्रह नहीं हैं बल्कि आप निर्मल जीव हैं ।यही स्तय हैं, विकार असत्य हैं क्योंकि वे आते ही हैं मन को उद्विग्न कर देने के लिए।
ध्यान रखे कि धर्म पर चर्चा तो बहुत होती है, बस धर्म का पालन नहीं होता है। ऐसा क्यों? क्या धर्म पालन से कोई नुकसान है? दरअसल होता यह है कि धर्म के सम्बंध में अध्ययन करने वाला ,उसके सम्बन्ध में चर्चा करने वाला धर्म के बारे में जो भी बात करता हैं वह दूसरों के अनुभव होते हैं। उसके इष्ट भी दूसरे ही होते हैं। धर्म की चर्चा तो हो जाती है, लेकिन वह चर्चा अन्य के जीवन और उसके अनुभवों की होके रह जाती है। जरूरत होती है कि उन चर्चाओं में जो है उनसे आगे बढ़कर स्वयं को धर्माचरण में लगाना । और ऐसा होता तब है जब हम स्वयं को ही अभीष्ट समझें और स्वयं को ढूँढने की यात्रा प्रारंभ करें। इस स्थिति में हम अपने अंदर बैठे दुर्गुणों को पहचान लेते हैं और उनसे पार पाने का रास्ता भी मिल जाता है। यही धर्माचरण होता है, धर्म का पालन करना होता है। लेकिन इसके लिए स्वयं की यात्रा पर तो निकलना ही होगा। जीवन मिथ्या नहीं है। बल्कि जीवन का लक्ष्य है जीवन के सत्य और इसके महत्व का अन्वेषण करना और सत्य का अन्वेषण सत्य के मार्ग से ही हो सकता है। आत्मशोधन ही सत्य शोधन है और सत्यशोधन ही आत्मशोधन है। दूसरों के द्वारा बताए मार्ग प्रेरणा दे सकते हैं लक्ष्य नहीं। लक्ष्य के लिए स्वयं ही धर्म के मार्ग पर चलना होता है। स्वर्ग, मोक्ष आदि मात्र प्रेरक कारक हैं वास्तविक कार्य है आचरण में सत्यता लाना।
Comments
Post a Comment