श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 (श्लोकरहित)
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 (श्लोकरहित)
परिचय
अब तक हमने जो कुछ सुना और जाना वह हमारी दृष्टि को आध्यात्मिक विस्तार प्रदान करता है। व्यक्ति अपनी आँखोँ से चीजों को तो देखता ही है किंतु उसकी दृष्टि में दृष्टिकोण भी उसे देखने समझने में मदद करता है । इसीलिए भिन्न भिन्न व्यक्ति एक ही वस्तु को अपनी अपनी आँखों से देखते हुए भी उस वस्तु को भिन्न भिन्न रूप से समझते हैं। यह दृष्टिकोण में फर्क के कारण होता है।
व्यक्तियों का दृष्टिकोण उनके विवेक और ज्ञान पर निर्भर करता है। जिसकी जैसी समझ होती है, जैसा विवेक होता है उसी के अनुरूप वह चीजों को देख समझ पाता है। परमात्मा के स्वरूप को हमने अभी जाना है किंतु उसकी समझ के लिए यह आवश्यक है कि हमारी दृष्टि संकुचित न हो। बल्कि दृष्टि के साथ ही वह दृष्टिकोण भी हो जिससे हम परमात्मा से सम्बंधित इस ज्ञान को आत्मसात कर सकें। इसके लिए जो दृष्टि चाहिए उसे दिव्य दृष्टि कहते हैं , एक ऐसी ज्ञानमयी दृष्टि जो हमें सक्षम बनाती है कि हम जो देखते हैं उसे मात्र ऊपरी तौर पर ही नहीं समझें बल्कि उसके भीतर के रहस्यों को भी देख समझ सकें। श्रीमद्भागवद्गीता के ग्याहरवें अध्याय में हम इसी दिव्य दृष्टि को श्रीकृष्ण के विश्वरूप से देखते और समझते हैं।
एकादश अध्याय का भावार्थ
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के भ्रम को मिटाने के लिए आत्मा, धर्म, कर्म, योग, यज्ञ, भक्ति और समर्पण के रहस्य को समझाया है। क्या करें , क्या न करें जब ऐसी विमूढ़ता आ जाती है तब आवश्यक होता है कि हम इन बातों के मर्म को समझें। ज्ञान के बिना कर्म साधना में भ्रम होता ही है सो श्रीकृष्ण ने परमात्मा के स्वरूप को अर्जुन के समक्ष स्पष्ट किया है । स्वयं को समझे बिना स्वयं के कर्म को निर्धारित नहीं किया जा सकता है। लेकिन जब स्वयं का यह रहस्य पता चलता है कि हम और कुछ नहीं परमात्मा के ही स्वरूप हैं तो भ्रम दूर होता है। यही अर्जुन के साथ हुआ है। जब उसे लगा कि वह और उसके कर्म और कर्मों के सभी भेद परमात्मा के ही स्वरूप हैं तब उसे लगता है कि उसे जो भ्रम है वह दूर हुआ। इस ज्ञान से उसे ज्ञात होता है कि संसार सहित सभी की उत्पत्ति और नाश ईश्वर के स्वरूप के अधीन है और जो कुछ इस संसार में उसी का स्वरूप मात्र है तब उसका भ्रम दूर होता है।श्रीमद्भागवद्गीता के अबतक के अध्ययन से हम समझते हैं कि ईश्वर की प्रकृति और विभूति क्या है और कैसे सम्पूर्ण संसार, दृश्य और अदृश्य उसकी प्रकृति और विभूतियों का अंशमात्र प्रदर्शन भर है।
परमात्मा की विभूतोयों को समझकर कसी के अंदर भी उस परम शक्तिमान प्रभु के दर्शन की इक्षा हो सकती है ताकि वह उसे देख तो सके जिसके सम्बन्ध में उसे इतना वैभवशाली जानने समझने को मिला है। किंतू जिसे प्राप्त ज्ञान पर श्रद्धा होती है उसे खुद पर अहम भी नहीं होता है और ज्ञान और गुरु के प्रति समर्पण भी होता है। इसी कारण इक्षा होने पर भी व्यक्ति प्रार्थना भाव ही रखता है और यही भाव अर्जुन को भी था सो वह विनयपूर्वक कहता है कि यदि सम्भव लगे तो यानी यदि उसकी पात्रता हो तो प्रभु का दर्शन वह कर सके। निश्चित ही ज्ञान प्राप्त होना और स्वयम उस ज्ञान का साक्षात अनुभव करना दो बातें होती हैं। जिसे ज्ञान प्राप्त होता वह ज्ञान के पुंज के समक्ष विनीत ही होता है। क्योंकि ज्ञान व्यक्ति के अंदर जो लौ प्रज्वलित करता है उसकी रौशनी में उसे यह दिखता है कि उसे तो अभी और चलना है।
अर्जुन के आग्रह को परमात्मा के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। अर्जुन को जब आत्म ज्ञान प्राप्त होता है तो उसे परमात्मा से सामीप्य का बोध होता है। ऐसी स्थिति में उसे परमात्मा के सर्वविभूति सम्पन्न स्वरूप को देखने की लालसा होती है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। जब व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है तो स्वाविक रूप से वह उस ज्ञान के व्यापक स्वरूप को साकार देखना भी चाहता है। किंतु इस साक्षात दर्शन के लिए ज्ञान का होना ही एकमात्र शर्त नहीं है बल्कि ज्ञान और ज्ञानदाता के प्रति अटूट और निःशंक श्रद्धा का होना भी अनिवार्य है। अर्जुन में ये विशेषताएँ थीं और इसी कारण से श्रीकृष्ण ने उसके आग्रह को स्वीकार भी किया। ईश्वर का यह स्वरूप जिससे सांसारिक जीव उनकी विभूतियों का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हों विराट है, इस स्वरूप में कई स्वरूप, आकृति और रंग हैं जिनके होने का सिर्फ इतना ही औचित्य है कि उन दृश्य स्वरूप को देख कर मानव मात्र ईश्वर की विभूतियों को अपनी समझ के अनुरूप समझ सके। दरअसल ईश्वर का यह स्वरूप भावात्मक ज्ञान का दृष्यकरण मात्र है नहीं तो परमात्मा को भौतिक रूप में बाँधना भला कँहा सम्भव है।
