श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 13
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 13
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥ ।।13।।
पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा। ।।13।।
संजय बता रहे हैं कि अर्जुन ने वभवयुक परमात्मा के शरीर में क्या देखा। संजय के वर्णन के अनुसार
पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।
इसका क्या तातपर्य है? उस विश्वरूप में अर्जुन जो देख रहा था क्या वह कोई चमत्कार था? नहीं, अर्जुन तो दिव्यता का दर्शन कर रहा था। दरअसल कण कण में दिव्यता व्याप्त है। इस संसार(संसार का अर्थ यह धरती मात्र नहीं बल्कि समस्त ब्रह्मांड यानी कॉस्मॉस है) में हर दृश्य और अदृश्य , चाहे वह जिस रूप, रंग, आकार का है अपने आप में पूर्ण दिव्यता को धारण किये हुए है। कण कण में ईश्वर व्याप्त हैं न कि ईश्वर कण कण हो कर भागों में विभक्त होकर अलग अलग व्याप्त हैं। हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण ईश्वरीय गुणों की अभिव्यक्ति है और विश्वरूप में, विराट रूप में जब हम ईश्वर की अनुभूति करते हैं तो हर रचना में ईश्वर अपनी सम्पूर्णता में दिखाई देते हैं। भिन्न भिन्न रूप, रंग और आकार कुछ और नहीं एक ही ईश्वर के दिखने के भिन्न भिन्न दृष्टिकोण मात्र हैं। अगर ईश्वर के प्रति हमें श्रद्धा है, तो हमें इस ब्रह्मांड में जो भी है वह ईश्वर का ही दर्शन कराता है, कुछ भी अलग अलग नहीं है। इसी कारण से एक ही शरीर में हमें समस्त कॉस्मॉस का दर्शन होते रहता है। यदि हमें ईश्वर के विराट स्वरूप का ज्ञान है तो फिर कँही कोई भेद नहीं है। जो भी है वह सब एक परम पिता परमेश्वर का ही रूप है और एक ईश्वर ही सभी के उद्गम हैं, सो अर्जुन को एक ईश्वर में ही समस्त ब्रह्मांड के सभी अवयवों के दर्शन हुए।
स्मरण हो कि प्रत्येक व्यक्ति , प्रत्येक जीव की उपस्थिति उंसके भौतिक, मानसिक और चेतना के स्तर पर भिन्न तो दिखती है लेकिन चूँकि वे सभी जीव एक ही उद्गम से निकलते हैं सो एक उद्गम में ही उन सभी का अस्तित्व निहित होता है। एक परमात्मा में ही हमें समस्त ब्रह्मांड के सभी रूपों और अवयवों का दर्शन होता है।
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