श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 9, 10

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 9, 10

अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥ ।।9।।

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥ ।।10।।

यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप  योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर।

यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा।

कई बार व्यकि को पूर्व में बताए तरीके से ईश्वर में ध्यानमग्न होने में कठिनाई होती है । हम सभी व्यक्ति अपने सेल्फ यानी स्व के ऊपर अपने ईगो का आवरण ओढ़े हुए होते हैं जिसकी वजह से ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्मों को करने में बाधा आती है। इस ईगो रूपी बाधा से पार पाने के लिए आवश्यक है कि हम बारम्बार अभ्यास करें कि हम किस तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्म कर सकते हैं।  शास्त्रों में जो तरीका अभ्यास के लिए बताए गये हैं उनमें भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ सम्मिलित हैं। यदि इतना भी आप नहीं कर सकते हैं तो आप हर बार अपने कर्मों को करने के पूर्व ठहर कर इस बात की जाँच कर लें कि आप जो भी करने जा रहें हैं क्या आप उसे ईश्वर को समर्पित कर सकते हैं। यह अभ्यास धीरे धीरे आपके ईगो को काटते काटते आपके सेल्फ को उजागर कर देता है और आप ईश्वर में समर्पित होकर कर्म करने के अभ्यस्त हो जाते हैं।

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