प्राप्त आत्मिक ज्ञान के साक्षात स्वरूप का दर्शन अर्जुन को हो सके इस आग्रह पर सहमति मिल जाने के बाद अर्जुन को श्रीकृष्ण ये भी समझाते हैं कि वह इस ज्ञान से क्या क्या देख सकते हैं। कुछेक को बताने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को ये भी समझाते हैं कि जब व्यक्ति को स्वयम की समझ इस ज्ञान के द्वारा होती है तो फिर वह सम्पूर्ण संसार के गूढ़तम रहस्य को देख सकता है। यह सब ज्ञान की प्राप्ति और उसमें श्रद्धा से सम्भव है कि व्यक्ति इस ज्ञान और श्रद्धा के बल पर सभी दृश्य और अदृश्य सत्य का साक्षात दर्शन कर पाता है और समझ पाता है कि चेतना के भिन्न भिन्न स्तर हैं जिनके अनुसार वह चीजों को देखता और समझता है।
ईश्वर के विश्वरूप को देखने के लिए विशेष दिव्य दृष्टि की जरूरत होती है। हम जो कुछ भी देखते हैं और समझते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कैसे किसी चीज को देखते हैं। हम सभी के पास एक ही तरह की आँखें होती हैं लेकिन हमारे देखने की विशेषता अलग अलग होती है। तो क्या हमारे देखने की क्षमता हमारे ज्ञान पर निर्भर करता है ? कुछ हद तक तो ये सत्य है लेकिन ये भी सत्य पूर्ण नहीं है। अपने ज्ञान और भक्ति के बल पर हम जो देखने की क्षमता को पाते हैं तो वह भी सीमित ही होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। समुंदर की हर लहर समुंदर का ही अंश है। उसी प्रकार व्यक्ति भी ईश्वर का ही अंश है सो ईश्वर का ही रूप है। इस ज्ञान से व्यक्ति ये तो समझता है कि "अहम ब्रह्मास्मि" किन्तु इस समझ से वह ब्रह्म को देख ही लेता है यह जरूरी नहीं है। तब ईश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप को देखने का क्या रहस्य है, इसे समझने के लिए हमें परम् सत्य ईश्वर पर पूरी तरह से निर्भर होना अनिवार्य है। यह अवस्था कर्म, ज्ञान और भक्ति के बाद की है जिसमें पूर्ण समर्पण ही एकमात्र मार्ग है जिसके उपरांत ईश्वर ही हमें वो दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे हम ईश्वर के विराट रूप को देख सकते हैं। यही दिव्य दृष्टि है जो हमें ईश्वर के विराट रूप को यानी उस रूप को देखने में सहायक होता है जो हमारे इस ज्ञान को पूरा करता है कि ईश्वर सबमें है और सब ईश्वर में है ।
अब संजय भगवान के उस विराट रूप का वर्णन राजा धृतराष्ट्र को करते हैं जो भगवान ने अर्जुन को दिखलाया। यह विराट रूप ईश्वर का है जो योगेश्वर हैं यानी समस्त योगों के ईश्वर हैं। समस्त योगों के स्वामी योगेश्वर यानी जिनमें संसार समस्त रूप में समाहित हो जाता है। ये भगवान ही हरि स्वरूप हैं यानी भ्रम का हरण करने वाले हैं। यानी ईश्वर ने वो दिव्य और अलौकिक रूप का दर्शन दिया जिसमें सम्पूर्ण संसार समाहित है और जिसे जानकर समस्त भ्रम का नाश हो जाता है। यह स्वरूप परम् ऐश्वर्य रूप है यानी इस विराट रूप में ईश्वर की विभूतोयों का संगम है। यह रूप देख जानकर व्यक्ति के समस्त पापों यानी उसके समस्त भ्रम का नाश हो जाता है।
ईश्वर के विराट रूप का वर्णन सम्भव नहीं है फिर भी मानव स्वभाव ही ऐसा है कि यह भव्यता के वर्णन का प्रयास करता ही है। हम जो देखते हैं उसका वर्णन कभी भी हु ब हु नहीं कर पाते हैं बल्कि अपनी बुद्धि के अनुसार उसका वर्णन करते हैं। इसी कारण संजय जो देख रहा है उसे गीताकार की समझ के अनुसार व्यक्त करने का प्रयास करता है। इस विवरण के अनुसार संजय जो देखता है और देखकर जो समझता है उसके अनुसार परमेश्वर का विराट स्वरूप अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का सारे शरीर में लेप किए हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किए हुए है।
यह वर्णन समझाता है कि ईश्वर के इस विराट विश्वरूप में समस्त जीवों का वास है और ईश्वरीय दृष्टि सभी पर है। सभी जीव ईश्वर में व्यक्त हो रहें हैं। साथ ही सभी दिव्य विभूतियाँ भी अपनी अभिव्यक्ति को ईश्वर के प्रति समर्पित होकर व्यक्त होती रहती हैं। सो एक ईश्वर में अनेकों यानी समस्त जीव और दिव्य शक्तियाँ अभिव्यक्त होते रहती हैं।
जब हम किसी वैभव का वर्णन करते हैं तो हमारी भाषा हमारे इर्द गिर्द से उदाहरण उठाती है। भाषा की अपनी सीमाएँ होती हैं जो दृश्य उदाहरणों से अदृश्य और भावनात्मक तथ्यों का वर्णन करती है। संजय की भी यही सीमाएँ हैं। सो परमात्मा के विश्वरूप का वर्णन करते हुए उन दृश्य उदाहरणों को लेता है जो उसके अनुसार बहुत भव्य हैं। परमात्मा के वैभव का प्रकाश अतुलनीय है, सो संजय के अनुसार सहस्त्रों सूर्यों का प्रकाश भी एकसाथ मिलकर ईश्वरीय वैभव की बराबरी नहीं कर सकता। संजय ने इसी वजह से ईश्वरीय विभूति के वर्णन हेतु सूर्य की उपमा का उपयोग किया है और कहा है कि आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो। संजय बता रहे हैं कि अर्जुन ने वभवयुक परमात्मा के शरीर में क्या देखा। संजय के वर्णन के अनुसार
पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।
