श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोकरहित
श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12
श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 परिचय
अहम ब्रह्मास्मि।
मैं ब्रह्म हूँ।
लेकिन इस महा वाक्य तक व्यक्ति पहुँचता कैसे है? क्या मात्र इस वाक्य को दुहराते रहने से यह आत्मसात हो जाता है? नहीं। इस सत्य तक पहुंचाने के तीन क्रम हैं।
1.स्व यानी सेल्फ क्या है यानी मैं कौन हूँ?
2. ब्रह्म कौन है?
3.स्व और ब्रह्म एक कैसे हैं?
स्व यानी सेल्फ क्या है इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के प्रथम छह अध्यायों में यानी अध्याय एक से छह तक में है ।
ब्रह्म कौन है, इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के दूसरे छह अध्यायों यानी सातवें से बारहवें अध्याय तक में है।
स्व और ब्रह्म दोनों एक हैं , इसकी व्याख्या अंतिम छह अध्यायों यानी तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक में है।
स्व की प्राप्ति के मार्ग की परिणति छठे अध्याय में व्यक्त ध्यान की क्रिया से होती है तो ब्रह्म की समझ बारहवें अध्याय के भक्ति मार्ग से पूरी होती है।
और सब का ब्रह्म से संयोग अठारहवें अध्याय के त्याग से पूरी होती है।
सो हम अभी बारहवें अध्याय के मुहाने पर खड़े हैं जँहा से हम पराम पिता परमेश्वर को उनकी भक्ति से जानेंगे और यह भी देखेंगे कि वह व्यक्ति जो भक्त है अर्थात जिसे ज्ञात है कि ब्रह्म कौन है वह कौन है। भक्ति क्या है, क्या यह कोई कर्मकांड है, अथवा मात्र श्रद्धा? भक्ति इन सब से आगे है। भक्ति में एक ही कर्मकांड है और वह है अपने अंदर दैवी गुणों का विकास करना, उन गुणों को आत्मसात करना, इस तरह से आत्मसात करना जिससे ये गुण आपके आचरण की स्वाभाविक गति बन जायें। लेकिन मात्र गुणों से भक्ति नहीं आती है। भक्ति आती है उन गुणों के साथ श्रद्धा का अटूट मेल होने पर। बारहवें अध्याय में हम देखते हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण ने जब भक्ति को समझाया है तो किसी भी बाहरी आडम्बर की कोई चर्चा तक नहीं किये हैं, बल्कि उनके द्वारा बताए गए मार्ग में सिर्फ और सिर्फ श्रद्धा पूर्वक दैवी गुणों का आचरण करना है जिसमें माया, मोह, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, भेदभाव, क्रूरता आदि के लिए कोई जगह है ही नहीं। तो आइए हम भक्ति का अभ्यास करें।
श्लोक 1
ईश्वर की प्राप्ति के दो मार्ग सुझाये गए हैं। एक है, ईश्वर को उनके रूप में ध्यान कर भजना तो दूसरे मार्ग में ईश्वर को निराकार रूप में ध्यान किया जाता है। श्रीमद्भागवादगीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दोनों विधि कहा है। निराकरर ब्रह्म की आराधना में ईश्वर को आकार रहित पाकर उनके अविनाशी, निर्गुण, अक्षर स्वरूप को ध्यान में लाया जाता है
साधक प्रभु को उस निराकार स्वरूप में ध्यान में लाता है। दूसरी तरह ईश्वर का ठोस जीव रूप भी है जिनको ध्यान में धरकर साधक प्रभु को भजता है।
