2.धर्म का आचरण
2.धर्म का आचरण
जन्म से धर्म प्राप्त नहीं होता है, जन्म से प्रचलित सम्प्रदाय की प्राप्ति होती है। धर्म तो तब प्राप्त होता है जब धर्म की विशेषताएँ, उंसके लक्षण हमारे आचरण में ढल जाते हैं। जब तक हम धारण नहीं करते तब तक धर्म हमारा नहीं होता है।
धर्माचरण के सम्बंध में जानते तो सभी हैं। सभी जानते हैं कि सत्य बोलना, अहिंसा करना, चोरी नहीं करना, नशा(पदार्थ, धन, सत्ता, स्त्री आदि सभी का) नहीं करना है, व्यभिचार नहीं करना है, सभी शास्त्रीय पुस्तकों में तो यही बताया और समझाया जाता रहा है किंतु जानने मात्र से वह धर्माचरण हमारे आचरण में ढलता नहीं है। सो धर्म जन्म से नहीं अभ्यास से प्राप्त होता है, आचरण से प्राप्त होता है।
अब प्रश्न उठता है कि जब धर्माचरण के बारे में सभी जानते हीं हैं तो फिर सभी उनको अपनाते क्यों नहीं हैं। इसका सीधा सरल उत्तर है कि जान लेने के बाद भी हमारा मन इतना चंचल होता है कि वह इस ज्ञात सत्य को अपना नहीं पाता है। बुद्धि कहती है झूठ मत बोलो, विवेक समझाता है कि झूठ मत बोलो, हमारी आस्था की उक्तियाँ, उंसके प्रवचन, उसकी शास्त्रीय पुस्तकें भी बतलाती हैं कि झूठ मत बोलो, लेकिन मन अपनी चंचलता से विवश हुआ इस पर टिकता ही नहीं। तुरत उंसके अंदर लोभ आ जाता है, क्रोध और घृणा आ जाती है, बदले की भावना और आगे निकल जाने की बेचैनी छा जाती है। फिर तो झूठ, हिंसा, ठगी अनाचार की बयार चल पड़ती है और धर्माचरण का सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।
तो इसका अर्थ यही हुआ कि यदि मन वश में हो, हमारी चेतना हमारे मन की मालिक हो तब तो मन स्थिर होकर धर्माचरण को आत्मसात कर सकता है। मन की एकाग्रता एक बात है और मन की चैतन्य अनुभूति दूसरी बात है। एकाग्रता से मन निर्मल नही होता है। मन तो चोर का भी एकाग्र होता है चोरी करने वक्त। हत्या की घात लगाए बैठे अपराधी की भी एकाग्रता और चौकन्नापन एकदम सटीक होता है लेकिन इस एकाग्रता से आचरण में धर्म की प्रवृत्ति नहीं आती है। तो फिर कैसे आती है? मन को अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक करना होता है, किसी अन्य के प्रति नहीं। मन को स्वयं पर केंद्रित करना होता है, स्वयं की अनुभूतियों पर केंद्रित करना होता है। शांत मन से प्रकृति के नियमों को अपने ऊपर घटित होते देखना होता है। यह तब दिखता है जब हमारा ध्यान स्वयं पर शान्ति से टिक गया हो। जो अनुभूति हो रही हो बस उसका मन के स्तर से निरीक्षण करना होता है, उंसके साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं करनी होती है। स्वयं पर केंद्रित होकर देखते रहें कि प्रकृति के नियमों के द्वारा आपके अंदर किस सत्य को प्रकट किया जा रहा है। जो प्रकट हो रहा है उसे ही देखना है। उसपर अपने किसी पूर्वाग्रह का कोई लेप नहीं चढाना है। स्वयं के बारे में प्रकट हो रही सच्चाई को उसी रूप में जानना और स्वीकारना है। मन आपका है तो फिर सच्चाई दूसरे की क्यों जानना। धर्म का आचरण हमें करना सीखना है तो फिर ध्यान में किसी अन्य को क्यों लाना, दूसरे की खासियतों से हमारा क्या भला होने वाला है। सो शांत मन से स्वयं को देखते जाना है, स्वयं के बारे में जो जो प्रकट होते जा रहा है, उसे उसी तरह , बिना किसी मिलावट के , बिना किसी अपराध बोध के देखते समझते शांत भाव से स्वीकार करना है। बस एकाग्रता भी आती जाएगी और मन का मैल भी निकलता जाएगा। जैसे जैसे मन का मैल उतरेगा वैसे वैसे मन पर धर्माचरण का प्रभाव होते जाएगा। बिना मन का मैल हटाये, पूर्व से बैठे धूल को साफ किये धर्माचरण का प्रभाव उसपर नहीं आता है। यह अभ्यास की चीज है। एक दिन में नही होगा, बारम्बार अभ्यास से होगा।
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