श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 38
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 38
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।। ।।38।।
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं। ।।38।।
ईश्वर के विराट रूप के दर्शन से अर्जुन को वो बातें समझ में आने लगी जो अबतक उसे समझाई जा रहीं थी लेकिन अपने पूर्वाग्रहों के कारण उसे समझ में नहीं आ पा रहीं थी। ईश्वर के अद्भुत तेज, और उनके उद्गम और काल के रूप को देख कर, उनके अंदर ही भूत, वर्तमान और भविष्य को देखकर अर्जुन को जो बातें समझ में आईं उनको उसने भगवान के समक्ष व्यक्त किया।
ईश्वर ही प्रारम्भ है अर्थात जो कुछ भी होने के पहले से हैं अर्थात पुराण हैं किंतु वे हमेशा ही हैं अर्थात सनातन हैं। वे आदि होकर भी नूतन हैं और भविष्य में भी जो होने वाला है वँहा भी हैं। क्योंकि ईश्वर काल से परे हैं। वे पुरुष हैं यानी ईश्वर ही हैं जो कण कण में व्याप्त हैं । ऐसा कुछ भी नहीं है जो बिना ईश्वरीय विभूति के है। कुछ भी इसी लिए है क्योंकि ईश्वर का वास उसमें है फिर चाहे वह व्यक्त हो या अव्यक्त। ईश्वर के कारण ही यह दृश्य और अदृश्य जगत है क्योंकि वही सब के आधार हैं। बिना ईश्वरीय विभूति के कुछ का भी कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में ईश्वर ही है जो स्वयम को जानते हैं और व्यक्तियों के लिए जानने योग्य एकमात्र वही हैं जिनकी समझ होने के लिए व्यक्ति को अपने अहम से बाहर आना होता है। उनको जाने और उनके साथ एकाकार हुए बिना अंतिम लक्ष्य किसी को नहीं मिलता है। यह यात्रा स्थूल से चेतना की तरफ की होती है। चेतना जागरूकता लाती है और व्यक्ति की यात्रा अपने स्थूल स्वरूप से उस सूक्ष्म रूप की तरफ होती है जँहा मात्र चेतन स्वरूप की ही अनुभूति है। जैसे जैसे व्यक्ति स्थूल से चेतना की तरफ बढ़ता है उंसके अंदर ईश्वरीय सामीप्य का बोध बढ़ते जाता है। और उसे अनुभव हो पाता है कि जो कुछ भी उंसके सामर्थ्य में है, जो कुछ उसके समक्ष व्यक्त अथवा अव्यक्त है वह सभी ईश्वरीय विभूति से पूर्ण है।
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