भगवान की दो तरह की साधना विधि होने से साधक को।भ्रम तो हो सकता है कि दोनों में से ज्यादा उत्तम कौन सी विधि है। अर्जुन को भी यही भ्रम है सो उसने श्रीकृष्ण से इसका सामाधान मांगा है।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि जो ईश्वर को उनके ठोस रूप में, उनके स्वरूप में उनके गुणों के रूप में पूजते हैं वे ईश्वर के विशेष प्रिय होते हैं। तो क्या इसका अर्थ ये निकालना चाहिए कि जो ईश्वर की मूर्ति गढ़कर , उसे मंदिरों में स्थापित कर पूजते भजते हैं वे ही श्रेष्ठ हैं? नहीं , कदापि नहीं। दरअसल ध्यान देना होगा कि श्रीकृष्ण कह क्या रहें हैं और अबतक क्या क्या कहें हैं। दरअसल ईश्वर अपने सगुन रूप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और प्रत्येक जीव में , प्रत्येक निर्जीव में ईश्वर व्याप्त है। ईश्वरीय विभूतियों का वर्णन करते हुए और ईश्वर के विश्वरूप का दर्शन कराते हुए श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही ईश्वरीय स्वरूप की अभिव्यक्ति मात्र है। ऐसी स्थिति में ईश्वर मूर्ति मात्र में नहीं बसता है, वह तो हर जगह उस जगह के स्वरूप में विद्यमान है। सम्पूर्ण जगत को ईश्वर का रूप मानकर उंसके प्रति श्रद्धा भाव रखना और उस रूप में ईश्वर को भजना ही ईश्वर के सगुण रूप को भजना है और ऐसे योगी ही ईश्वर के विशेष प्रियजन हैं।
किन्तु कुछ उपासक भगवान को उनके व्यक्त रूप में नहीं बल्कि अव्यक्त रूप में भजते हैं। ऐसे उपासक ईश्वर को किसी रूप विशेष में नहीं देखते हैं। उनके लिए ईश्वर रूप विहीन, आकार विहीन होते हैं। वे प्रभु को भजने के लिए वे प्रभु के उन लक्षणों का ध्यान करते हैं जिनसे उनको प्रभु की समझ तो बनती ही है साथ साथ वे अपने अस्तित्व को भी अलग न मानकर उसी परम् पिता परमेश्वर का अंश मात्र मानते हैं और इस प्रकार वे स्वयं के ईगो और स्वयं की पहचान से मुक्त होकर ईश्वर को उनके महान लक्षणों से भजते हैं, जैसे ईश्वर मन और बुद्धि से समझने के परे होते हैं, वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त होते हैं, उनका स्वरूप शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं हो पाता है, वे सदा एक भाव में होते हैं, उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता है, न ही उनमें कोई क्षरण ही होता है, वे निराकार हैं, उनका कभी नाश नहीं होता है, बल्कि प्रभु ही सब के प्रारंभ और सब के अंत भी होते है और वे सदा सत, चित्त और आनंद स्वरूप सभी में विराजमान होते हैं। ऐसे प्रभु के उपासक प्रभु को इन लक्षणों से पहचान कर उनको भजते हैं। ऐसे उपासक अपने इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त होकर प्रभु ध्यान में लगे होते हैं। वे उपासक सभी में मुझे ही देखते पाते हैं और सो सभी के कल्याणार्थ सभी के हितार्थ लगे होते हैं। ऐसे अव्यक्त प्रभु के उपासक भी प्रभु को ही प्राप्त होते हैं जैसे सगुण रूप के उपासक प्रभु को प्राप्त होते हैं।
सगुण और निर्गुण दोनों तरह की उपासना का परिणाम ईश्वर की प्राप्ति ही है। किंतु निर्गुण उपासना का मार्ग थोड़ा कठिन है। दरअसल व्यक्ति अपने शरीर और शरीर से जुड़ी अपनी पहचान और आवश्यकताओं से आसानी से मुक्त नहीं हो पाता है। दूसरी तरफ ईश्वर की उपासना में व्यक्ति को अपनी फहचान को ईश्वर के साथ विलीन करना होता है। इन दोनों के बीच मनुष्य का सामंजन बैठाने में कठिनाई आती ही है। सांसारिक जीवन जीते हुए इस सामंजन को प्राप्त करने के मार्ग में कई तरह की बाधाएँ भी आती हैं जिनमें प्रमुख निम्न हैं
अविद्या यानी ignorance of reality at all levels ,lack of understanding wrong decisions
अस्मिता यानी notion about I, notions of others about me. There may be diff in two notions.we hv to drop our notion about I. Identity.
