श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 7 

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ ।।7।।

श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह।

क्षेत्र यानी शरीर को समझने वाले को क्षेत्रज्ञ कहा गया है। क्षेत्र यानी शरीर को कैसे जाना समझा जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति में ऐसे गुण हों जिनकी सहायता से हम क्षेत्र को समझते हैं।
इन गुणों को हम मूल्य भी कह सकते हैं और इन्हें ही दैवी गुण भी कहते हैं। इन्हीं गुणों को धारण कर व्यक्ति स्थितप्रज्ञ भी कहलाता है। 
     एक एक कर इन गुणों को देखते और समझते हैं। जब इन्हें समझ लेंगे तो इनको धारण करने में भी सहायता मिलती है।
1.श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव
          लोगों के अंदर ये अहम होता है कि उनसे बेहतर कोई अन्य नहीं है। उन्हें रूप , रंग, अपनी  उपलब्धि आदि पर अभिमान होता है और वे चाहते हैं कि दूसरे लोग इनके लिए उनकी प्रशंसा करें। ये एक ऐसा दुर्गुण है जिसके कारण हम सत्य देखने समझने में असमर्थ हो जाते हैं और हमेशा अपनी श्रेष्ठता के अभिमान में डूबे रहते हैं। यह आदत हमारे ईगो को खुराक देती है जिसके कारण हमें सत्य नहीं दिखता है। इस कारण हमें ऐसे अभिमान से मुक्त होना चाहिए।
2.दम्भ का अभाव
         जो चीज हमारे पास नहीं होती है उंसके होने का दिखावा करना ही दम्भ है और हमेमें से सभी लोगों को यह दुर्गुण होता है। हम दिखावे के लिए विद्वान या कुछ ऐसा दिखने की कोशिश करते हैं जिसे लोग मान्यता देते हैं। इस कारण हम हमेशा अपने बने असत्य के जाल में उलझे रहते हैं । यदि हमें सत्य को जानना है तो दम्भ से मुक्त होना होता है।
3. किसी भी प्राणी को किसी भी तरह नही सताना
      किसी को भी पीड़ा देना हिंसा है। यह पीड़ा हम वाणी या क्रिया से देते हैं।  हिंसा में पीड़ा देने से लेकर हत्या तक शामिल है। इस प्रकार की पीड़ा देने के पूर्व हमें स्वयम को भी अंदर से पीड़ा देनी होती है। जैसे ही हम किसी को हानि पहुँचाने का विचार करते हैं उंसके प्रति द्वेष, क्रोध, जैसे भाव हमारे अंदर जन्मते हैं जो हमें ही पहले अशांत करते हैं और तब हम उस जीव को हानि पहुँचा पाते हैं। इस कारण हम शरीर की स्वाभाविक गति को नही समझ पाते हैं। सो यह आवश्यक है कि हम किसी द्वेष, क्रोध , लालच आदि के अधीन आकर किसी को पीड़ा पहुँचाने के दुर्गुण से बचें।
4. शान्त भाव का होना
      हमारे अंदर किसी प्रकार की अशांति न हो इसका हमें ध्यान रखना होता है। मोह जनित माया, क्रोध, ईर्ष्या, लालच, हिंसा आदि के भाव हमें अशांत करते हैं , सो अशांति के मूल को खत्म करना अनिवार्य होता है।
5.मन-वाणी की सरलता 
         जब हमारे मन , वाणी और कर्म में सरलता होती है और यह सरलता स्वभावतः आती है तब हमारी स्थिति शान्त और संयमित होती है। ऐसी स्थिति में हम किसी का न तो अपमान करते हैं और न किसी के व्यवहार से अपमानित होते हैं।
6.श्रद्धा भक्ति सहित गुरु सेवा
