श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 23, 24, 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 23, 24 25

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌॥ ।।23।।

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌।
दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ ।।24।।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ।।25।।


हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। ।।23।।
क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ। ।।24।।
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों। ।।25।।

      ईश्वर के विराट रूप का दर्शन ईश्वर की विभूतियों से तो अवगत कराता ही है, साथ ही यह भी समझाता है कि सबकुछ का उद्गम परम् पिता परमेश्वर है और सबकुछ पुनः उसी में विलीन हो जाता है। सम्पूर्ण संसार उसी एक ईश्वर की अभिव्यक्ति है और विराट रूप में  जब एक साथ सम्पूर्ण संसार दिखता है तो मन में भय उतपन्न होता है क्योंकि तब ईश्वर के विराट स्वरूप में भिन्न भिन्न शक्तियाँ एक साथ प्रदर्शित होती हैं। इसीलिए अर्जुन का कथन है कि हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। 
क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ। 
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ।  और ऐसी स्थिति में व्यक्ति की यही इक्षा होती है कि सब कुछ पहले की तरह व्यवस्थित और सामान्य रूप में आ जाये। 

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