राग यानी attachments , intense likes
द्वेष यानी strong dislikes
अभिनिवेश यानी attachment to life
इन बाधाओं को पार पाए बिना व्यक्ति ईश्वर में अपनी पहचान को विलीन नहीं कर पाता है।
सगुण उपासना में भी बाधाएँ हैं किंतु उसमें एक सरलता भी है। ईश्वर की एक रूप में उपासना की जाती है और व्यक्ति अपने शरीर की पहचान से मुक्त हुए बिना भी ईश्वरीय रूप से तादाम्य स्थापित कर लेता है। निर्गुण उपासना में यह रास्ता थोड़ा अधिक मुश्किल होता है।
सगुण और निर्गुण उपासना के महत्व को समझाते हुए श्रीकृष्ण ये स्पष्ट कर चुके हैं कि हालांकि दोनों ही उपासना विधि में अंतिम रूप से ईश्वर ही प्राप्त होते है,किन्तु निर्गुण उपासना के बनिस्पत सगुण उपासना विधि ज्यादा सरल है।
अब ये समझने की जरूरत है कि श्रीकृष्ण जिस सगुण उपासना की बात कर रहें हैं वो है क्या। बहुधा सगुण उपासना का अर्थ लोग ये लगाते हैं कि भगवान की तस्वीर या मूर्ति लगा ली और उसके सामने बैठकर भजन पूजन करने लगे, जो सगुण उपासना है। इस भ्रम को श्रीकृष्ण यंहा तोड़ देते हैं।
ईश्वर के सगुण रूप का तातपर्य कई बार श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं।ईश्वर का कोई सगुण स्वरूप किसी अन्य लोक में नहीं बैठा हुआ है जिसकी हमें पूजा अर्चना करनी है। वास्तविकता है कि सृष्टि के हर स्वरूप में ही ईश्वर विद्यमान हैं, वो चाहे सजीव हो या निर्जीव, वो चाहे धरती पर हो, धरती के नीचे हो या अंतरिक्ष में हो, वो चाहे मूर्त में हो या अमूर्त में,वो चाहे दृश्य हो या अदृश्य हो। सभी में ईश्वर की उपस्थिति ही उन्हें उनका अस्तित्व प्रदान करती है। उन सभी के होने का कारण ईश्वर ही हैं। खुद हम भी ईश्वरीय विभूति के ही परिणाम हैं। इस प्रकार हमारा सीधा सम्बन्ध ईश्वर से तो है ही, साथ ही हम सृष्टि में अन्य सभी से सार्वभौमिक ईश्वरीय उपस्थिति से भी जुड़े हुए हैं। हम सभी एक ही ईश्वर की उतपत्ति हैं। इस कारण सृष्टि में सभी की पहचान के मूल में ईश्वर ही है। अतः हमें स्वयम को ईश्वर से जुड़ा हुआ, अन्य सभी, और वो सभी भी ईश्वरीय विभूति की ही देन हैं से जुड़ा हुआ समझना चाहिए यानी हम सभी की एक ही पहचान है जो परम् पिता परमेश्वर से मिलती है। इस प्रकार व्यक्ति को अपने शरीर, इंद्रियों, मन, बुद्धि और विवेक को बिना तिरोहित किये इन सभी से किये जाने वाले सभी कर्मों को ईश्वर के लिए किया जाने वाला कर्म समझ कर करना चाहिए और अपने इन सभी कर्मों का परम लक्ष्य ईश्वर को ही समझना चाहिए।
इस प्रकार सगुण उपासना में सभी स्वरूपों को ईश्वरीय विभूति समझकर उनके प्रति समर्पित होकर उनके लिए अपने कर्मों को करना ही सगुण उपासना है।
ईश्वर को इसप्रकार लक्ष्य मानकर ईश्वर के प्रति समर्पित होकर जो अपने कर्म करते हैं वे अपनी उपासना में अपने अस्तित्व को ईश्वर में विलीन कर देते हैं। ऐसे व्यक्ति ईश्वर के प्रति एकाग्र होते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति को अपने जीवन में ही ईश्वरीय विभूति प्राप्त हो जाती है। उसे जीवन के सत्य का ज्ञान हो जाता है और इस प्रकार ऐसा सगुण उपासक जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह व्यक्ति ईश्वर का विषेध प्यारा होता है सो ईश्वरीय आ अनुकम्पा भी उसपर बनी रहती है।
ईश्वरीय उपासना की विधि क्या हो, इसे समझना भी आवश्यक है। व्यक्ति के लिए सरोत्तम मार्ग है कि वह अपने मन, इन्द्रिय, बुद्धि और चित्त से ईश्वर का निरंतर स्मरण करे। ईश्वर का स्मरण करने का तरीका भिन्न हो सकता है , कोई नाम जपकर करे, कोई पूजा कर के करे लेकिन जिस विधि से व्यक्ति ईश्वर का ध्यान करता है उसकी इन्द्रियाँ उसे ग्रहण कर उसे स्पंदित करती हैं। अब भला कोई निरन्तर ईश्वर के नाम का जप कैसे करे या पूजा पाठ कैसे करे। इसका सबसे उत्तम मार्ग है कि व्यक्ति को ईश्वरीय ध्यान की आदत अपने कर्मों में ढाल लेनी चाहिए। उसे