श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 परिचय
श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 परिचय
अहम ब्रह्मास्मि।
मैं ब्रह्म हूँ।
लेकिन इस महा वाक्य तक व्यक्ति पहुँचता कैसे है? क्या मात्र इस वाक्य को दुहराते रहने से यह आत्मसात हो जाता है? नहीं। इस सत्य तक पहुंचाने के तीन क्रम हैं।
1.स्व यानी सेल्फ क्या है यानी मैं कौन हूँ?
2. ब्रह्म कौन है?
3.स्व और ब्रह्म एक कैसे हैं?
स्व यानी सेल्फ क्या है इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के प्रथम छह अध्यायों में यानी अध्याय एक से छह तक में है ।
ब्रह्म कौन है, इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के दूसरे छह अध्यायों यानी सातवें से बारहवें अध्याय तक में है।
स्व और ब्रह्म दोनों एक हैं , इसकी व्याख्या अंतिम छह अध्यायों यानी तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक में है।
स्व की प्राप्ति के मार्ग की परिणति छठे अध्याय में व्यक्त ध्यान की क्रिया से होती है तो ब्रह्म की समझ बारहवें अध्याय के भक्ति मार्ग से पूरी होती है।
और सब का ब्रह्म से संयोग अठारहवें अध्याय के त्याग से पूरी होती है।
सो हम अभी बारहवें अध्याय के मुहाने पर खड़े हैं जँहा से हम पराम पिता परमेश्वर को उनकी भक्ति से जानेंगे और यह भी देखेंगे कि वह व्यक्ति जो भक्त है अर्थात जिसे ज्ञात है कि ब्रह्म कौन है वह कौन है।
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