श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ ।।1।।

श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं।

        जीव के शरीर की तुलना क्षेत्र से की गई है और जो इस क्षेत्र को जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहा गया है। शरीर को क्षेत्र यानी field कहने के पीछे कारण यह है कि इस शरीर से हमारे कर्म निष्पादित होते हैं। और उन कर्मों के परिणाम भी इसी शरीर को प्राप्त होते हैं। यही शरीर सद्कर्मों को करते हुए धर्मक्षेत्र भी है और दुष्कर्मों को करते हुए कुरुक्षेत्र भी है। और जो शरीर के इस रहस्य को जानता समझता है वही क्षेत्रज्ञ है।
     शरीर में शरीर के भौतिक पदार्थों के साथ साथ मन , बुद्धि, विवेक, भावना भी आ जाते हैं। लेकिन इस शरीर की अनुभूति किस चीज से होती है? इसकी समझ उस चेतना से होती है जो शरीर की चैतन्य स्थिति से हमें अवगत कराता है। जरूरी नहीं कि शरीर धारण करने मात्र से हम शरीर के सत्य से परिचित ही हों । शरीर का सत्य तो हमें हमारी चेतना से ज्ञात होता है। यह चेतना ही किसी को क्षेत्रज्ञ बनाती है। बिना चेतना के शरीर की कोई अनुभूति नहीं होती है। यह चेतना हमें शरीर और इस शरीर के बुद्धि, विवेक, भावना से भी अवगत कराती है।

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