श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 16
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 16
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ।।16।।
जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।
एक ईश्वर के भक्त के अन्य लक्षणों को बताते हुए आगे कहा गया है कि
13.जो ईश्वरीय भक्ति में लीन है वह व्यक्ति मोह से मुक्त होता है और मोह से मुक्ति के कारण उस व्यक्ति को कोई आकांक्षा नहीं होती। आकांक्षा से मुक्त व्यक्ति किसी के लिए न तो सुखी होता है और न ही दुखी होता है। इस तरह से व्यक्ति सभी मोहपाश से मुक्त होता है।
14.यह व्यक्ति अंदर और बाहर से पवित्र होता है। इस स्थिति में व्यक्ति दैवी गुणों से परिपूर्ण होता है और उन्हीं दैवी गुणों के अनुरूप आचरण करने का अभ्यस्त भी होता है।
15.ईश्वरीय भक्ति में लीन व्यक्ति दक्ष होता है यानी वह वर्तमान में रहते हुए हर परिस्थिति पर उनके अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया देता है। उंसके मन में किसी के प्रति कोई पूर्वाग्रह का भाव नहीं होता है।
16.सभी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त भक्त किसी के प्रति न तो अनुराग रखता है और न विराग। उंसके मन में , आचरण में किसी के प्रति कोई पसक्ष्पात की भावना नहीं होती है।
17. चूँकि ईश्वरीय भक्ति में लीन व्यक्ति को कोई मोह नहीं होता है, उसे किसी से जुड़ाव या अलगाव नहीं होता है सो वह व्यक्ति सभी प्रकार के दुखों से मुक्त होता है। उसे न तो कोई चीज संतापित कर पाती है और न ही प्रसन्न ही।
इन गुणों से युक्त व्यक्ति ही ईश्वर की भक्ति कर पाता है।
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