श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 5
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 5
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥ ।।5।।
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले अलौकिक रूपों को देख। ।।5।।
अर्जुन के आग्रह को परमात्मा के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। अर्जुन को जब आत्म ज्ञान प्राप्त होता है तो उसे परमात्मा से सामीप्य का बोध होता है। ऐसी स्थिति में उसे परमात्मा के सर्वविभूति सम्पन्न स्वरूप को देखने की लालसा होती है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। जब व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है तो स्वाविक रूप से वह उस ज्ञान के व्यापक स्वरूप को साकार देखना भी चाहता है। किंतु इस साक्षात दर्शन के लिए ज्ञान का होना ही एकमात्र शर्त नहीं है बल्कि ज्ञान और ज्ञानदाता के प्रति अटूट और निःशंक श्रद्धा का होना भी अनिवार्य है। अर्जुन में ये विशेषताएँ थीं और इसी कारण से श्रीकृष्ण ने उसके आग्रह को स्वीकार भी किया। ईश्वर का यह स्वरूप जिससे सांसारिक जीव उनकी विभूतियों का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हों विराट है, इस स्वरूप में कई स्वरूप, आकृति और रंग हैं जिनके होने का सिर्फ इतना ही औचित्य है कि उन दृश्य स्वरूप को देख कर मानव मात्र ईश्वर की विभूतियों को अपनी समझ के अनुरूप समझ सके। दरअसल ईश्वर का यह स्वरूप भावात्मक ज्ञान का दृष्यकरण मात्र है नहीं तो परमात्मा को भौतिक रूप में बाँधना भला कँहा सम्भव है।
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