        हम सभी को ज्ञान स्वतः नहीं मिलता है बल्कि कोई न कोई हमें दिशा दिखाता है। वही हमारा गुरु है। लेकिन हम क्यों किसी की बात माने भला। गुरु और गुरु की शिक्षा पर भरोसा बनाये बिना ज्ञान नहीं हासिल हो सकता। लेकिन यह भरोसा बनता कैसे है? दरअसल जब हमें गुरु के प्रति श्रद्धा होती है तभी विश्वास हो पाता है और जब विश्वास होता है तो उनकी शिक्षा में लगन लगता है। बिना शिक्षा पाए मार्ग नहीं सूझता है। सो यह श्रद्धा अनिवार्य है और जब मन में गुरु और गुरु  के द्वारा दी गई शिक्षा पर भरोसा है तो गुरु और उनकी शिक्षा दोनों को ही हम आत्मसात करते हैं। जब गुरु शिष्य के प्रति श्रद्धा और विश्वास का यह बन्धन बनता है तो उनके प्रति सेवा की भावना भी बलवती होती है। प्राप्त शिक्षा का हम उसके उद्देश्य हेतु उपयोग करते हैं। इसके विपरीत यदि अहंकार भाव से गुरु से शिक्षा को हासिल करते हैं तो फिर उनसे प्राप्त शिक्षा का हम गलत उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रयोग करते हैं। द्रोण पांडवों और कौरवों दोनों के गुरु थे लेकिन पांडवों के मन में उनके प्रति श्रद्धा थी सो वे कभी भी उनसे प्राप्त शिक्षा के बल पर अत्याचार अनाचार नहीं करते हैं। लेकिन कौरव पक्ष में अहंकार था सो वे उसी शिक्षा का उपयोग राज्य हड़पने और स्त्री छिनने के लिए करते हैं।
7.बाहर भीतर की शुद्धि
         बिना राग, द्वेष, ईर्ष्या, कपट के जब हम व्यवहार करते हैं तो यह शुद्ध आचरण कहलाता है। इन भावों से अलग रहना आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए जब हम किसी अन्य से कपट पूर्ण व्यवहार करते हैं तो उस व्यक्ति के साथ कपट करने के पूर्व हम स्वयं के मन में उंसके प्रति विद्वेष का भाव उतपन्न करते हैं जिससे सबसे पहले हमें स्वयं ही कष्ट होता है, पहले हम स्वयं को धोखा देते हैं। फिर उस विद्वेष के वशीभूत होकर उस व्यक्ति के साथ कपट करते हैं। इस प्रकार हम पहले स्वयं के साथ हिंसा करते हैं , स्वयं से झूठ बोलते हैं तभी हम दूसरे के प्रति छल कर पाते हैं। सो हमें इन दुराचरण पूर्ण व्यवहार करने की प्रवृत्ति को नहीं ग्रहण करना चाहिए।

8.अन्तःकरण की स्थिरता
       मन को सत्य के प्रति समर्पित कर देने के उपरांत व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मन , वचन और कर्म से अपने लक्ष्य यानी अपने सत्य की प्राप्ति के प्रति स्थिर रहे। व्यक्ति को बारम्बार अपने आचार विचार में बदलाव नहीं लाना चाहिए।
9.मन सहित इंद्रियों का निग्रह
         हमारी इन्द्रियाँ अपना स्वभावगत आचरण करती रहती हैं। किंतु मन इंद्रियों को उनके आचरण में शुद्धता लाना सिखलाता है। यदि मन यह काम नहीं करे तो फिर इन्द्रियाँ अपने विषयों को उद्वेलित करती हैं और हमें दुराचरण करने के लिए प्रेरित करती हैं। यह एक खतरनाक स्थिति होती है जब हम अनियंत्रित मन के वश में होकर अपनी इंद्रियों से उन चीजों को करने लगते हैं जिनसे हमारी और समाज की स्थिरता प्रभावित होती है। सो मन और मन के द्वारा इंद्रियों को उनके बहकावे से बचाना चाहिए।
        


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