3. धर्म के आचरण को कैसे पाएँ

3. धर्म के आचरण को कैसे पाएँ

अब प्रश्न उठता है कि ध्यान से क्या हो जाएगा, उससे कौन सा सुख मिल जाएगा? हम सभी दुखों से छुटकारा चाहते हैं। दुखों का अंत ही सुखों की परकाष्ठा है। लेकिन दुख हमको है तो उस दुख को दूर भी हम हीं को करना है, कोई अन्य नहीं करने आ रहा है।
       दुखों का कारण क्या है? उनका स्रोत क्या है? दुख की अनुभूति भीतर हो कि बाहर हो उनका स्रोत हमेशा हमारे भीतर ही होता है। दुख तब तक नहीं आते जब तक मन में विकार नही  जन्मते। मन के विकार एक ही चीज देते हैं-मन को बेचैन करते हैं। गुस्सा, चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, हिंसा आदि जो कोई भी विकार हैं वे हमारे मन के हैं। ये विकार हमें उद्वेलित और बेचैन करते हैं। और ये बेचैनी हमें दुख देती है।
        ध्यान से दुख दूर होते हैं। लेकिन कैसे? जब ध्यान खुद पर केंद्रित हो(अपनी साँस पर) और मन मात्र और मात्र वर्तमान पर टिका हो तो मन न बीते साँस(समय) को देखती है, न ही आने वाली साँस ( समय) को। वर्तमान में जो अनुभूति मिल रही है, वही सत्य है, बाकी न बिती हुआ और न ही आने वाली सांस कोई अनुभूति देने में सक्षम है। यदि उनकी चिंता करेंगे तो वर्तमान में मिल रही अनुभूतियों को भूल जायेंगे और अतीत और भविष्य की सोच सोच कर बेचैन होते रहेंगे।
      सो मन को वर्तमान पर टिकाए जो अनुभूतियाँ मिल रही हैं उनको उसी रूप में लें। अपनी तरफ से न कुछ जोड़ते हैं न घटाते हैं। जो है सो है। वही सत्य है। सत्य की यह पहचान हमें अपने मन के विकारों को पहचानने और उनको दूर करने का अवसर प्रदान करती है। अन्यथा हम तो अतीत और भविष्य में फँसे विकारों को ही जीते रह जाते हैं। जैसे जैसे मन में बसे विकार दिखते जाते हैं हम उनको अपने मन से और आचरण से निष्काषित करते जाते हैं। सुनी, पढ़ी बातों से मिले ज्ञान पर अपने बुद्धि और विवेक से चिंतन करने पर यह तो पता चलता है कि हमारे लिए उचित और अनुचित क्या है। किंतु यह सैद्धान्तिक ही है अभी। जब उसी बात को चिंतन मनन के पश्चात हम स्वयम  अनुभव करते हैं तो पता चलता है कि उसका हमारे जीवन पर क्या असर है। हमारी अनुभूति जो ज्ञान के चिंतन पर आधारित है बतलाती है कि हमारे विकार कौन हैं और अनुभूति के बाद विकारों से मुक्ति के लिए हम प्रयासरत होते हैं। इससे हमारा मन निर्मल होता है। यह शोधन की प्रक्रिया ऐसी है कि इसे हमें खुद ही करना होता है।
       जब ध्यान के माध्यम से हम विकारों से मुक्त होते हैं तो मन से दुख खत्म होता है और सुख की प्राप्ति होती है। यही सुख चिरस्थाई है। इस प्रकार जब मन से विकार हटते हैं तो आचरण में धर्म का अवतरण होना तय है।
      

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