श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 2
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ ।।2।।
श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि जो ईश्वर को उनके ठोस रूप में, उनके स्वरूप में उनके गुणों के रूप में पूजते हैं वे ईश्वर के विशेष प्रिय होते हैं। तो क्या इसका अर्थ ये निकालना चाहिए कि जो ईश्वर की मूर्ति गढ़कर , उसे मंदिरों में स्थापित कर पूजते भजते हैं वे ही श्रेष्ठ हैं? नहीं , कदापि नहीं। दरअसल ध्यान देना होगा कि श्रीकृष्ण कह क्या रहें हैं और अबतक क्या क्या कहें हैं। दरअसल ईश्वर अपने सगुन रूप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और प्रत्येक जीव में , प्रत्येक निर्जीव में ईश्वर व्याप्त है। ईश्वरीय विभूतियों का वर्णन करते हुए और ईश्वर के विश्वरूप का दर्शन कराते हुए श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही ईश्वरीय स्वरूप की अभिव्यक्ति मात्र है। ऐसी स्थिति में ईश्वर मूर्ति मात्र में नहीं बसता है, वह तो हर जगह उस जगह के स्वरूप में विद्यमान है। सम्पूर्ण जगत को ईश्वर का रूप मानकर उंसके प्रति श्रद्धा भाव रखना और उस रूप में ईश्वर को भजना ही ईश्वर के सगुण रूप को भजना है और ऐसे योगी ही ईश्वर के विशेष प्रियजन हैं।
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