श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 28 .29 एवं 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 28 , 29 एवं 30

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ ।।28।।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ ।।29।।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ।।30।।


जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
     जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं। 
        आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।
 ।।28 , 29 एवं 30 ।।

     यह तो अर्जुन समझा ही कि सृष्टि के सभी जीव अपने अंत काल में ईश्वर में ही विलीन हो जाते हैं , साथ ही अर्जुन ने ये भी समझा कि जिसकी जैसी भावना होती है उसी मार्ग से होकर वह ईश्वर में विलीन होता है। जिनकी श्रद्धा ईश्वर के प्रति होती है और जो जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति का रखे हुए जीवन व्यतीत करते हैं वे ईश्वर से उसी तरह मिलते हैं जैसे नदियाँ वेग से समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व सहर्ष उनमें विलीन कर देती हैं । ऐसे लोग ईश्वर को सहर्ष वरण करने हेतु व्यग्र होते हैं।
      दूसरी तरफ वैसे लोग होते हैं जो जीवन भर लोभ, लालच, ईर्ष्या, अनाचार आदि से प्राप्त संपत्ति को ही अपने जीवन का उद्देश्य बनाये रखते हैं वे ईश्वर को प्राप्त तो होते हैं किंतु वे भय से ग्रस्त होकर ईश्वर में विलीन होते हैं।
    दरअसल श्रीकृष्ण ने मृत्यु को वरण करने का मार्ग बतलाया है। मृत्यु अवश्यम्भावी है किंतु व्यक्ति किस भाव से जीवन जीता है इसपर उंसके मृत्यु का मार्ग यानी ईश्वर से मिलने का मार्ग निर्धारित होता है।
      प्रभु के तेज में ताप है और उस ताप से  सम्पूर्ण संसार भी तपता है।
        इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर के विराट स्वरूप में सृजन के साथ साथ विनाश का भी वास है जो यह दर्शाता है कि सब कुछ ईश्वर से निकल कर फिर उन्हीं में समाहित भी हो जाता है। यह गति निरन्तर चलती रहती है। 

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