इसका क्या तातपर्य है? उस विश्वरूप में अर्जुन जो देख रहा था क्या वह कोई चमत्कार था? नहीं, अर्जुन तो दिव्यता का दर्शन कर रहा था। दरअसल कण कण में दिव्यता व्याप्त है। इस संसार(संसार का अर्थ यह धरती मात्र नहीं बल्कि समस्त ब्रह्मांड यानी कॉस्मॉस है) में हर दृश्य और अदृश्य , चाहे वह जिस रूप, रंग, आकार का है अपने आप में पूर्ण दिव्यता को धारण किये हुए है। कण कण में ईश्वर व्याप्त हैं न कि ईश्वर कण कण हो कर भागों में विभक्त होकर अलग अलग व्याप्त हैं। हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण ईश्वरीय गुणों की अभिव्यक्ति है और विश्वरूप में, विराट रूप में जब हम ईश्वर की अनुभूति करते हैं तो हर रचना में ईश्वर अपनी सम्पूर्णता में दिखाई देते हैं। भिन्न भिन्न रूप, रंग और आकार कुछ और नहीं एक ही ईश्वर के दिखने के भिन्न भिन्न दृष्टिकोण मात्र हैं। अगर ईश्वर के प्रति हमें श्रद्धा है, तो हमें इस ब्रह्मांड में जो भी है वह ईश्वर का ही दर्शन कराता है, कुछ भी अलग अलग नहीं है। इसी कारण से एक ही शरीर में हमें समस्त कॉस्मॉस का दर्शन होते रहता है। यदि हमें ईश्वर के विराट स्वरूप का ज्ञान है तो फिर कँही कोई भेद नहीं है। जो भी है वह सब एक परम पिता परमेश्वर का ही रूप है और एक ईश्वर ही सभी के उद्गम हैं, सो अर्जुन को एक ईश्वर में ही समस्त ब्रह्मांड के सभी अवयवों के दर्शन हुए।
स्मरण हो कि प्रत्येक व्यक्ति , प्रत्येक जीव की उपस्थिति उंसके भौतिक, मानसिक और चेतना के स्तर पर भिन्न तो दिखती है लेकिन चूँकि वे सभी जीव एक ही उद्गम से निकलते हैं सो एक उद्गम में ही उन सभी का अस्तित्व निहित होता है। एक परमात्मा में ही हमें समस्त ब्रह्मांड के सभी रूपों और अवयवों का दर्शन होता है।
परमपिता परमेश्वर के इस दिव्य विश्वरुप के दर्शन से यानी उनके ज्ञान से व्यक्ति आश्चर्यमिश्रित सुख से भर जाता है। जब हमें ईश्वर के इस विराट स्वरूप का अपने दिव्य चक्षुओं से दर्शन होता है यानी जब हमें ईश्वर की इस असीम महानता और सीमा विहीन विशालता का अनुभव होता है तब हमारी भावनाएँ, हमारे इन्द्रीयों की समस्त चेतना हमारे रोम रोम में आश्चर्य और प्रसन्नता का संचार कर देती हैं। तब ईश्वर की इस दिव्य महानता के प्रति श्रद्धा जागृत हो जाती है और तब हम बिना किसी प्रयास के ही उनके इस महानता, उनके इस विशालता, उनके इस दिव्यता के समक्ष श्रद्धा भाव से झुक जाते हैं और प्रणाम कर अपनी श्रद्धा, अपना समर्पण व्यक्त करते हैं।
यही हाल अर्जुन का भी हुआ जब श्रीकृष्ण ने उसे ईश्वर के इस दिव्य विराट स्वरूप को दिखाया जिससे उसे वो बातें प्रत्यक्ष दिखने लगीं जिसे श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्म अर्जुन को प्रारम्भ से समझाते आ रहें हैं और तब आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले।
क्या बोले यह हम आगे देखते हैं।
सब कुछ ईश्वर में ही निहित है। इस सत्य को अर्जुन अपनी आँखों से देख पा रहा है। दरअसल ईश्वर के विराट विश्वरूप को देखने समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो सामान्य समझ से नहीं मिलती है। इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए ज्ञान और दृढ़प्रतिज्ञ के अतिरिक्त ईश्वर के प्रति कर्मयोग के रास्ते प्राप्त ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा होनी चाहिए अन्यथा मात्र अध्ययन या श्रवण से इस विराट रूप का दर्शन असम्भव होता है। लेकिन इस प्रकार की श्रद्धा होने पर ईश्वर की भी विशेष अनुकम्पा उस व्यक्ति पर होती है और तब व्यक्ति ईश्वर के उस रूप को समझ पाता है जिससे उसे प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि समस्त जीव, देवी-देवता, महान विभूति यानी ऋषि, ब्रह्मा, विष्णु और महेश सभी एक ही परमात्मा में निहित है यानी समस्त जीवन और जीवन के गुणों का निवास तो प्रभु में ही है। अर्थात सभी कुछ जो हमारी दृष्टि में है और दृष्टि से परे भी है उन सभी के उद्गम और स्थान ईश्वर में ही है यानी ईश्वर से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए अर्जुन कहता है कि हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। ईश्वर ही समस्त जीवन , गुण, सत्य के उद्गम हैं, ईश्वर ही इनके निवास हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भेद करने की हमारी प्रवृत्ति त्रुटिपूर्ण है।
ईश्वर में ही समस्त प्राणी निहित हैं सो अर्जुन को ईश्वर के भौतिक स्वरूप में नहीं गिने जाने की संख्या में हाथ, पैर, मुख, पेट, आदि दिखते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सभी प्राणियों का उद्गम , समस्त ब्रह्मांडों का उद्गम एक ईश्वर है।
ईश्वर के इस विराट स्वरूप की विराटता इतनी भव्य है कि समस्त ब्रह्मांडों का सकल योग भी उनकी उपस्थिति का एक छोटा अंश मात्र है जिससे व्यक्ति को ईश्वर का प्रारम्भ, मध्य और अंत नहीं मिलता है यानी व्यक्ति अपने सीमित विवेक के कारण ईश्वर के अस्तित्व को समझने में अक्षम होता है।