चाहिये कि वह इस समझ को अपने अंदर गहरे बैठा ले कि उसका जो भी कर्म है वह उसे ईश्वरीय निर्देश पर कर रहा है और उसके सभी कर्मों के एक मात्र उद्देश्य ईश्वर ही हैं। जब व्यक्ति इस प्रकार ईश्वरीय ध्यान के साथ अपने समस्त कर्मों को करता है तो ईश्वर का निरन्तर चिंतन मनन उंसके मन , चित्त और बुद्धि में होता ही इन होता है। जब व्यक्ति इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो स्वाभाविक रूप से व्यक्ति ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर का स्थाई वास उसमें हो जाता है।
कई बार व्यकि को पूर्व में बताए तरीके से ईश्वर में ध्यानमग्न होने में कठिनाई होती है । हम सभी व्यक्ति अपने सेल्फ यानी स्व के ऊपर अपने ईगो का आवरण ओढ़े हुए होते हैं जिसकी वजह से ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्मों को करने में बाधा आती है। इस ईगो रूपी बाधा से पार पाने के लिए आवश्यक है कि हम बारम्बार अभ्यास करें कि हम किस तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्म कर सकते हैं। शास्त्रों में जो तरीका अभ्यास के लिए बताए गये हैं उनमें भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ सम्मिलित हैं। यदि इतना भी आप नहीं कर सकते हैं तो आप हर बार अपने कर्मों को करने के पूर्व ठहर कर इस बात की जाँच कर लें कि आप जो भी करने जा रहें हैं क्या आप उसे ईश्वर को समर्पित कर सकते हैं। यह अभ्यास धीरे धीरे आपके ईगो को काटते काटते आपके सेल्फ को उजागर कर देता है और आप ईश्वर में समर्पित होकर कर्म करने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति पूर्व में बताए गए अभ्यास को भी नहीं कर पाए तो प्रश्न उठता है कि उसे ईश्वर की प्राप्ति कैसे हो पाएगी। यदि कोई व्यक्ति अभ्यास कर के भी ईश्वर के प्रति अपने कर्मों को समर्पित कर के अपने कर्मों को नहीं कर पाता है तो वैसे व्यक्ति के पास अन्य मार्ग है कि वह अपने कर्मों के समस्त परिणामों को ईश्वर को समर्पित कर दे।
इसका तात्पर्य क्या हुआ? दरअसल हम जो भी कर्म करते हैं उनका कोई न कोई परिणाम अवश्य होता है। ये परिणाम हमारे मनोकुल भी हो सकते हैं और प्रतिकूल भी। इन परिणामों पर हमारा कोई वश नहीं चलता है। यदि परिणाम मनोकुल होते हैं तो हमें उनसे राग होता है किंतु यदि परिणाम प्रतिकूल हुए तो हमारे अंदर द्वेष, क्रोध, निराशा , जैसे भाव उतपन्न होते हैं। दोनों ही स्थितियों में हम परिणामों से बन्ध जाते हैं। इसका परिणाम होता है कि हम राग-द्वेष के द्वंद्व में फंसकर ईश्वर से दूर हो जाते हैं।
ध्यान रहे कि प्रत्येक समय में उपस्थित वर्तमान भूत काल का भविष्य होता है और प्रत्येक वर्तमान भविष्य का भूत काल होता है। हम जो परिणाम वर्तमान में प्राप्त करते हैं उनके कारण स्वरूप कर्म हम भूत में किये होते हैं और वर्तमान मरीन किये जारहे कर्मों का फल भविष्य में मिलता है। और भूत और भविष्य दोनों ही हमारी पहुँच से बाहर होते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी भी कर्म का परिणाम हमारे अपने वश में नहीं होता है।
तो फिर हमारे वश में होता क्या है? हमारे वश में दो ही चीजें होती हैं। पहला यह कि हम अपने वर्तमान में ईश्वर को समर्पित होकर कर्म करें । और दूसरा यह कि भूत के जिन कर्मों का परिणाम हमें वर्तमान में मिल रहा है , चूँकि उन परिणामों पर हमारा कोई वश नहीं है हम उन परिणामों को यथारूप में सहर्ष स्वीकार करें।
तो क्या इसका तात्पर्य यह निकला कि हम परिणामों को यथारूप स्वीकार कर के यदि हमारी पराजय हुई हो तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जायें। श्रीकृष्ण ने ऐसी कोई शिक्षा कभी नहीं दी है। उनका मात्र इतना ही कहना है कि
1.जो परिणाम मिले उसे स्वीकार कर लें यानी उनसे न राग रखें , न ही द्वेष। यथारूप , यानी परिणाम जैसे हैं वैसे ही उनको देखें। न प्रसन्न हों, न दुखी हों। यही ईश्वर के प्रति परिणामों को समर्पित करना हुआ।
