श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 12

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 12

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌ ।।12।।

मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग  श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है। 

ईश्वर को प्राप्त करने के विभिन्न मार्गों को समझने के पश्चात यह आवश्यक है कि हम समझें कि इनमें से कौन सा मार्ग का क्या महत्व है। इस क्रम में हमें समझना चाहिए कि
1.अभ्यास का मार्ग उत्तम अवश्य है किंतु बिना ईश्वरीय आराधना को समझें अभ्यास करना कोई महत्व नहीं रखता क्योंकि यह अभ्यास हमें कँही नहीं ले जाता है। ऐसे अभ्यास से अंधविश्वास और निरर्थक कर्मकांडों का जन्म होता है। बिना समझ के किया गया अभ्यास हमें रूढ़िवादी बनाता है।

2.ऐसे अभ्यास से ज्ञान का महत्व अधिक है। ज्ञान से हम समझ पाते हैं  कि हमारा लक्ष्य क्या है, हमारा स्व और हमारा ईगो क्या है। इस ज्ञान को प्राप्त करना बिना समझ के किये गए प्रयास से बेहतर है क्योंकि इसके बिना हम ईश्वरीय पथ पर आगे नहीं बढ़ पाते हैं। लेकिन मात्र ज्ञान प्राप्त कर लेने से ईश्वरीय विभूतियों की प्राप्ति नहीं हो सकती है। 

3.ज्ञान प्राप्ति का तभी महत्व है जब प्राप्त ज्ञान को हम स्वयं की अनुभूतियों के स्तर पर जी सकें। ये कैसे सम्भव हो पाता है ? इसे सम्भव बनाता है ध्यान। ज्ञान को अपनी अनुभूतियों के स्तर पर महसूस करने को ही ध्यान कहते हैं। मात्र आसन पर बैठकर आँखों को बंद कर लेने और किसी मूरत या शब्द का ध्यान करना ध्यान नहीं होता है क्योंकि इससे कुछ हासिल नहीं होता है। मन चंचल और उद्विग्न बना ही रह जाता है। किंतु जब  हम प्राप्त ज्ञान को अपने ध्यान में अपनी अनुभूतियों के स्तर पर जीते हैं तो समझ में बात आती है कि इस ज्ञान को हम अपने व्यवहारिक जीवन में कैसे उतार कर ईश्वरीय पथ पर आगे बढ़ सकते हैं।

4.लेकिन इस ज्ञान की अनुभूति से ईश्वरीय मार्ग तब तक नहीं मिलता है जब तक हमारे ऊपर हमारा मोह हावी होता है, हम स्वयं और स्वयं के इर्द गिर्द से सम्बद्ध हुए रहते हैं। सो मोह में डूबा मन ध्यान के दौरान भी अपने लोभ लालच, लाभ हानि , हर्ष विषाद आदि में डूबा रहता है और ज्ञान निरर्थक होते जाता है। 
      ज्ञान और ध्यान का महत्व तभी हो पाता है जब हम मोह का और मोह जनित भावों का त्याग कर पाते हैं। मैं और मेरा की भावना से छुटकारा लिए बिना हमारा ध्यान ईश्वर पर केंद्रित नहीं हो सकता है। 
       इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वयं के अन्वेषण और ईश्वरीय प्राप्ति हेतु हमें निम्न तरह से कर्म करने होते हैं।
सर्वप्रथम स्वयं के ईगो को छोड़कर मैं और मेरा के भाव को त्यागना होता है, स्वयं के मोह और मोह जनित समस्त भावों जिनमें सबसे प्रमुख है कर्म के परिणाम से लगाव उसे त्यागना होता है। तत्पश्चात निष्काम भाव से ज्ञान की प्राप्ति और उसके अनुभूति हेतु ध्यान के मार्ग पर चलना होता है और ध्यान की इस प्रक्रिया का निरन्तर और नियमित अभ्यास करना होता है। इस तरह से किये गए कर्म से हम स्वयं का अन्वेषण करते करते ईश्वर को प्राप्त कर पाते हैं।


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