हम अपने भाव और अपनी भाषा की समझ के अनुसार ही किसी चीज का वर्णन शब्दों में कर पाते हैं, सो एक ही दृश्य का एक ही समय भिन्न भिन्न लोगों के द्वारा भिन्न भिन्न तरीके से वर्णन मिलता है। अर्जुन के समक्ष भगवान विराट विश्वरूप में हैं और अर्जुन भगवान के उस स्वरूप से विस्मित है। उसकी समझ और उसकी भाषा में ईश्वर के इस स्वरूप का वर्णन करने की क्षमता ही नहीं है, किन्तु ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा वश वह जो जो देख रहा है उसका वर्णन करने की कोशिश अवश्य कर रहा है। उसे प्रभु मुकुट, गदा, चक्र के साथ दिखते हैं। यह स्वरूप राजा का है । प्रभु तो प्रभु हैं सो समस्त राजाओं के भी राजा हैं। तो उनको राजा स्वरूप में देखना भी अति स्वाभाविक ही है। ईश्वर की दीप्ति से अर्जुन अभिभूत है सो उनके तेज को अग्नि और सूर्य के तेज से भी अधिक बता रहा है। दरअसल उसे प्रभु के तेज और दीप्ति को बताने के लिए कोई शब्द नहीं सूझ रहें हैं सो वह अग्नि और सूर्य की उपमा देता है। दरअसल ईश्वर अपने विराट स्वरूप में जिस रूप में हैं वह उनकी प्रभुता, उनके ऐश्वर्य, उनकी शक्ति और तेज को व्यक्त करता है और अर्जुन उस रूप को प्रत्यक्ष देख कर यही बताने की कोशिश भी कर रहा है। तभी तो अर्जुन कहता है कि हे प्रभु मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ।
विराट स्वरूप को देखकर अर्जुन को विश्वास हो जाता है कि जिनसे वह बात कर रहा है वह और कोई और नहीं बल्कि वे ही अविनाशी परमात्मा हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह उस विराट स्वरूप को क्षरण रहित पाता है और उसी स्वरूप में समस्त भूत, वर्तमान और भविष्य का वास है,समस्त लोक उसी में निहित हैं, और समस्त धर्म की रक्षा करने वाले हैं। इसी कारण उस विराट स्वरूप को अर्जुन परम् ब्रह्म मानता है जो एकमात्र प्राप्त करने योग्य है और जिसकी प्राप्ति साधना से ही सम्भव है। यही ब्रह्म निरन्तर सनातन है जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है बल्कि जो समस्त परिवर्तनों को कारक है।
परमात्मा के विश्वरूप का दर्शन पाकर अर्जुन अपनी समृद्ध भाषा से उस रूप का वर्णन करना तो चाहता है किंतु कुछ चीजें अनुभूति में ही रह जाती हैं , भाषा उनकी अभिव्यक्ति नहीं कर पाती। इसी वजह से अर्जुन परमेश्वर के विराट स्वरूप का प्रारम्भ, मध्य और अंत नहीं पाता है। जिसका न आदि हो , न अंत हो , न मध्य हो, जो काल से परे हो उसको अपनी दृष्टि से देख कर समझ पाना सम्भव नहीं है बल्कि उसकी अनुभूति ही उसका ज्ञान दे सकती है। इसी लिए अर्जुन परमेश्वर के विश्व रूप को देखकर कहता है कि आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँ। परमात्मा का सामर्थ्य, उसकी क्षमता असीम है , उसे शब्दों में व्यक्त करना सम्भव नहीं है। उनकी अनंत भुजाएँ, मुख, नेत्र आदि यह समजाते हैं कि समस्त जीव उनमें ही निहित हैं, उनका उद्गम और अंत परमात्मा में ही है सो विश्वरूप इसी को प्रतीकात्मक ढंग से समझाता है। सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य ब्रह्मांड इसी एक परमेश्वर के तेज का अत्यंत छोटा अंश भर है। ईश्वर का तेज ही अनेकों ब्रह्मांड को उनकी ऊर्जा प्रदान करता है।
सम्पूर्ण संसार ही नहीं बल्कि सभी समस्त ब्रह्मांड ईश्वर का अंश मात्र हैं, यह तथ्य ईश्वर के भौतिक विराट रूप को देख कर समझ में आ जाती है। इस समझ से यह ज्ञान प्राप्त होता है, इस सत्य की साक्षात अनुभूति होती है कि सभी लोक, सभी लोकों के दरम्यान व्याप्त अंतरिक्ष और सभी दिशाएँ उसी एक परमेश्वर की उपस्थिति का मात्र साक्षी भर हैं यानी कुछ भी ईश्वर से इतर नहीं है बल्कि सबकुछ उन्हीं की अभिव्यक्ति भर है।
परन्तु ईश्वर का यह विराट स्वरूप जँहा एक तरफ अद्भुत अलौकि ज्ञान की अनुभूति देता है वंही दूसरी तरफ मनुष्य और समस्त जगत की क्षमता से यह स्वरुप इतना बड़ा है कि यह रुप भय भी उतपन्न करता है। जो चीज हमारी क्षमता से बहुत बड़ी होती है वह आश्चर्य तो देती है किंतु साथ ही साथ हम उसकी क्षमता की आभा से भयभीत भी हो जाते हैं।
ईश्वर के विराट विश्वरूप को अपनी आँखों से देख कर यह सत्य समझ में आता है कि सभी देवता भी इसी परम् पिता परमेश्वर से न सिर्फ उतपन्न होते हैं बल्कि उनमें ही समाहित भी हो जाते हैं यानी दिव्य गुणों का अपना कोई निजी अस्तित्व नहीं है। ये सभी ईश्वर से ही निकल कर पुनः ईश्वर में ही मिल जाते हैं।
जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसकी भावनाएँ भी वैसी ही होती हैं। सो कोई ईश्वर की अनुपम कीर्ति के सम्मुख श्रद्धा से नतमस्तक होता है तो कुछ के अंदर भय भी संचारित होता है। लेकिन अंततः सभी का उद्देश्य, वही एकमात्र ईश्वर ही होते हैं। लेकिन जो मोक्ष प्राप्त ऋषि, महर्षि, सिद्ध लोग हैं वे तो सभी लोगों के लिए ईश्वर की प्राप्ति की कामना करते हैं। सो वे जन समुदाय के कल्याण की भी कामना करते हैं और सभी के कल्याणार्थ ईश्वर की श्रद्धा में उनकी स्तुति भी करते हैं।