2.दूसरा यह कि वर्तमान में अपने कर्म नियत तरीके से करें, वे कर्म करें जिनको हम सहर्ष ईश्वर को समर्पित कर सकते हों। जैसे हो सकता है कि वर्तमान में किसी छात्र कोई परीक्षाफल खराब आया हो। अब वह छात्र उस परीक्षाफल को बदल तो नहीं सकता है क्योंकि वह फल तो उसे उसके अतीत के परीक्षा में उस समय उसके किये प्रयासों का नतीजा भर है। अतः उस छात्र को चाहिए कि उस परीक्षाफल से वह निराश न हो बल्कि उसे उसी रूप में स्वीकार करे और दूसरा यह चाहिए कि वह वर्तमान में अपने प्रयासों को और बल दे ताकि भविष्य में जो वर्तमान आने वाला है उसमें उसका परीक्षाफल और अच्छा हो। यदि वह इस वर्तमान में प्राप्त खराब परीक्षाफल से जुड़ा रहा तो उसे निराश होगी, निराशा से उसके वर्तमान के कर्म प्रभावित होंगे और भविष्य में उसे और वह अपने वर्तमान के कर्मों को समुचित ढंग से नहीं कर पायेगा। नतीजा यह होगा कि भविष्य वह भूत और भविष्य से जुड़ा रहा रहेगा और वर्तमान में अपने कर्म करने में विफल होगा।
सो ईश्वर की प्राप्ति का एक मार्ग यह भी है कि व्यक्ति परिणामों को उनके यथा रूप में स्वीकार कर उनको प्रसाद रूप में ग्रहण कर उनको ईश्वर के प्रति समर्पित कर जिये।
इस प्रकार ईश्वरीय प्राप्ति का मार्ग प्राप्त करने हेतु व्यक्ति को चाहिए कि वह निम्न तरह से अभ्यास करें।
1.व्यक्ति को न तो भूत में और न ही भविष्य में रहने की आदत होनी चाहिए। उसे इस लोभ से बाहर निकल जाना चाहिए।
2.वर्तमान में उसे जो भी परिणाम प्राप्त हों उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार करना चाहिए। यह स्वीकारोक्ति सम्पूर्ण होनी चाहिए और परिणामों के प्रति कोई पूर्वाग्रह, कोई मोह, लोभ, क्रोध, घृणा, वैमनस्य आदि नहीं होना चाहिए।
3. व्यक्ति को चाहिए कि वह निरंतर स्वयं को इष्ट में स्थिर रखे और अपने मन और शरीर से किये जाने वाले कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने के भाव से सम्पादित करना चाहिए। किये जा रहे कर्मों की उच्चता को बिना किसी मोह और मोह जनित भाव के किया जाना चाहिए।
4.अपने मन और बुद्धि को समस्त ओर से खींच कर ईश्वर में स्थिर करना चाहिए।
5.इस प्रकार हमेशा साम्य अवस्था में रहना चाहिए।
6. ये सभी क्रियाएँ, पढ़ सुनकर नहीं आ सकती हैं बल्कि इसके लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। दृढ़ निश्चय, और सम्पूर्ण समर्पण के साथ किया जाने वाला अभ्यास जो सायास न होकर स्वभवगत हो जाये उसी को भक्ति कहते हैं। यह प्रयास, यह अभ्यास, यह भाव, ईश्वर के प्रति इस तरह का समर्पण और मोह से इस प्रकार की मुक्ति व्यक्ति के हर कर्म में परिलक्षित होने लगे तो समझिए कि व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति हो चुकी है।
ईश्वर को प्राप्त करने के विभिन्न मार्गों को समझने के पश्चात यह आवश्यक है कि हम समझें कि इनमें से कौन सा मार्ग का क्या महत्व है। इस क्रम में हमें समझना चाहिए कि
1.अभ्यास का मार्ग उत्तम अवश्य है किंतु बिना ईश्वरीय आराधना को समझें अभ्यास करना कोई महत्व नहीं रखता क्योंकि यह अभ्यास हमें कँही नहीं ले जाता है। ऐसे अभ्यास से अंधविश्वास और निरर्थक कर्मकांडों का जन्म होता है। बिना समझ के किया गया अभ्यास हमें रूढ़िवादी बनाता है।
2.ऐसे अभ्यास से ज्ञान का महत्व अधिक है। ज्ञान से हम समझ पाते हैं कि हमारा लक्ष्य क्या है, हमारा स्व और हमारा ईगो क्या है। इस ज्ञान को प्राप्त करना बिना समझ के किये गए प्रयास से बेहतर है क्योंकि इसके बिना हम ईश्वरीय पथ पर आगे नहीं बढ़ पाते हैं। लेकिन मात्र ज्ञान प्राप्त कर लेने से ईश्वरीय विभूतियों की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
