श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 8
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 8
न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥ ।।8।।
परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख। ।।8।।
ईश्वर के विश्वरूप को देखने के लिए विशेष दिव्य दृष्टि की जरूरत होती है। हम जो कुछ भी देखते हैं और समझते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कैसे किसी चीज को देखते हैं। हम सभी के पास एक ही तरह की आँखें होती हैं लेकिन हमारे देखने की विशेषता अलग अलग होती है। तो क्या हमारे देखने की क्षमता हमारे ज्ञान पर निर्भर करता है ? कुछ हद तक तो ये सत्य है लेकिन ये भी सत्य पूर्ण नहीं है। अपने ज्ञान और भक्ति के बल पर हम जो देखने की क्षमता को पाते हैं तो वह भी सीमित ही होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। समुंदर की हर लहर समुंदर का ही अंश है। उसी प्रकार व्यक्ति भी ईश्वर का ही अंश है सो ईश्वर का ही रूप है। इस ज्ञान से व्यक्ति ये तो समझता है कि "अहम ब्रह्मास्मि" किन्तु इस समझ से वह ब्रह्म को देख ही लेता है यह जरूरी नहीं है। तब ईश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप को देखने का क्या रहस्य है, इसे समझने के लिए हमें परम् सत्य ईश्वर पर पूरी तरह से निर्भर होना अनिवार्य है। यह अवस्था कर्म, ज्ञान और भक्ति के बाद की है जिसमें पूर्ण समर्पण ही एकमात्र मार्ग है जिसके उपरांत ईश्वर ही हमें वो दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे हम ईश्वर के विराट रूप को देख सकते हैं। यही दिव्य दृष्टि है जो हमें ईश्वर के विराट रूप को यानी उस रूप को देखने में सहायक होता है जो हमारे इस ज्ञान को पूरा करता है कि ईश्वर सबमें है और सब ईश्वर में है ।
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