श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 10, 11
श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 10, 11
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥ ।।10।।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥ ।।11।।
यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायणहो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा।
यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर।
यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति पूर्व में बताए गए अभ्यास को भी नहीं कर पाए तो प्रश्न उठता है कि उसे ईश्वर की प्राप्ति कैसे हो पाएगी। यदि कोई व्यक्ति अभ्यास कर के भी ईश्वर के प्रति अपने कर्मों को समर्पित कर के अपने कर्मों को नहीं कर पाता है तो वैसे व्यक्ति के पास अन्य मार्ग है कि वह अपने कर्मों के समस्त परिणामों को ईश्वर को समर्पित कर दे।
इसका तात्पर्य क्या हुआ? दरअसल हम जो भी कर्म करते हैं उनका कोई न कोई परिणाम अवश्य होता है। ये परिणाम हमारे मनोकुल भी हो सकते हैं और प्रतिकूल भी। इन परिणामों पर हमारा कोई वश नहीं चलता है। यदि परिणाम मनोकुल होते हैं तो हमें उनसे राग होता है किंतु यदि परिणाम प्रतिकूल हुए तो हमारे अंदर द्वेष, क्रोध, निराशा , जैसे भाव उतपन्न होते हैं। दोनों ही स्थितियों में हम परिणामों से बन्ध जाते हैं। इसका परिणाम होता है कि हम राग-द्वेष के द्वंद्व में फंसकर ईश्वर से दूर हो जाते हैं।
ध्यान रहे कि प्रत्येक समय में उपस्थित वर्तमान भूत काल का भविष्य होता है और प्रत्येक वर्तमान भविष्य का भूत काल होता है। हम जो परिणाम वर्तमान में प्राप्त करते हैं उनके कारण स्वरूप कर्म हम भूत में किये होते हैं और वर्तमान मरीन किये जारहे कर्मों का फल भविष्य में मिलता है। और भूत और भविष्य दोनों ही हमारी पहुँच से बाहर होते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी भी कर्म का परिणाम हमारे अपने वश में नहीं होता है।
तो फिर हमारे वश में होता क्या है? हमारे वश में दो ही चीजें होती हैं। पहला यह कि हम अपने वर्तमान में ईश्वर को समर्पित होकर कर्म करें । और दूसरा यह कि भूत के जिन कर्मों का परिणाम हमें वर्तमान में मिल रहा है , चूँकि उन परिणामों पर हमारा कोई वश नहीं है हम उन परिणामों को यथारूप में सहर्ष स्वीकार करें।
तो क्या इसका तात्पर्य यह निकला कि हम परिणामों को यथारूप स्वीकार कर के यदि हमारी पराजय हुई हो तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जायें। श्रीकृष्ण ने ऐसी कोई शिक्षा कभी नहीं दी है। उनका मात्र इतना ही कहना है कि
1.जो परिणाम मिले उसे स्वीकार कर लें यानी उनसे न राग रखें , न ही द्वेष। यथारूप , यानी परिणाम जैसे हैं वैसे ही उनको देखें। न प्रसन्न हों, न दुखी हों। यही ईश्वर के प्रति परिणामों को समर्पित करना हुआ।
2.दूसरा यह कि वर्तमान में अपने कर्म नियत तरीके से करें, वे कर्म करें जिनको हम सहर्ष ईश्वर को समर्पित कर सकते हों। जैसे हो सकता है कि वर्तमान में किसी छात्र कोई परीक्षाफल खराब आया हो। अब वह छात्र उस परीक्षाफल को बदल तो नहीं सकता है क्योंकि वह फल तो उसे उसके अतीत के परीक्षा में उस समय उसके किये प्रयासों का नतीजा भर है। अतः उस छात्र को चाहिए कि उस परीक्षाफल से वह निराश न हो बल्कि उसे उसी रूप में स्वीकार करे और दूसरा यह चाहिए कि वह वर्तमान में अपने प्रयासों को और बल दे ताकि भविष्य में जो वर्तमान आने वाला है उसमें उसका परीक्षाफल और अच्छा हो। यदि वह इस वर्तमान में प्राप्त खराब परीक्षाफल से जुड़ा रहा तो उसे निराश होगी, निराशा से उसके वर्तमान के कर्म प्रभावित होंगे और भविष्य में उसे और वह अपने वर्तमान के कर्मों को समुचित ढंग से नहीं कर पायेगा। नतीजा यह होगा कि भविष्य वह भूत और भविष्य से जुड़ा रहा रहेगा और वर्तमान में अपने कर्म करने में विफल होगा।
सो ईश्वर की प्राप्ति का एक मार्ग यह भी है कि व्यक्ति परिणामों को उनके यथा रूप में स्वीकार कर उनको प्रसाद रूप में ग्रहण कर उनको ईश्वर के प्रति समर्पित कर जिये।
इस प्रकार ईश्वरीय प्राप्ति का मार्ग प्राप्त करने हेतु व्यक्ति को चाहिए कि वह निम्न तरह से अभ्यास करें।
1.व्यक्ति को न तो भूत में और न ही भविष्य में रहने की आदत होनी चाहिए। उसे इस लोभ से बाहर निकल जाना चाहिए।
2.वर्तमान में उसे जो भी परिणाम प्राप्त हों उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार करना चाहिए। यह स्वीकारोक्ति सम्पूर्ण होनी चाहिए और परिणामों के प्रति कोई पूर्वाग्रह, कोई मोह, लोभ, क्रोध, घृणा, वैमनस्य आदि नहीं होना चाहिए।
3. व्यक्ति को चाहिए कि वह निरंतर स्वयं को इष्ट में स्थिर रखे और अपने मन और शरीर से किये जाने वाले कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने के भाव से सम्पादित करना चाहिए। किये जा रहे कर्मों की उच्चता को बिना किसी मोह और मोह जनित भाव के किया जाना चाहिए।
4.अपने मन और बुद्धि को समस्त ओर से खींच कर ईश्वर में स्थिर करना चाहिए।
5.इस प्रकार हमेशा साम्य अवस्था में रहना चाहिए।
6. ये सभी क्रियाएँ, पढ़ सुनकर नहीं आ सकती हैं बल्कि इसके लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। दृढ़ निश्चय, और सम्पूर्ण समर्पण के साथ किया जाने वाला अभ्यास जो सायास न होकर स्वभवगत हो जाये उसी को भक्ति कहते हैं। यह प्रयास, यह अभ्यास, यह भाव, ईश्वर के प्रति इस तरह का समर्पण और मोह से इस प्रकार की मुक्ति व्यक्ति के हर कर्म में परिलक्षित होने लगे तो समझिए कि व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति हो चुकी है।
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