श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 9
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 9
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥ ।।9।।
संजय बोले- हे राजन्! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखलाया। ।।9।।
अब संजय भगवान के उस विराट रूप का वर्णन राजा धृतराष्ट्र को करते हैं जो भगवान ने अर्जुन को दिखलाया। यह विराट रूप ईश्वर का है जो योगेश्वर हैं यानी समस्त योगों के ईश्वर हैं। समस्त योगों के स्वामी योगेश्वर यानी जिनमें संसार समस्त रूप में समाहित हो जाता है। ये भगवान ही हरि स्वरूप हैं यानी भ्रम का हरण करने वाले हैं। यानी ईश्वर ने वो दिव्य और अलौकिक रूप का दर्शन दिया जिसमें सम्पूर्ण संसार समाहित है और जिसे जानकर समस्त भ्रम का नाश हो जाता है। यह स्वरूप परम् ऐश्वर्य रूप है यानी इस विराट रूप में ईश्वर की विभूतोयों का संगम है। यह रूप देख जानकर व्यक्ति के समस्त पापों यानी उसके समस्त भ्रम का नाश हो जाता है।
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