श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 19

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥ ।।19।।

जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है।

ईश्वर की भक्ति में लीन व्यक्ति के कुछ और लक्षणों की भी चर्चा की गई है। यथा
23.यह व्यक्ति अपनी बुराई और बड़ाई होने पर भी विचलित नही। होता है। सामान्य लोग सभी की बड़ाई और बुराई करते रहते हैं और जिसकी बड़ाई और बुराई की चर्चा होती है वह इस चर्चा से प्रभावित होकर विचलित भी होता है। किंतु ईश्वरीय विभूतियों में लीन व्यक्ति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई उसकी प्रसंसा कर रहा है या निंदा। यह व्यक्ति तो हर स्थिति में यम टिप्पणियों से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति में उनके शरण में होता है।

24. ऐसा व्यक्ति अपने जीवन पालन के लिए ऐसे प्रयास नहीं करता है जिससे उसके जीवन में बाहरी कारकों से ऐशो आराम मिल सके। यह व्यक्ति शारीरिक सुख और दुख को बिना महत्व दिए हर स्थिति में प्रसन्न ही रहता है। उसे अपने भौतिक सुविधाओं से न तो लगाव होता है न ही कोई मोह। जो है सो है, जो नहीं है सो नहीं है। इसी भाव से यह व्यक्ति स्थिर मन और बुद्धि में स्थित हुआ रहता है।
   

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