श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 54 एवं 55
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 54 एवं 55
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ ।।54।।
परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति
के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ। ।।54।।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥ ।।55।।
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है , वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है। ।।55।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः
ईश्वर को प्राप्त करने , उन्हें उनके विराट स्वरूप में अनुभूत करने का क्या मार्ग है? कर्म , ज्ञान और तप के मार्ग हमें ईश्वर की तरफ ले तो जाते हैं किंतु एक सीमा के बाद उनकी उपलब्धि रुक जाती है। तब आगे का क्या मार्ग है?
आगे का मार्ग है भक्ति का। यह भक्ति क्या है? भक्ति है आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण। और यह प्रेम और समर्पण कैसे हो पाता है? हम जैसे जैसे अपने स्व यानी ईगो से मुक्त होते जाते हैं वैसे वैसे आराध्य के प्रति हमारा प्रेम प्रगाढ़ होते जाता है, उनके प्रति हम अधिक से अधिक समर्पित होते जाते हैं और जब हमारा ईगो पूर्णतः समाप्त हो जाता है हम अपने आराध्य में ही विलीन हो जाते हैं। ईश्वर के प्रति ऐसा लगाव उनमें अटूट श्रद्धा से आती है। श्रद्धा ही प्रेम को और प्रेम समर्पण को जन्म देता है और यही तीनों भाव साथ आकर भक्ति कहलाते हैं। ईश्वर के प्रति यही श्रद्धा, प्रेम और समर्पण जिसे अनन्य भक्ति कहा गया है , हमारे ज्ञान और कर्म को आगे बढ़ाकर हमें ईश्वर के साथ आत्मसात कर देती है।
इस अवस्था को पाने के लिए पाँच उपाय हैं।
एक तो हमारे अंदर यही अनन्य भक्ति का होना अनिवार्य है।
दूसरे इस पूर्ण भक्ति से ओत प्रोत व्यक्ति अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर के प्रति अपने दायित्व को मानकर करता है। व्यक्ति जो कुछ करता है उसे करने के पीछे उसकी भावना होती है कि उसका कर्म परम पिता परमेश्वर के लिए है। इस तरह से किये गए कर्म ही वो कर्म हैं जिनको व्यक्ति को करना है।
तीसरा मार्ग है कि व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके प्रत्येक कर्म के परम लक्ष्य स्वयं ईश्वर होते हैं । यानी दिखने में उसके कर्म भिन्न भिन्न उद्देश्य वाले हो सकते हैं किंतु उस व्यक्ति के भाव में उसके हरेक कर्म का लक्ष्य ईश्वरीय विभूति की प्राप्ति ही होती है।
चौथा मार्ग है कि जब व्यक्ति कर्म करता है तो वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी अन्य से सम्बद्ध नहीं होता है। ईश्वर के स्वरूप में ही समस्त ब्रह्मांड निहित हैं। ईश्वर के प्रति व्यक्ति के लगाव से ही उसके सारे सम्बन्ध पूरे हो जाते हैं। आप न तो मित्र से दूर हैं , न परिवार से, न शत्रु से। वे सभी तो एक ही ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र हैं। सो एक ईश्वर की संगति ही व्यक्ति को सारी संगति दे देती है। अलग से यदि किसी के प्रति कोई आकर्षण या विकर्षण है तो इसका तात्पर्य है कि अभी आपका ईगो पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ है और आपमें ईश्वर के प्रति अभी भी प्रेम, समर्पण और विश्वास की कमी है।
पाँचवा मार्ग है कि किसी से वैर न हो मन में। वैर संगति का ही परिणाम है, जो क्रोध, ईर्ष्या जैसे भावों से उपजता है और ये भाव अनन्य भक्ति के अभाव के परिचायक हैं।
सो यदि ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति का भाव है , यानी उनके प्रति अकाट्य श्रद्धा, प्रेम और समर्पण है और इस भक्ति के कारण व्यक्ति ईश्वर को समर्पित कर, उनको ही परम लक्ष्य मानकर, बिना किसी संगत भाव और वैर भाव के कर्म करता है तो उस व्यक्ति के समक्ष प्रभु अपने विराट रूप में उपस्थित होते हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः
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