श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 5
श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 5
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥ ।।5।।
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।
सगुण और निर्गुण दोनों तरह की उपासना का परिणाम ईश्वर की प्राप्ति ही है। किंतु निर्गुण उपासना का मार्ग थोड़ा कठिन है। दरअसल व्यक्ति अपने शरीर और शरीर से जुड़ी अपनी पहचान और आवश्यकताओं से आसानी से मुक्त नहीं हो पाता है। दूसरी तरफ ईश्वर की उपासना में व्यक्ति को अपनी फहचान को ईश्वर के साथ विलीन करना होता है। इन दोनों के बीच मनुष्य का सामंजन बैठाने में कठिनाई आती ही है। सांसारिक जीवन जीते हुए इस सामंजन को प्राप्त करने के मार्ग में कई तरह की बाधाएँ भी आती हैं जिनमें प्रमुख निम्न हैं
अविद्या यानी ignorance of reality at all levels ,lack of understanding wrong decisions
अस्मिता यानी notion about I, notions of others about me. There may be diff in two notions.we hv to drop our notion about I. Identity.
राग यानी attachments , intense likes
द्वेष यानी strong dislikes
अभिनिवेश यानी attachment to life
इन बाधाओं को पार पाए बिना व्यक्ति ईश्वर में अपनी पहचान को विलीन नहीं कर पाता है।
सगुण उपासना में भी बाधाएँ हैं किंतु उसमें एक सरलता भी है। ईश्वर की एक रूप में उपासना की जाती है और व्यक्ति अपने शरीर की पहचान से मुक्त हुए बिना भी ईश्वरीय रूप से तादाम्य स्थापित कर लेता है। निर्गुण उपासना में यह रास्ता थोड़ा अधिक मुश्किल होता है।
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