श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 6 एवं 7
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 6 एवं 7
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥ ।।6।।
हे भरतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को अर्थात अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख। ।।6।।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि॥ ।।7।।
हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख। ।।7।।
प्राप्त आत्मिक ज्ञान के साक्षात स्वरूप का दर्शन अर्जुन को हो सके इस आग्रह पर सहमति मिल जाने के बाद अर्जुन को श्रीकृष्ण ये भी समझाते हैं कि वह इस ज्ञान से क्या क्या देख सकते हैं। कुछेक को बताने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को ये भी समझाते हैं कि जब व्यक्ति को स्वयम की समझ इस ज्ञान के द्वारा होती है तो फिर वह सम्पूर्ण संसार के गूढ़तम रहस्य को देख सकता है। यह सब ज्ञान की प्राप्ति और उसमें श्रद्धा से सम्भव है कि व्यक्ति इस ज्ञान और श्रद्धा के बल पर सभी दृश्य और अदृश्य सत्य का साक्षात दर्शन कर पाता है और समझ पाता है कि चेतना के भिन्न भिन्न स्तर हैं जिनके अनुसार वह चीजों को देखता और समझता है।
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