ईश्वर की अनुपम शक्ति और कीर्ति को देखकर मनुष्य तो क्या देवगण, यक्ष और राक्षस, सभी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उन्हें आश्चर्य इसलिए होता है क्योंकि उनके पास ईश्वर के इस विराट स्वरूप की कोई व्यख्या नहीं होती है। इसीलिए अर्जुन का कथन है कि ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं। जब हमारे पास किसी घटना या चीज की कोई व्याख्या नहीं होती है तब उसके अंदर आश्चर्य की भावना का जन्म होता है।
ईश्वर के विराट रूप का दर्शन ईश्वर की विभूतियों से तो अवगत कराता ही है, साथ ही यह भी समझाता है कि सबकुछ का उद्गम परम् पिता परमेश्वर है और सबकुछ पुनः उसी में विलीन हो जाता है। सम्पूर्ण संसार उसी एक ईश्वर की अभिव्यक्ति है और विराट रूप में जब एक साथ सम्पूर्ण संसार दिखता है तो मन में भय उतपन्न होता है क्योंकि तब ईश्वर के विराट स्वरूप में भिन्न भिन्न शक्तियाँ एक साथ प्रदर्शित होती हैं। इसीलिए अर्जुन का कथन है कि हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। और ऐसी स्थिति में व्यक्ति की यही इक्षा होती है कि सब कुछ पहले की तरह व्यवस्थित और सामान्य रूप में आ जाये।
यह तो अर्जुन समझा ही कि सृष्टि के सभी जीव अपने अंत काल में ईश्वर में ही विलीन हो जाते हैं , साथ ही अर्जुन ने ये भी समझा कि जिसकी जैसी भावना होती है उसी मार्ग से होकर वह ईश्वर में विलीन होता है। जिनकी श्रद्धा ईश्वर के प्रति होती है और जो जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति का रखे हुए जीवन व्यतीत करते हैं वे ईश्वर से उसी तरह मिलते हैं जैसे नदियाँ वेग से समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व सहर्ष उनमें विलीन कर देती हैं । ऐसे लोग ईश्वर को सहर्ष वरण करने हेतु व्यग्र होते हैं।
दूसरी तरफ वैसे लोग होते हैं जो जीवन भर लोभ, लालच, ईर्ष्या, अनाचार आदि से प्राप्त संपत्ति को ही अपने जीवन का उद्देश्य बनाये रखते हैं वे ईश्वर को प्राप्त तो होते हैं किंतु वे भय से ग्रस्त होकर ईश्वर में विलीन होते हैं।
दरअसल श्रीकृष्ण ने मृत्यु को वरण करने का मार्ग बतलाया है। मृत्यु अवश्यम्भावी है किंतु व्यक्ति किस भाव से जीवन जीता है इसपर उंसके मृत्यु का मार्ग यानी ईश्वर से मिलने का मार्ग निर्धारित होता है।
प्रभु के तेज में ताप है और उस ताप से सम्पूर्ण संसार भी तपता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर के विराट स्वरूप में सृजन के साथ साथ विनाश का भी वास है जो यह दर्शाता है कि सब कुछ ईश्वर से निकल कर फिर उन्हीं में समाहित भी हो जाता है। यह गति निरन्तर चलती रहती है।
हम ईश्वर पर श्रद्धा तो रखते हैं , उनकी पूजा भी करते हैं, स्तुति भी करते हैं किंतु हम ये नहीं जान पाते हैं कि ईश्वर हैं कौन। किन्तु जब व्यक्ति की दृष्टि में दिव्यता आती है यानी जब वह ईश्वर के असीम विस्तार को समझता है तो उसके मन में ईश्वर को जानने की उत्कण्ठा उतपन्न होती है। ईश्वरीय विभूतियों से चकित व्यक्ति किंचित भयभीत भी हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के मन में श्रद्धा पूर्वक यह प्रश्न उठता है कि इतने विराट स्वरूप वाले , सब के जन्म और मृत्यु के कारण, सभी कर्मों के हेतु ये आदि देव कौन हैं। उसके मन में तब ईश्वर के प्रति विमन्र श्रद्धा भाव भी होता है और भय भी।
ईश्वर के विराट स्वरूप को देखकर अर्जुन के मन में भी यही भाव जन्म लेते हैं सो वह विनीत होकर श्रद्धा भाव से ईश्वर से उनका परिचय जानने को व्यकुल हो उठता है।
अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्ण ने ईश्वर के उस स्वरूप को बताया जिसके अनुसार ईश्वर ही सभी का अंतिम परिणाम हैं। इस दृश्य और अदृश्य संसार मे ऐसा कुछ भी नहीं है जो उनके संचालन से बाहर है। और सबकुछ अंत में उनमें ही आकर समाहित हो जाता है। जिसे हम प्रारब्ध कहते हैं वह सब ईश्वर के द्वारा पूर्व निर्धारित है। हमें लगता है कि हमने ये कर दिया, वो कर दिया, हम ही कर्ता हैं, हम ही करने वाले हैं, हम नहीं रहेंगे तो ये नहीं होगा, वो नहीं होगा। लेकिन ईश्वर के विराट स्वरूप का संकेत है कि यह कर्तापन का भाव अहंकार है हमारा, और कुछ नहीं है। हम वही करते हैं जो होना है। इसका एक दूसरा पहलू भी है कि हमें किसी परिणाम की आशंका से भयभीत होकर अपने धर्म का मार्ग नहीं त्यागना चाहिए। परिणाम जो होना है वह होना है। हमारा कर्तव्य अपने धर्म के अनुसार चलना मात्र है। हमारा वश मात्र उतने पर ही है। हमें उस मार्ग को छोड़ना नहीं है। तब अंत में विजय भी हमें ही मिलती है। हमारे मारे न कोई मरेगा, न हमारे बनाये कोई बनेगा। हमारा कर्तव्य मात्र और मटर इतना भर है कि हमें अपना धर्म निभाना है। इसी में विजय है। इसी लिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इस युद्ध में सारे योद्धा पूर्व में ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। अर्जुन को तो मात्र निमित्त बनकर दिखाना है। अर्जुन नहीं कुछ करेगा तो परिणाम तो निर्धारित है। तो फिर उसे भागना कैसा। उसका धर्म युद्ध करने का ही है तो उसे वही करना है। बाकी जो होना है वह तो हो चुका है।
