श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 14
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 14
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥ ।।14।।
उसके अनंतर आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले। ।।14।।
परमपिता परमेश्वर के इस दिव्य विश्वरुप के दर्शन से यानी उनके ज्ञान से व्यक्ति आश्चर्यमिश्रित सुख से भर जाता है। जब हमें ईश्वर के इस विराट स्वरूप का अपने दिव्य चक्षुओं से दर्शन होता है यानी जब हमें ईश्वर की इस असीम महानता और सीमा विहीन विशालता का अनुभव होता है तब हमारी भावनाएँ, हमारे इन्द्रीयों की समस्त चेतना हमारे रोम रोम में आश्चर्य और प्रसन्नता का संचार कर देती हैं। तब ईश्वर की इस दिव्य महानता के प्रति श्रद्धा जागृत हो जाती है और तब हम बिना किसी प्रयास के ही उनके इस महानता, उनके इस विशालता, उनके इस दिव्यता के समक्ष श्रद्धा भाव से झुक जाते हैं और प्रणाम कर अपनी श्रद्धा, अपना समर्पण व्यक्त करते हैं।
यही हाल अर्जुन का भी हुआ जब श्रीकृष्ण ने उसे ईश्वर के इस दिव्य विराट स्वरूप को दिखाया जिससे उसे वो बातें प्रत्यक्ष दिखने लगीं जिसे श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्म अर्जुन को प्रारम्भ से समझाते आ रहें हैं और तब आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले।
क्या बोले यह हम आगे देखते हैं।
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