3.ज्ञान प्राप्ति का तभी महत्व है जब प्राप्त ज्ञान को हम स्वयं की अनुभूतियों के स्तर पर जी सकें। ये कैसे सम्भव हो पाता है ? इसे सम्भव बनाता है ध्यान। ज्ञान को अपनी अनुभूतियों के स्तर पर महसूस करने को ही ध्यान कहते हैं। मात्र आसन पर बैठकर आँखों को बंद कर लेने और किसी मूरत या शब्द का ध्यान करना ध्यान नहीं होता है क्योंकि इससे कुछ हासिल नहीं होता है। मन चंचल और उद्विग्न बना ही रह जाता है। किंतु जब हम प्राप्त ज्ञान को अपने ध्यान में अपनी अनुभूतियों के स्तर पर जीते हैं तो समझ में बात आती है कि इस ज्ञान को हम अपने व्यवहारिक जीवन में कैसे उतार कर ईश्वरीय पथ पर आगे बढ़ सकते हैं।
4.लेकिन इस ज्ञान की अनुभूति से ईश्वरीय मार्ग तब तक नहीं मिलता है जब तक हमारे ऊपर हमारा मोह हावी होता है, हम स्वयं और स्वयं के इर्द गिर्द से सम्बद्ध हुए रहते हैं। सो मोह में डूबा मन ध्यान के दौरान भी अपने लोभ लालच, लाभ हानि , हर्ष विषाद आदि में डूबा रहता है और ज्ञान निरर्थक होते जाता है।
ज्ञान और ध्यान का महत्व तभी हो पाता है जब हम मोह का और मोह जनित भावों का त्याग कर पाते हैं। मैं और मेरा की भावना से छुटकारा लिए बिना हमारा ध्यान ईश्वर पर केंद्रित नहीं हो सकता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वयं के अन्वेषण और ईश्वरीय प्राप्ति हेतु हमें निम्न तरह से कर्म करने होते हैं।
सर्वप्रथम स्वयं के ईगो को छोड़कर मैं और मेरा के भाव को त्यागना होता है, स्वयं के मोह और मोह जनित समस्त भावों जिनमें सबसे प्रमुख है कर्म के परिणाम से लगाव उसे त्यागना होता है। तत्पश्चात निष्काम भाव से ज्ञान की प्राप्ति और उसके अनुभूति हेतु ध्यान के मार्ग पर चलना होता है और ध्यान की इस प्रक्रिया का निरन्तर और नियमित अभ्यास करना होता है। इस तरह से किये गए कर्म से हम स्वयं का अन्वेषण करते करते ईश्वर को प्राप्त कर पाते हैं।
व्यक्ति ईश्वर की आराधना के मार्ग पर चलकर ईश्वर को प्राप्त करता है। इस प्रकार के ईश्वरीय भक्त के कुछ लक्षण होते हैं जो इस मार्ग पर चलकर प्राप्त होते हैं। ये लक्षण निम्न हैं--
1.उस व्यक्ति को किसी के प्रति द्वेष नहीं होता है। उसे किसी से राग और द्वेष नहीं होता है। उसे तो सभी के प्रति समदर्शी भाव होता है। इस गुण को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को मैं और मेरा जैसे ईगो के भाव से मुक्त होना आवश्यक होता है। मोह और माया से मुक्ति ही व्यक्ति को द्वेष से मुक्त करती है। इस व्यक्ति के मन में किसी के प्रति कोई मैल नहीं होता है, किसी के प्रति शत्रुता नहीं होती है, घृणा नहीं होती है।
2.इस व्यक्ति को कोई स्वार्थ नहीं होता है।
3.यह व्यक्ति सभी से प्रेम करता है। और सभी के प्रति करुणा होती है। जब व्यक्ति मोह, द्वेष, सम्बद्धता, स्वार्थ जैसे भावों से मुक्त होता है तो उस व्यक्ति के मन में सभी के प्रति प्रेम , करुणा और मित्रता का भाव होता है। यह व्यक्ति किसी के प्रति जजमेंटल हुए बिना सभी के प्रति प्रेम, करुणा और मित्रता रखता है।
4.इस व्यक्ति को बिना किसी स्वार्थ के सभी के प्रति दया का भाव होता है।
5.यह व्यक्ति मोह और मोह जनित ममता , अहंकार जैसे भावों से मुक्त होता है। ऐसा व्यक्ति अपने ईगो से मुक्त होता है। उसे मैं और मेरा का भाव नहीं होता है बल्कि उसे यह ज्ञात होता है कि सबकुछ ईश्वर का है, उसका कुछ नहीं है।
6 यह व्यक्ति सुख और दुख से अप्रभावित रहते हुए दोनों स्थिति में समान भाव से रहता है। यह व्यक्ति द्वंदात्मक युग्मों से अप्रभावित होता है क्योंकि उसके अंदर कोई ईगो, अहंकार , और अन्य मोह जनित भाव नहीं होते हैं।
7.यह व्यक्ति सबके प्रति , यँहा तक कि अपराधी के प्रति भी क्षमा का भाव रखता है। इस कारण से व्यक्ति के मन में कोई क्रोध, ईर्ष्या, लोभ ,जैसे भाव होते ही नहीं हैं।
8.ऐसे व्यक्ति को किसी भी चीज से असंतुष्टि नहीं होती है। यह व्यक्ति हर स्थिति और चीज से संतुष्ट होता है।