गीताकार ने अचानक पुनः संजय को यँहा लाया है तो उनका खास उद्देश्य रहा है। ईश्वर के विराट स्वरूप को देखने वाले अर्जुन अकेले नहीं रहे बल्कि संजय भी साथ साथ उस विराट स्वरूप को देख पा रहे थे और उस स्वरूप का वर्णन वे धृतराष्ट्र को कर रहे थे। जिस विराट स्वरूप का दर्शन दुर्लभ था धृतराष्ट्र उसका साक्षात वर्णन सुन रहे थे किंतु मोह रूपी धृतराष्ट्र भगवान के विराट रूप का अर्थ समझने में अक्षम था क्योंकि मोह से ढँका हुआ मन ईश्वर में लगता ही नहीं है, वह तो अपने ही लोभ की पूर्ति में भटकता रह जाता है। उसके समक्ष साक्षात ईश्वर भी आ जाते हैं तो उसे अपना मोह ही प्यारा लगता है, वह ईश्वर की तरफ देखता तक नहीं है। संजय का उल्लेख इसी लिए किया गया है ताकि हम समझ सकें कि ईश्वर की विभूतियों को जान भर लेने से हमारा मोह भंग नहीं होता है और हम सन्मार्ग पर वापस नहीं लौटते हैं।
ईश्वर के इस रूप की समझ से मन में ईश्वर के प्रति अनुराग भी उतपन्न होता है और अपनी स्थिति के कारण भय भी होता है। यह भाव अर्जुन के मन में तो उठते है सो वह ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होता है किंतु धृतराष्ट्र का मोह उसे सत्य से परिचित नहीं होने देता है सो वह उसी मोह में डूबा रह जाता है।
जब ईश्वरीय विभूतियों का प्रत्यक्ष अनुभव होता है तो यह ज्ञान होता है कि ईश्वर अंतर्यामी भी हैं और हमारे इंद्रियों का स्वामी भी। जिसके मन में ईश्वर के प्रति अनुराग का भाव होता है उसे ईश्वरीय विभूतोयों के प्रत्यक्ष अनुभव से अति प्रसन्नता होती है, उसका मन हर्ष से ओत प्रोत हो जाता है। उसे ईश्वरीय प्राप्ति का बोध होता है जिससे उसके विकार समाप्त होते हैं और विकार रहित मन ईश्वर की स्तुति में लगा प्रसन्नचित्त हो जाता है। ऐसे लोग ईश्वर के प्रति श्रद्धावान होकर उनके समक्ष नतमस्तक होते हैं।
किन्तु जिसके मन में मोह, माया, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या ,शत्रुता आदि के भाव होते हैं उनके लिए ईश्वर महाकाल होते हैं। अपने विकारों के कारण ऐसे लोग ईश्वर को अपना शत्रु मान बैठते हैं और ईश्वरीय विभूतियों से उनको भय होता है। ऐसे लोग ईश्वर के समक्ष कदापि नतमस्तक नहीं होते हैं, बल्कि उनसे दूरी बनाने का प्रयास करते हैं।
ईश्वरीय विभूतियों का ज्ञान होने, उनकी महत्ता की समझ होने से व्यक्ति के अंदर श्रद्धा तो जागृत होती हीं है, साथ साथ विनयशीलता भी आती है। व्यक्ति ईश्वरीय विभूति के समक्ष श्रद्धा और विनय से नतमस्तक हो जाता है। वह समझ लेता है कि ईश्वर ही वह परम सत्ता हैं जो सृजनकर्ता के भी सृजनकर्ता हैं, जो सभी देवों के भी स्वामी हैं, जो नाश नहीं होने वाले हैं, जिनमें समस्त जगत का वास है और जो सत, चित्त, आनंद से परे परम् ब्रह्म हैं। ऐसे ईश्वर के प्रति नगमस्तक होकर उनको बारम्बार नमस्कार करना ही हमारा कर्तव्य है। जँहा एक तरफ श्रद्धा से बारम्बार नमस्कार करते हैं हम वंही बारम्बार नमस्कार करने से भी श्रद्धा गहरी होती जाती है।
ईश्वर के विराट रूप के दर्शन से अर्जुन को वो बातें समझ में आने लगी जो अबतक उसे समझाई जा रहीं थी लेकिन अपने पूर्वाग्रहों के कारण उसे समझ में नहीं आ पा रहीं थी। ईश्वर के अद्भुत तेज, और उनके उद्गम और काल के रूप को देख कर, उनके अंदर ही भूत, वर्तमान और भविष्य को देखकर अर्जुन को जो बातें समझ में आईं उनको उसने भगवान के समक्ष व्यक्त किया।
ईश्वर ही प्रारम्भ है अर्थात जो कुछ भी होने के पहले से हैं अर्थात पुराण हैं किंतु वे हमेशा ही हैं अर्थात सनातन हैं। वे आदि होकर भी नूतन हैं और भविष्य में भी जो होने वाला है वँहा भी हैं। क्योंकि ईश्वर काल से परे हैं। वे पुरुष हैं यानी ईश्वर ही हैं जो कण कण में व्याप्त हैं । ऐसा कुछ भी नहीं है जो बिना ईश्वरीय विभूति के है। कुछ भी इसी लिए है क्योंकि ईश्वर का वास उसमें है फिर चाहे वह व्यक्त हो या अव्यक्त। ईश्वर के कारण ही यह दृश्य और अदृश्य जगत है क्योंकि वही सब के आधार हैं। बिना ईश्वरीय विभूति के कुछ का भी कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में ईश्वर ही है जो स्वयम को जानते हैं और व्यक्तियों के लिए जानने योग्य एकमात्र वही हैं जिनकी समझ होने के लिए व्यक्ति को अपने अहम से बाहर आना होता है। उनको जाने और उनके साथ एकाकार हुए बिना अंतिम लक्ष्य किसी को नहीं मिलता है। यह यात्रा स्थूल से चेतना की तरफ की होती है। चेतना जागरूकता लाती है और व्यक्ति की यात्रा अपने स्थूल स्वरूप से उस सूक्ष्म रूप की तरफ होती है जँहा मात्र चेतन स्वरूप की ही अनुभूति है। जैसे जैसे व्यक्ति स्थूल से चेतना की तरफ बढ़ता है उंसके अंदर ईश्वरीय सामीप्य का बोध बढ़ते जाता है। और उसे अनुभव हो पाता है कि जो कुछ भी उंसके सामर्थ्य में है, जो कुछ उसके समक्ष व्यक्त अथवा अव्यक्त है वह सभी ईश्वरीय विभूति से पूर्ण है।
