श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 8

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ ।।8।।

मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

ईश्वरीय उपासना की विधि क्या हो, इसे समझना भी आवश्यक है। व्यक्ति के लिए सरोत्तम मार्ग है कि वह अपने मन, इन्द्रिय, बुद्धि और चित्त से ईश्वर का निरंतर स्मरण करे। ईश्वर का स्मरण करने का तरीका भिन्न हो सकता है , कोई नाम जपकर करे, कोई पूजा कर के करे लेकिन जिस विधि से व्यक्ति ईश्वर का ध्यान करता है उसकी इन्द्रियाँ उसे ग्रहण कर उसे स्पंदित करती हैं। अब भला कोई निरन्तर ईश्वर के नाम का जप कैसे करे या पूजा पाठ कैसे करे। इसका सबसे उत्तम मार्ग है कि व्यक्ति को ईश्वरीय ध्यान की आदत अपने कर्मों में ढाल लेनी चाहिए। उसे चाहिये कि वह इस समझ को अपने अंदर गहरे बैठा ले कि उसका जो भी कर्म है वह उसे ईश्वरीय निर्देश पर कर रहा है और उसके सभी कर्मों के एक मात्र उद्देश्य ईश्वर ही हैं। जब व्यक्ति इस प्रकार  ईश्वरीय ध्यान के साथ अपने समस्त कर्मों को करता है तो ईश्वर का निरन्तर चिंतन मनन उंसके मन , चित्त और बुद्धि में होता ही इन होता है। जब व्यक्ति इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो स्वाभाविक रूप से व्यक्ति ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर का स्थाई वास उसमें हो जाता है।

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