9.इस व्यक्ति का अपने इंद्रियों और मन और शरीर के प्रयासों-अभ्यासों पर पूर्ण नियंत्रण होता है। इस व्यक्ति का निश्चय अटूट होता है। उसे ईश्वर में अटूट विश्वास होता है। यह व्यक्ति योगी के गुणों वाला होता है।
10.इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि, उसका विवेक, उसका ध्यान सभी कुछ ईश्वर में लगा होता है।
सारे कर्मकांडों और भिन्न भिन्न धारणाओं से मुक्त ऐसा व्यक्ति ही ईश्वर को उनका प्रिय भक्त होता है। अर्थात जब व्यक्ति ईश्वरीय मार्ग पर चलता है, जब धर्म के रास्ते चलता है तो उस व्यक्ति को चाहिए कि वह इन विशेषताओं को ईश्वरीय साधना से प्राप्त करे ताकि ईश्वर का उस व्यक्ति से विशेष अनुराग हो। बिना इन गुणों के कोई व्यक्ति स्वयं को भक्त की श्रेणी में नहीं रख सकता है।
इन लक्षणों से स्पष्ट है कि तमाम तरह के कर्मकांडों को करने के बावजूद यदि व्यक्ति के अंदर उपरोक्त विशेषताएँ नहीं हैं, उसके व्यवहार में उक्त अभ्यास नहीं है वह ईश्वर का उपासक नहीं हो सकता है।
ईश्वरीय पथ पर अग्रसर व्यक्ति जो ईश्वर को अत्यंत प्रिय होता है उसके लक्षणों का वर्णन करते हुए आगे बताया गया है कि
11.जो व्यक्ति ईश्वर की भक्ति में लीन होता है वह किसी भी अन्य व्यक्ति को तो उद्वेगीत करता है और न ही किसी अन्य की वजह से स्वयं ही उद्वेगीत होता है। इस प्रकार इस व्यक्ति को अपने इंद्रियों और उनसे मिलने वाली सम्वेदनाओं पर अपना पूर्ण नियन्त्र होता है।
12.समान भाव में बने रहने वाले इस व्यक्ति को न तो किसी बात से हर्ष होता है न ही विषाद और न ही वह व्यक्ति किसी अन्य की उन्नति से ईर्ष्या करने वाला होता है।
13.चूँकि इस तरह के व्यक्ति का अपना कोई ईगो नहीं होता है और यह व्यक्ति ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होता है सो इस तरह के व्यक्ति को कभी किसी बात से कोई भय नहीं होता है ।
जो व्यक्ति ईश्वर की आराधना और उपासना में लीन हो उसे अपने ईगो से लगाव खत्म हो जाता है और जैसे जैसे ईगो का पर्दा हटता है व्यक्ति ईश्वर के समीप होते जाता है। इस तरह के व्यक्ति के अंदर से मोह और माया और उनसे निकलने वाले भाव स्वतः समाप्त होते जाते हैं। सो ईश्वरीय उपासना के लिए आवश्यक है कि हम अभ्यास पूर्वक लगकर अपने अंदर उन दैवी गुणों को विकसित करें जो हमारे अंदर से हमारे अहंकार को समाप्त कर सकें और अहम की समाप्ति के साथ ही हम ईश्वर का सामीप्य प्राप्त करते हैं।
एक ईश्वर के भक्त के अन्य लक्षणों को बताते हुए आगे कहा गया है कि
13.जो ईश्वरीय भक्ति में लीन है वह व्यक्ति मोह से मुक्त होता है और मोह से मुक्ति के कारण उस व्यक्ति को कोई आकांक्षा नहीं होती। आकांक्षा से मुक्त व्यक्ति किसी के लिए न तो सुखी होता है और न ही दुखी होता है। इस तरह से व्यक्ति सभी मोहपाश से मुक्त होता है।
14.यह व्यक्ति अंदर और बाहर से पवित्र होता है। इस स्थिति में व्यक्ति दैवी गुणों से परिपूर्ण होता है और उन्हीं दैवी गुणों के अनुरूप आचरण करने का अभ्यस्त भी होता है।
15.ईश्वरीय भक्ति में लीन व्यक्ति दक्ष होता है यानी वह वर्तमान में रहते हुए हर परिस्थिति पर उनके अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया देता है। उंसके मन में किसी के प्रति कोई पूर्वाग्रह का भाव नहीं होता है।
16.सभी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त भक्त किसी के प्रति न तो अनुराग रखता है और न विराग। उंसके मन में , आचरण में किसी के प्रति कोई पसक्ष्पात की भावना नहीं होती है।
17. चूँकि ईश्वरीय भक्ति में लीन व्यक्ति को कोई मोह नहीं होता है, उसे किसी से जुड़ाव या अलगाव नहीं होता है सो वह व्यक्ति सभी प्रकार के दुखों से मुक्त होता है। उसे न तो कोई चीज संतापित कर पाती है और न ही प्रसन्न ही।
इन गुणों से युक्त व्यक्ति ही ईश्वर की भक्ति कर पाता है।
