श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 3 एवम 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 3 एवम 4

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्‌।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥ ।।3।।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥ ।।4।।
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है- वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किए हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।

शरीर और शरीर को जानने वाले का परिचय तो हुआ लेकिन अब उनके बारे में बिस्तर से समझना भी तो जरूरी है। शरीर यानी क्षेत्र मात्र पदार्थ नहीं है बल्कि इसमें मन, बुद्धि, इन्द्रिय भी शामिल हैं और इसे जानने वाले को चेतना कहते हैं। शरीर की सारी गतिविधियां भिन्न भिन्न अंगों के अतिरिक्त उंसके मन, बुद्धि, विवेक और इंद्रियों से संचालित होती हैं। इसकी व्यख्या श्रीकृष्ण के पूर्व से होती आ रही है। ऋषियों ने, वेद मंत्रों ने और ब्रह्मसूत्र ने शरीर की और उसपर प्रभाव रखने वाले चेतन की व्यख्या की है। श्रीकृष्ण ने भी इसे पुनः परिभाषित किया है।

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