1.धर्म

1.धर्म क्या है?

अक्सर कहा जाता है कि धर्म का पालन करें, धार्मिक बने। तो ये धर्म जिसके अनुसरण की बात कही जाती है वह है क्या?
     अक्सर धर्म का अर्थ किसी आस्था विशेष से लगाया जाता है। किंतु इसके विपरीत धर्म आचरण से जुड़ा हुआ विषय है और सभी तरह की आस्था वालों में समान रूप से लागू होता है। मन, वचन और कर्म के सम्मिलित रूप में आचरण कहा जाता है और जब इस तरह के आचरण में सद्गुणों का प्रवाह होता है तो उसे धर्म कहते हैं और जब दुर्गुण हावी होते हैं तो उसे ही अधार्मिक या विधर्मी कहते हैं।
    ये सद्गुण सभी में, बिना भेद भाव के एक समान होते हैं। सच बोलना, झूठ से परहेज करना, हिंसा नहीं करना, अत्याचार और अनाचार नहीं करना, किसी का अपमान नहीं करना, दया और क्षमा भाव रखना आदि ऐसे गुण हैं जो सद्गुण की श्रेणी में आते हैं और इनको आत्मसात करने के मार्ग में आस्था बाधा नहीं बनती है।
  ये आचरण स्थित गुण किसी भी जाति, सम्प्रदाय, नस्ल में आते हैं तो उनकी आस्था इन गुणों का स्वागत ही करती है। सो धर्म आस्था से ऊपर की अवस्था है जिसके केंद्र में जीव मात्र का कल्याण और सभी जीवधारी और स्थूल वस्तुओं , सभी दृश्य और अदृश्य के प्रति सम्मान और आदर होता है। यही आचरण धर्म कहलाता है।

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