श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 3 एवम 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 3 एवम 4

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌॥ ।।3।।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥ ।।4।।

परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

किन्तु कुछ उपासक भगवान को उनके व्यक्त रूप में नहीं बल्कि अव्यक्त रूप में भजते हैं। ऐसे उपासक ईश्वर को किसी रूप विशेष में नहीं देखते हैं। उनके लिए ईश्वर  रूप विहीन, आकार विहीन होते हैं। वे प्रभु को भजने के लिए वे प्रभु के उन लक्षणों का ध्यान करते हैं जिनसे उनको प्रभु की समझ तो बनती ही है साथ साथ वे अपने अस्तित्व को भी अलग न मानकर उसी परम् पिता परमेश्वर का अंश मात्र मानते हैं और इस प्रकार वे स्वयं के ईगो और स्वयं की पहचान से मुक्त होकर ईश्वर को उनके महान लक्षणों से भजते हैं, जैसे ईश्वर मन और बुद्धि से समझने के परे होते हैं, वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त होते हैं, उनका स्वरूप शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं हो पाता है, वे सदा एक भाव में होते हैं, उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता है, न ही उनमें कोई क्षरण ही होता है, वे निराकार हैं, उनका कभी नाश नहीं होता है, बल्कि प्रभु ही सब के प्रारंभ और सब के अंत भी होते है और वे सदा सत, चित्त और आनंद स्वरूप  सभी में विराजमान होते हैं। ऐसे प्रभु के उपासक प्रभु को इन लक्षणों से पहचान कर उनको भजते हैं। ऐसे उपासक अपने इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त होकर प्रभु ध्यान में लगे होते हैं। वे उपासक सभी में मुझे ही देखते पाते हैं और सो सभी के कल्याणार्थ सभी के हितार्थ लगे होते हैं। ऐसे अव्यक्त प्रभु के उपासक भी प्रभु को ही प्राप्त होते हैं जैसे सगुण रूप के उपासक प्रभु को प्राप्त होते हैं।

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