श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13परिचय
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13
परिचय
हम कौन हैं और हमारा क्या औचित्य है? क्या हम वही हैं जिसे दुनिया देखती , सुनती और जानती है? हमारा खुद का खुद से क्या परिचय है? क्या हम खुद को खुद से अपने नाम, अपने रूप रंग, अपने भौतिक उपलब्धियों से ही जानते हैं या कुछ अन्य भी है? तो फिर हमारे होने का औचित्य क्या है?
इन प्रश्नों का उत्तर हमें श्रीमद्भागवादगीता में तीन चरणों में मिलता है:-
प्रथम चरण में हम यह समझते हैं कि हम वो शरीर नहीं हैं जिसे देखा और भोगा जाता है, बल्कि इस स्थूल स्वरूप से भिन्न हम आत्मा हैं, यानी चेतना हैं।
द्वितीय चरण में हम ये जानते हैं कि परम सत्ता ईश्वर की है जिसे हम परमात्मा कहते हैं ।
और तीसरे चरण में हम समझते हैं कि चेतना के रूप में हम उस परम चेतना के ही प्रतिरूप हैं जिससे सम्पूर्ण संसार नियंत्रित और चालित है।
परमात्मा यानी परम् चेतना उस निराकार स्पेस की तरह है जिसे हम न तो देख सकते हैं , न ही हम उसे माप सकते हैं और न ही उसे कोई भौतिक रूप ही दे सकते हैं। हाँ हमें यह तो जरूर लगता है कि यह फलाना वस्तु है जिसका यह रूप रंग आकार है। इस स्वरूप में वह वस्तु कुछ स्पेस धारण करता है किंतु द उस रूप रंग आकार के समाप्त होते ही वह स्पेस वृहत्त स्पेस में मिल जाता है। यही हाल मनुष्य के रूप में हमारा भी है। शरीर का स्थूल स्वरुप बाहरी है किंतु आत्मा उस वृहत्त परमात्मा का ही स्वरूप है और स्थूल शरीर एकआवरण मात्र है। चूँकि व्यक्ति का मूल उसकी आत्मा है और वह सभी जीवों में समान है सो सभी जीव एक समान ही ईश्वरीय स्वरूप की भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति मात्र हैं। और यही ईश्वरीय उद्गम व्यक्ति के अस्तित्व का औचित्य भी है।
आत्मा और परमात्मा के इसी सम्बन्ध को, यानी अहम ब्रह्मास्मि के स्वरूप को श्रीमद्भागवादगीता के अध्याय संख्या 13 से 18 तक में निरूपित किया गया है।
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