श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 3 एवम 4
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 3 एवम 4
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥ ।।3।।
हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। ।।3।।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥ ।।4।।
हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए। ।।4।।
परमात्मा की विभूतोयों को समझकर कसी के अंदर भी उस परम शक्तिमान प्रभु के दर्शन की इक्षा हो सकती है ताकि वह उसे देख तो सके जिसके सम्बन्ध में उसे इतना वैभवशाली जानने समझने को मिला है। किंतू जिसे प्राप्त ज्ञान पर श्रद्धा होती है उसे खुद पर अहम भी नहीं होता है और ज्ञान और गुरु के प्रति समर्पण भी होता है। इसी कारण इक्षा होने पर भी व्यक्ति प्रार्थना भाव ही रखता है और यही भाव अर्जुन को भी था सो वह विनयपूर्वक कहता है कि यदि सम्भव लगे तो यानी यदि उसकी पात्रता हो तो प्रभु का दर्शन वह कर सके। निश्चित ही ज्ञान प्राप्त होना और स्वयम उस ज्ञान का साक्षात अनुभव करना दो बातें होती हैं। जिसे ज्ञान प्राप्त होता वह ज्ञान के पुंज के समक्ष विनीत ही होता है। क्योंकि ज्ञान व्यक्ति के अंदर जो लौ प्रज्वलित करता है उसकी रौशनी में उसे यह दिखता है कि उसे तो अभी और चलना है।
Comments
Post a Comment