श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 41 से 46

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 41 से 46

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥ ।।41।।
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌॥ ।।42।।
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ।।43।।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌॥ ।।44।।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ।।45।।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ।।46।।


आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव !' 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं- वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ। ।।41 एवं 42।।
आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।।43।।
अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं। ।।44।।
मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।।।45।।
मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइए। ।।46।।

ईश्वरीय विभूतियों से परिचित होने पर व्यक्ति के दृष्टिकोण में आमूल चूल परिवर्तन आ जाता है। उसे इस तथ्य की समझ हो जाती है कि ईश्वर चाहे जिस रूप में हैं वे सनातन हैं, और उनके होने मात्र से सारी दृश्य और अदृश्य सृष्टि की उत्पत्ति भी होती है और उन्हीं में वे विलीन भी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के अंदर ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा आ जाती है जिसके कारण वह परम पिता परमात्मा के प्रति नतमस्तक हो जाता है। साथ ही उसे ईश्वर को अबतक नहीं समझ पाने की ग्लानि भी होती है।  इस अवस्था में व्यक्ति एक तरफ ईश्वर के प्रति श्रद्धा भाव से विनीत हो उठता है तो दूसरी तरफ ईश्वर की असीम क्षमता , विशेषरूप से उनके काल होने की परम शक्ति से भयभीत भी हो जाता है क्योंकि तब व्यक्ति अपने ही मोह में उलझा रहता है। 
     एक तरफ श्रद्धा तो  दूसरी तरफ भय, इन परस्पर विरोधी भावों में रचा बसा मन तभी शांत हो पाता है जब व्यक्ति को ईश्वर के प्रति अनुराग हो जाता है।  
  अर्जुन भी इन्हीं मिश्रित भावों के अधीन होकर कहता  है कि
     "आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव !' 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं- वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ। ।
आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।
अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं। 
मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।
मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइए। "
       श्रद्धा से विश्वास और विश्वास से श्रद्धा का जन्म होता है जो व्यक्ति के मन में उस  शक्ति को भरता है जिसके बल पर वह बड़े से बड़े अवरोध को पार कर लेता है। ईश्वरीय विभूति से उसे भय भी होता है लेकिन यह भय तभी तक रहता है जब तक मन में मोह, लोभ और ईर्ष्या जैसे भाव बने रहते हैं। जैसे जैसे व्यक्ति इन भावों पर नियंत्रण करते जाता है उसकी श्रद्धा बढ़ती जाती है और अंततः वह व्यक्ति ईश्वरीय स्वरूप के उस रूप पर टिक जाता है जिसमें उसे अपने भरोसे का साकार स्वरूप दिखता है।
       

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