श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 18
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 18
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥ ।।18।।
जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है।
20 जो ईश्वर की भक्ति में लीन होता है उसकी नजर जीवों के स्वरूप पर नहीं बल्कि उनके दैवी अस्तित्व पर होता है और वह खूब समझता है कि जीव का रूप और स्वभाव जो भी हो सभी एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति होते हैं। ऐसी समझ से परिपूर्ण व्यक्ति के लिए ये मायने नहीं रखता है कि किसी का उंसके प्रति व्यवहार मित्रवत है या शत्रुवत। वह तो सभी के प्रति समान भाव ही रखता है, सब में दैवी उपस्थिति(divinity) समान रूप से देखता है।
21.ऐसे सम्भाव(equaniminity) में अवस्थित व्यक्ति के लिए मान और अपमान का कोई महत्व नहीं होता है। किसी के प्रति हमारा सम्मान या अपमान व्यक्त करना इसपर निर्भर करता है कि हम उस व्यक्ति का अपनी बुद्धि और विवेक से क्या आकलन करते हैं। लेकिन जो ईश्वरीय भक्ति में सम्भाव में है उंसके लिए हमारा बौद्धिक आकलन कोई महत्व नहीं रखता है और उसका मान करें कि अपमान वह तो हममें ईश्वर का रूप ही देखता है।
22 व्यक्ति को बराबर द्वंदान्तमक युग्मों से जुझना होता है, कभी दुख आते हैं, कभी सुख। कभी ताप महसूस होता है तो कभी शीतलता। ईश्वरीय आराधना में लीन व्यक्ति इन द्वंदात्मक युग्मों को देखता तो है लेकिन उनसे प्रभावित नहीं होता है। जब हमारा आचरण, जब हमारी equanimity यानी हमारी सम्भाव स्थिति बाहरी कारकों से निर्धारित हो तो स्पष्ट है कि हमें अपने divinity यानी अपने अंदर के दैवी स्वरूप पर भरोसा नहीं है। किंतु जो ईश्वरीय भक्ति में लीन है उंसके लिए द्वंद्व के बाहरी कारक उसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते और सुख दुख, हर्ष विषाद, ग्रीष्म शीत जैसे बाहरी कारको को देखते हुए भी उनके प्रति समान स्थिति में बना रहता है।
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