ईश्वरीय विभूति का साक्षात अनुभव होने पर व्यक्ति का ईगो समाप्त हो जाता है और उसे अहसास हो जाता है कि ईश्वर ही एकमात्र अस्तित्व है और सभी उसी की रचना मात्र है। ईगो का समापन व्यक्ति के अंदर ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा का भाव उतपन्न करता है जिससे ईश्वर के प्रति व्यक्ति बारम्बार नतमस्तक होता है।
ईश्वरीय विभूतियों से परिचित होने पर व्यक्ति के दृष्टिकोण में आमूल चूल परिवर्तन आ जाता है। उसे इस तथ्य की समझ हो जाती है कि ईश्वर चाहे जिस रूप में हैं वे सनातन हैं, और उनके होने मात्र से सारी दृश्य और अदृश्य सृष्टि की उत्पत्ति भी होती है और उन्हीं में वे विलीन भी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के अंदर ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा आ जाती है जिसके कारण वह परम पिता परमात्मा के प्रति नतमस्तक हो जाता है। साथ ही उसे ईश्वर को अबतक नहीं समझ पाने की ग्लानि भी होती है। इस अवस्था में व्यक्ति एक तरफ ईश्वर के प्रति श्रद्धा भाव से विनीत हो उठता है तो दूसरी तरफ ईश्वर की असीम क्षमता , विशेषरूप से उनके काल होने की परम शक्ति से भयभीत भी हो जाता है क्योंकि तब व्यक्ति अपने ही मोह में उलझा रहता है।
एक तरफ श्रद्धा तो दूसरी तरफ भय, इन परस्पर विरोधी भावों में रचा बसा मन तभी शांत हो पाता है जब व्यक्ति को ईश्वर के प्रति अनुराग हो जाता है।
अर्जुन भी इन्हीं मिश्रित भावों के अधीन होकर कहता है कि
"आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव !' 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात् कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं- वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ। ।
आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।
अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।
मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।
मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइए। "
श्रद्धा से विश्वास और विश्वास से श्रद्धा का जन्म होता है जो व्यक्ति के मन में उस शक्ति को भरता है जिसके बल पर वह बड़े से बड़े अवरोध को पार कर लेता है। ईश्वरीय विभूति से उसे भय भी होता है लेकिन यह भय तभी तक रहता है जब तक मन में मोह, लोभ और ईर्ष्या जैसे भाव बने रहते हैं। जैसे जैसे व्यक्ति इन भावों पर नियंत्रण करते जाता है उसकी श्रद्धा बढ़ती जाती है और अंततः वह व्यक्ति ईश्वरीय स्वरूप के उस रूप पर टिक जाता है जिसमें उसे अपने भरोसे का साकार स्वरूप दिखता है।
अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण का कथन है कि ईश्वर के विश्वरूप का उसे इसलिए दर्शन हो सका क्योंकि ईश्वर की ही अनुकम्पा उसपर है। जिस किसी को ईश्वरीय विभूति पर अर्जुन सरीखा विश्वास होता है, उनके प्रति श्रद्धा होती है उसे ही ईश्वर के इस विश्वरूप की अनुभूति की कृपा मिल सकती है। वही व्यक्ति ईश्वर के इस परम् तेजमयी , अनंत स्वरूप को देख सकता है। तात्पर्य है कि हमें ईश्वर को उसकी सम्पूर्णता के साथ समझने के लिए अनिवार्य है कि ईश्वर के प्रति हमारे मन में अगाध श्रद्धा हो , उनके प्रति समर्पण हो । उस स्थिति में व्यक्ति ईश्वर को उंसके सभी शक्तियों के साथ देख समझ पाता है, जान पाता है कि ईश्वर ही सब का प्रारम्भ, अंत और हेतु है और संसार की समस्त सत्ता उन्हीं के सम्मुख नतमस्तक है। वही सब का कारण भी है और परिणाम भी, सो न कुछ हर्ष के लायक है, न विषाद के।
भगवान के विराट रूप के दर्शन से अर्जुन सम्मोहित भी हुआ, पुलकित भी हुआ और व्याकुल भी हुआ लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे समझाया है कि व्याकुलता सही नहीं है। ईश्वर की समस्त विभूतियों को एक साथ उनके दिव्य रूप में जान लेना किसी भी तरह के ज्ञान, यज्ञ या तप या किसी भी अन्य क्रिया से सम्भव नहीं है।
भगवान के विराट रूप के दर्शन से अर्जुन सम्मोहित भी हुआ, पुलकित भी हुआ और व्याकुल भी हुआ लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे समझाया है कि व्याकुलता सही नहीं है। ईश्वर की समस्त विभूतियों को एक साथ उनके दिव्य रूप में जान लेना किसी भी तरह के ज्ञान, यज्ञ या तप या किसी भी अन्य क्रिया से सम्भव नहीं है।
ईश्वर तो निर्माण और संहार दोनों के ही कारण हैं, दोनों की उत्पत्ति उन्हीं से होती है सो प्रभु के विकराल स्वरूप जो महाकाल को।अभिव्यक्त करता है उससे भयभीत नहीं होना चाहिए और व्यक्ति को चाहिए कि वह मन में साम्य अवस्था(equaniminous state) बनाये रख कर प्रभु के प्रति समर्पित रहे।
ईश्वर के साम्य स्वरूप का ध्यान कर व्यक्ति शांत हो जाता है। प्रभु के विकराल स्वरूप, उनके चतुर्भुज स्वरूप और पुनः उनके मानव स्वरूप में क्रमशः लौटने का क्रम व्यक्ति को यह ध्यान दिलाता है कि जो ब्रह्मांडीय सत्य है वही तो प्रकट में वो है, उसी का अंश है। ईश्वर ही समस्त ब्रह्मांड भी है और वही एक सामान्य स्वरूप में स्थित इकाई भी है। सो ईश्वर के हर स्वरूप के प्रति उसका समर्पण ही उसकी आराधना है। और इसी मार्ग से व्यक्ति साम्य को प्राप्त करता है।