18. माया और मोह से मुक्त भक्त कामनाओं से परे होता है। कामना रहित मन को न तो किसी विषय में हर्ष होता है, न ही विषाद , न ही उसे किसी से राग होता है न ही द्वेष, न ही उसे शोक होता है ।
19. कामनाओं से मुक्त व्यक्ति कर्म तो करता है किंतु कर्मफल में उसे कोई आसक्ति नहीं होती है। उंसके लिए हर तरह के कर्म फल चाहे वे अच्छे हों या बुरे वे सभी ईश्वर के प्रसाद हीं हैं सो कर्मफल के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति हर्ष विषाद, सुख दुख, राग द्वेष आदि से मुक्त मात्र ईश्वर में लगा होता है और वही ईश्वर का प्रिय भी होता है।
20 जो ईश्वर की भक्ति में लीन होता है उसकी नजर जीवों के स्वरूप पर नहीं बल्कि उनके दैवी अस्तित्व पर होता है और वह खूब समझता है कि जीव का रूप और स्वभाव जो भी हो सभी एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति होते हैं। ऐसी समझ से परिपूर्ण व्यक्ति के लिए ये मायने नहीं रखता है कि किसी का उंसके प्रति व्यवहार मित्रवत है या शत्रुवत। वह तो सभी के प्रति समान भाव ही रखता है, सब में दैवी उपस्थिति(divinity) समान रूप से देखता है।
21.ऐसे सम्भाव(equaniminity) में अवस्थित व्यक्ति के लिए मान और अपमान का कोई महत्व नहीं होता है। किसी के प्रति हमारा सम्मान या अपमान व्यक्त करना इसपर निर्भर करता है कि हम उस व्यक्ति का अपनी बुद्धि और विवेक से क्या आकलन करते हैं। लेकिन जो ईश्वरीय भक्ति में सम्भाव में है उंसके लिए हमारा बौद्धिक आकलन कोई महत्व नहीं रखता है और उसका मान करें कि अपमान वह तो हममें ईश्वर का रूप ही देखता है।
22 व्यक्ति को बराबर द्वंदान्तमक युग्मों से जुझना होता है, कभी दुख आते हैं, कभी सुख। कभी ताप महसूस होता है तो कभी शीतलता। ईश्वरीय आराधना में लीन व्यक्ति इन द्वंदात्मक युग्मों को देखता तो है लेकिन उनसे प्रभावित नहीं होता है। जब हमारा आचरण, जब हमारी equanimity यानी हमारी सम्भाव स्थिति बाहरी कारकों से निर्धारित हो तो स्पष्ट है कि हमें अपने divinity यानी अपने अंदर के दैवी स्वरूप पर भरोसा नहीं है। किंतु जो ईश्वरीय भक्ति में लीन है उंसके लिए द्वंद्व के बाहरी कारक उसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते और सुख दुख, हर्ष विषाद, ग्रीष्म शीत जैसे बाहरी कारको को देखते हुए भी उनके प्रति समान स्थिति में बना रहता है।
ईश्वर की भक्ति में लीन व्यक्ति के कुछ और लक्षणों की भी चर्चा की गई है। यथा
23.यह व्यक्ति अपनी बुराई और बड़ाई होने पर भी विचलित नही। होता है। सामान्य लोग सभी की बड़ाई और बुराई करते रहते हैं और जिसकी बड़ाई और बुराई की चर्चा होती है वह इस चर्चा से प्रभावित होकर विचलित भी होता है। किंतु ईश्वरीय विभूतियों में लीन व्यक्ति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई उसकी प्रसंसा कर रहा है या निंदा। यह व्यक्ति तो हर स्थिति में यम टिप्पणियों से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति में उनके शरण में होता है।
24. ऐसा व्यक्ति अपने जीवन पालन के लिए ऐसे प्रयास नहीं करता है जिससे उसके जीवन में बाहरी कारकों से ऐशो आराम मिल सके। यह व्यक्ति शारीरिक सुख और दुख को बिना महत्व दिए हर स्थिति में प्रसन्न ही रहता है। उसे अपने भौतिक सुविधाओं से न तो लगाव होता है न ही कोई मोह। जो है सो है, जो नहीं है सो नहीं है। इसी भाव से यह व्यक्ति स्थिर मन और बुद्धि में स्थित हुआ रहता है।
और तब अंत में श्रीकृष्ण ये कहते हैं कि वही व्यक्ति ईश्वर का भक्त होने के लायक होता है जो ऊपर बताए आचरण को करता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वरीय भक्ति का मूल व्यक्ति के आचरण में होता है न कि बाहरी आडम्बरों में जैसा कि कई लोग दावा करते हैं। साधन की शुचिता से ही साध्य की प्राप्ति होती है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः
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