ईश्वर को पुनः मानव रूप में देख कर अर्जुन की घबराहट, उसका भय, उसकी अकुलाहट दूर हो जाती है। व्यक्ति को ईश्वर की विभूतोयों से लगाव तो होता है लेकिन उनके विकराल रूप से भय भी होता है। दरअसल व्यक्ति ईश्वर के साथ अधिक सुगमता से तभी तारतम्य बना पाता है जब वह ईश्वरीय स्वरूप को अपनी तरह के स्वरूप का ही पाता है। अन्यथा ईश्वर के विकराल स्वरूप से उसकी दूरी भय या आसक्ति से बढ़ जाती है। यही वजह है कि अर्जुन ईश्वर को मानव रूप में पुनः वापस देखकर शांति और महसूस करता है, वह आश्वस्त होता है।
अब प्रश्न उठता है कि ईश्वर की साक्षात अनुभूति किस तरह से हो सकती है। तो स्पष्ट जानें कि किसी एक मार्ग से ईश्वरीय अनुभूति होना सम्भव नहीं है। ज्ञान हो, कर्म, यज्ञ हो, किसी एक में आप पारंगत हो सकते हैं, आप सिद्ध हो सकते हैं लेकिन कोई एक मार्ग आपको ईश्वरीय साक्षात्कार से परिचित नहीं कराता है। तो क्या ज्ञान का मार्ग अथवा कर्म का मार्ग बेकार हैं? नहीं उनकी महत्ता है, दो तरह की महत्ता है। पहला तो ये कि ज्ञान और कर्म हमें ईश्वरीय पथ पर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाते हैं किंतु वे रास्ते अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँचाते हैं, उनके आगे भी मार्ग है। दूसरा यह कि ईश्वरीय अनुभूति के लिए ये मार्ग हमें तैयार करते हैं, हममें वो गुण भरते हैं, हमें इस तरह से तैयार करते हैं कि हम आगे की यात्रा पूरी कर पाएं। आगे ये कैसे होता है?
ईश्वर को प्राप्त करने , उन्हें उनके विराट स्वरूप में अनुभूत करने का क्या मार्ग है? कर्म , ज्ञान और तप के मार्ग हमें ईश्वर की तरफ ले तो जाते हैं किंतु एक सीमा के बाद उनकी उपलब्धि रुक जाती है। तब आगे का क्या मार्ग है?
आगे का मार्ग है भक्ति का। यह भक्ति क्या है? भक्ति है आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण। और यह प्रेम और समर्पण कैसे हो पाता है? हम जैसे जैसे अपने स्व यानी ईगो से मुक्त होते जाते हैं वैसे वैसे आराध्य के प्रति हमारा प्रेम प्रगाढ़ होते जाता है, उनके प्रति हम अधिक से अधिक समर्पित होते जाते हैं और जब हमारा ईगो पूर्णतः समाप्त हो जाता है हम अपने आराध्य में ही विलीन हो जाते हैं। ईश्वर के प्रति ऐसा लगाव उनमें अटूट श्रद्धा से आती है। श्रद्धा ही प्रेम को और प्रेम समर्पण को जन्म देता है और यही तीनों भाव साथ आकर भक्ति कहलाते हैं। ईश्वर के प्रति यही श्रद्धा, प्रेम और समर्पण जिसे अनन्य भक्ति कहा गया है , हमारे ज्ञान और कर्म को आगे बढ़ाकर हमें ईश्वर के साथ आत्मसात कर देती है।
इस अवस्था को पाने के लिए पाँच उपाय हैं।
एक तो हमारे अंदर यही अनन्य भक्ति का होना अनिवार्य है।
दूसरे इस पूर्ण भक्ति से ओत प्रोत व्यक्ति अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर के प्रति अपने दायित्व को मानकर करता है। व्यक्ति जो कुछ करता है उसे करने के पीछे उसकी भावना होती है कि उसका कर्म परम पिता परमेश्वर के लिए है। इस तरह से किये गए कर्म ही वो कर्म हैं जिनको व्यक्ति को करना है।
तीसरा मार्ग है कि व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके प्रत्येक कर्म के परम लक्ष्य स्वयं ईश्वर होते हैं । यानी दिखने में उसके कर्म भिन्न भिन्न उद्देश्य वाले हो सकते हैं किंतु उस व्यक्ति के भाव में उसके हरेक कर्म का लक्ष्य ईश्वरीय विभूति की प्राप्ति ही होती है।
चौथा मार्ग है कि जब व्यक्ति कर्म करता है तो वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी अन्य से सम्बद्ध नहीं होता है। ईश्वर के स्वरूप में ही समस्त ब्रह्मांड निहित हैं। ईश्वर के प्रति व्यक्ति के लगाव से ही उसके सारे सम्बन्ध पूरे हो जाते हैं। आप न तो मित्र से दूर हैं , न परिवार से, न शत्रु से। वे सभी तो एक ही ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र हैं। सो एक ईश्वर की संगति ही व्यक्ति को सारी संगति दे देती है। अलग से यदि किसी के प्रति कोई आकर्षण या विकर्षण है तो इसका तात्पर्य है कि अभी आपका ईगो पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ है और आपमें ईश्वर के प्रति अभी भी प्रेम, समर्पण और विश्वास की कमी है।
पाँचवा मार्ग है कि किसी से वैर न हो मन में। वैर संगति का ही परिणाम है, जो क्रोध, ईर्ष्या जैसे भावों से उपजता है और ये भाव अनन्य भक्ति के अभाव के परिचायक हैं।
सो यदि ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति का भाव है , यानी उनके प्रति अकाट्य श्रद्धा, प्रेम और समर्पण है और इस भक्ति के कारण व्यक्ति ईश्वर को समर्पित कर, उनको ही परम लक्ष्य मानकर, बिना किसी संगत भाव और वैर भाव के कर्म करता है तो उस व्यक्ति के समक्ष प्रभु अपने विराट रूप में उपस्थित होते हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः
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